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Vimla Jain

Action Classics Inspirational

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Vimla Jain

Action Classics Inspirational

घड़ी की टिक टिक को जिंदा रखने के तरीके की पहचान

घड़ी की टिक टिक को जिंदा रखने के तरीके की पहचान

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समय की टिक-टिक पुराने शहर के बीचोंबीच ‘टाइमकीपर्स’ नाम की एक छोटी-सी घड़ी रिपेयरिंग की दुकान थी। उसके सत्तर वर्षीय मालिक माधवराव घड़ियों को केवल मशीन नहीं, उनसे जुड़ी यादें मानते थे। यह दुकान उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली थी और वे वर्षों से उसी समर्पण से काम कर रहे थे। लेकिन समय बदल चुका था। डिजिटल घड़ियों और मोबाइल फोन के कारण पुरानी घड़ियों की जरूरत कम हो गई थी। दुकान का काम लगभग बंद हो गया। उनके बेटे ने उन्हें दुकान बेचकर आराम करने की सलाह दी, लेकिन माधवराव के लिए यह दुकान पिता की आखिरी निशानी थी। एक दिन लगातार तीन दिनों तक कोई ग्राहक नहीं आया। माधवराव बहुत उदास होकर घर लौटे। उनकी 13 वर्षीय पोती नैना ने यह महसूस किया। वह घर की एक पुरानी बंद पड़ी अलार्म घड़ी लेकर आई और बोली— “दादाजी, इसे ठीक कीजिए और मुझे भी यह काम सिखाइए।” माधवराव ने उसे घड़ी ठीक करना सिखाना शुरू किया। साथ ही उन्होंने उसे धैर्य, सटीकता, बारीकी और कारीगरी का सम्मान भी सिखाया। धीरे-धीरे आसपास के दूसरे बच्चे भी उनसे सीखने आने लगे। शनिवार को उनकी छोटी-सी दुकान बच्चों की कार्यशाला बन गई। माधवराव कोई शुल्क नहीं लेते थे। वे अपना ज्ञान निःस्वार्थ भाव से बाँटते थे। एक पत्रकार ने उनकी कहानी लिखी— “एक ऐसा व्यक्ति, जो केवल घड़ियाँ ही नहीं, एक नई पीढ़ी का समय भी बदल रहा है।” कहानी प्रसिद्ध हुई और पुराने घड़ी-संग्रहकर्ता, संग्रहालय तथा स्कूल उनसे जुड़ने लगे। उनका व्यवसाय फिर चल पड़ा। इसके बाद बड़े निवेशकों ने उन्हें बहुत बड़ा आर्थिक प्रस्ताव दिया—फ्रेंचाइज़ी खोलने और उनकी कार्यशाला को आलीशान शोरूम में बदलने का। परिवार और मित्रों ने इसे स्वीकार करने की सलाह दी। तभी नैना ने पूछा— “दादाजी, आपके जाने के बाद लोग आपको किस रूप में याद रखें, आप वास्तव में यह क्या चाहते हैं?” माधवराव ने निवेश का प्रस्ताव ठुकरा दिया और ‘स्कूल ऑफ टाइम’ शुरू किया। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के युवाओं को घड़ी रिपेयरिंग और कारीगरी निःशुल्क सिखाई जाने लगी। उन्हें प्रमाणपत्र और औजारों की किट भी दी जाती थी। कुछ वर्षों में उनके विद्यार्थी अलग-अलग शहरों में अपने काम में सफल हुए। किसी ने रिपेयरिंग स्टूडियो खोला, कोई संग्रहालय से जुड़ा और कोई ऐतिहासिक घड़ियों का विशेषज्ञ बन गया। हर विद्यार्थी अपनी दुकान में एक छोटी पट्टी लगाता था— “समय का सम्मान करना सीखो।” बढ़ती उम्र के साथ माधवराव की दृष्टि कमजोर होने लगी और उनके हाथ भी काँपने लगे। उन्होंने समझ लिया कि अब सेवानिवृत्ति का समय आ गया है। उनकी अंतिम कार्यशाला में सैकड़ों पुराने विद्यार्थी एकत्र हुए। हर किसी के हाथ में उसकी स्वयं ठीक की हुई घड़ी थी। शाम छह बजे सभी ने एक साथ घड़ियों में चाबी भरी। पूरे हॉल में सैकड़ों घड़ियों की टिक-टिक गूँज उठी। माधवराव की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें एहसास हुआ कि उनके हाथ भले ही अब धीमे पड़ गए हों, लेकिन उनके ज्ञान और काम को आगे बढ़ाने के लिए हजारों हाथ तैयार हैं। रात को घर पर वही पुरानी अलार्म घड़ी मेज पर टिक-टिक कर रही थी। नैना ने पूछा— “दादाजी, यह यात्रा केवल घड़ियाँ ठीक करने के लिए तो नहीं थी, है न?” माधवराव मुस्कुराए और बोले— “नहीं। यह यात्रा यह सुनिश्चित करने के लिए थी कि जो सच में मूल्यवान है, उसकी टिक-टिक कभी बंद न हो।” सीख ज्ञान, कौशल और अनुभव तभी सार्थक हैं, जब उन्हें दूसरों के साथ बाँटा जाए। सच्ची सफलता केवल अपनी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि दूसरों को इतना सक्षम बनाने में है कि वे हमसे भी आगे बढ़ सकें। सबसे बड़ी विरासत वह नहीं जो हम अपने हाथों से बनाते हैं, बल्कि वह है जो हमारे द्वारा प्रेरित लोगों के हाथों से आगे बढ़ती रहती है।


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