श्मशान में सीटी और असामाजिक गेंग पकड़ा गया
श्मशान में सीटी और असामाजिक गेंग पकड़ा गया
जब लोग अपने और असामाजिक काम करने के लिए श्मशान जैसी जगह को भी नहीं छोड़ते हैं तो उसको हम क्या कहेंगे लालच इंसान को अंधा कर देता है
इस पर मेरी आज की कहानी।
श्मशान में सीटी
एक बार की बात है। कुछ असामाजिक तत्वों ने सोचा कि हम जहाँ भी जाते हैं, पुलिस हमें पकड़ लेती है। जुआ खेलें या कोई और गलत काम करें, पुलिस आकर पकड़कर ले जाती है।
उनमें से एक ने कहा, “शमशान ही एक ऐसी जगह है, जहाँ रात के समय पुलिस क्या, कोई आम इंसान भी नहीं आता। अगर हम अपना धंधा वहीं से शुरू करें तो किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा।”
उन पाँच-सात लोगों ने मिलकर शमशान के चौकीदार को भी अपने साथ मिला लिया। धीरे-धीरे उन्होंने शमशान को ही अपने जुए और दूसरे असामाजिक कामों का अड्डा बना लिया।
जैसे ही रात गहराती, वे लोग शमशान के एक सुनसान कोने में चले जाते और अपना काम शुरू कर देते। चौकीदार भी उनकी मदद करता। उसने लोगों को डराने के लिए रात में तरह-तरह की डरावनी आवाजें निकालने की तरकीब निकाल रखी थी। वैसे भी रात के समय शमशान में कौन आता है!
कुछ दिनों तक सब कुछ इसी तरह चलता रहा।
लेकिन एक दिन उन लोगों में आपस में किसी बात को लेकर जोरदार झगड़ा हो गया। बात इतनी बढ़ गई कि मारपीट की नौबत आ गई। उनमें से एक व्यक्ति गुस्से में वहाँ से निकल गया।
उसने सोचा, “अगर मैं यहाँ काम नहीं कर सकता, तो कम से कम पुलिस को इसकी खबर कर देता हूँ। शायद इससे मुझे भी इस मुसीबत से छुटकारा मिल जाए।”
वह सीधे पुलिस के पास गया और पूरी बात बता दी।
इधर बाकी लोगों को जरा भी अंदाजा नहीं था कि उनका साथी पुलिस को खबर कर चुका है।
कुछ ही देर बाद पुलिस ने पूरे शमशान को चारों तरफ से घेर लिया।
अचानक रात के सन्नाटे को चीरती हुई पुलिस की सीटियाँ बजने लगीं।
पहले तो उन लोगों को समझ ही नहीं आया कि हो क्या रहा है। फिर पुलिस ने अचानक वहाँ छापा मार दिया। चारों तरफ से घिर जाने के कारण किसी को भागने का मौका भी नहीं मिला। सभी को पकड़ लिया गया।
चौकीदार की मिलीभगत भी सामने आ गई, इसलिए पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया।
अगले दिन अखबार में यह खबर प्रमुखता से छपी—
“शमशान में चल रहा था असामाजिक गतिविधियों का अड्डा, पुलिस ने छापा मारकर पूरे गिरोह को पकड़ा।”
लोगों ने खबर पढ़ी तो हैरान रह गए।
किसी ने कहा, “इंसान अपने स्वार्थ के लिए शमशान को भी नहीं छोड़ता! जहाँ मृत आत्माओं की शांति के लिए लोग आते हैं, वहाँ भी अपने गलत कामों का अड्डा बना लिया।”
सच ही है, कुछ लोग लालच में इतने अंधे हो जाते हैं कि उन्हें सही और गलत का फर्क भी दिखाई नहीं देता। उनके लिए बस पैसा चाहिए—चाहे वह किसी भी रास्ते से आए।
लेकिन इस कहानी में सबसे बड़ी बात यह रही कि शमशान में बजती सीटियों को उन्होंने गंभीरता से नहीं लिया। अगर उनका अपना साथी पुलिस को खबर नहीं करता, तो शायद पुलिस का ध्यान भी इतनी जल्दी उस जगह की ओर नहीं जाता। वे लोग इतने चुपचाप अपना काम कर रहे थे कि किसी को शक तक नहीं हुआ।
ऐसा ही कई बार बंद पड़े मकानों के साथ भी होता है। लोग उन्हें भूतिया मकान समझकर वहाँ जाना छोड़ देते हैं और कुछ असामाजिक तत्व ऐसे सुनसान स्थानों का गलत फायदा उठाने लगते हैं।
लेकिन गलत काम चाहे जितनी भी चुपचाप किया जाए, एक न एक दिन उसका पर्दाफाश हो ही जाता है।
उस रात शमशान में बजती सीटियाँ सिर्फ पुलिस के आने की आवाज नहीं थीं, बल्कि उन लोगों के गलत कामों के अंत की घोषणा थीं।
अंत भला तो सब भला—पूरा गिरोह पकड़ा गया।
स्वरचित कहानी
विमला जैन
