Aliya Firdous

Tragedy


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Aliya Firdous

Tragedy


सपनों की दुनिया

सपनों की दुनिया

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हम्म्म एक रोज़ मैं एक ऐसी हसीन ख्वाब में गुम हो गई, जिसे अल्फाजों में बयां करना थोड़ा मुश्किल है।। लेकिन हकीकत में वह एक ख्वाब था। एक ऐसा ख़्वाब जो अगर मुकम्मल हो जाए तो यकीन करना मुश्किल है। मैं उस बात का जिक्र करूं उससे पहले या बता दो शायद उस दिन जो मैंने ख्वाब में देखा जो ख्वाब था वह सालों से मेरी जीवन में उठ रहे कुछ सवालों के जवाब थे। 

ख्वाब की शुरुआत कुछ इस तरह होती है। खूबसूरत वादियां, ऊंची ऊंची पहाड़ियां, घाटियों के बीच बहती झीले, बर्फ की चादर से ढकी पहाड़े केसर की खुशबू, सेब के पेड़। यह कोई फिल्म का दृश्य नहीं था यह तो एक ख़्वाब था। आप समझ ही गए होंगे मैं किस खूबसूरत जगह को बयां कर रही हूं। मैं कभी वहां गई नहीं उस जगह पर जिक्र सिर्फ कहानियों, कविताओं, अखबारों और न्यूज चैनलों पर सुना था। इसलिए वह मेरी अब तक की जिंदगी का सबसे खूबसूरत ख्वाब है या फिर अभी तो ख्वाब की शुरुआत हुई है l, सच कहूं तो जितना सुना था उस जगह के बारे में जितना सोचा था उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत वह ख्वाब में लग रहा था। पर तभी एक घर नजर आता है, पक्का नहीं था लेकिन उस घर में बिछी कालीन बहुत सुंदर थी।। तभी नजर एक औरत पर पड़ती है। शायद वह कुछ मिट्टी के चूल्हे पर बना रही थी। एक लड़की बगल में ही बैठी कुछ लिख रही थी। लड़की का लिबास काफी सुंदर था। उसने बहुत सुंदर झुमके पहन रखे थे। तभी एक मर्द की आवाज आती है। वह उस लड़की के अब्बू थे। वो रसोई में घुसते हैं और पानी मांगते हैं पर लड़की नहीं उठती है। उसकी अम्मी कुछ देर बाद उन्हें पानी देती है। वह लड़की की तरफ गुस्से से देखते हैं और कहते हैं -यह तुम क्या कर रही हो? लड़की कहती है मैं लिख रही हूं। तभी उसके अब्बू उसकी कलम छीन लेते हैं। वह गुस्से में कहते हैं -तुम इल्म हासिल करके क्या करोगी। हमारे साथ तो क्या हो जाए हमें कुछ पता नहीं होता ना जाने कितने कितने दिनों तक स्कूल की गेट में ताले लटके रहते हैं कितने कितने दिनों तक हमारी घाटी में कर्फ्यू लगी रहती है, कब आंतकवादी हमला कर दें। कब हम किसी की गोलियों के शिकार बन जाए। यह बोलते -बोलते हुए अचानक रो पड़ते हैं। लड़की भी रोने लगती है। उसके अब्बू बोलते हैं मुझे तुम्हारे इल्म हासिल करने से कोई मसला नहीं है। लेकिन डर है तो दो मुल्कों के बीच पिसते इस घाटी का जहां ना जाने कब क्या हो जाए।

लड़की कहती है लेकिन अब्बू इल्म पर तो सबका हक है। फिर हम क्यों इतने बेबस हैं। हमारी मुल्क़ की के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लोगों की जिंदगियां तो हमसे बेहतर है। हमारी घाटी की तो उस कायनात का जन्नत कहा जाता है। लेकिन इन घाटियों के बीच गूंजती ख़ौफ़ और दर्द कीआवाज़ कोई क्यों नहीं सुन पाता है। जन्नत तो इस तरह नहीं होता क्या हमें इल्म हासिल करने का हक नहीं, आजाद रहने का हक नहीं।  

उसके अब्बू चुप रहते हैं। उसकी अम्मी जो इतनी देर से खड़ी बातें सुन रही थी वह कहती है ऐसा नहीं है बेटा हम भी मुल्क के बाकी हिस्सों में रहने वाले लोगों की तरह है। सिर्फ फर्क यह है कि हमारा फैसला सरहद के दोनों तरफ बैठे वज़ीर -ए -आला के हाथों में है। यह वादियां यह आबों -हवा, यह शीतल झरने वाकई इस दुनिया की दूसरे हिस्सों में ऐसा नजारा ना होगा। एक दिन हमारी घाटी भी अपने परिभाषा के अनुरूप जन्नत बन जाएगी। अमन का पैग़ाम देगी। लेकिन वह दिन कब आएगा? पता नहीं बेटा लेकिन क्या हम इल्म हासिल करके अपने हालातों को नहीं बदल सकते हैं क्या हम पत्थरों की जगह हाथों में किताबें नहीं थाम सकते हैं। भाई जान क्यों चेहरे ढ़ककर हाथ में पत्थर उठाते हैं। क्या उन्हें पता नहीं हम अमन परस्त लोग हैं।

तभी उसके अब्बू कहते हैं, तुम्हारे हमारे सोचने से हालात बदले नहीं जा सकते। तभी एक दौड़ता हुआ व्यक्ति दरवाजे पर दाखिल होता है और कहता है -आपके बेटे को चोटें आई हैं वह पत्थरों से घायल हो गया है सभी दौड़ते हुए बाहर निकलते हैं। तभी कुछ लोग चिल्लाते हैं घाटी में हिंसक झड़प शुरू हो चुकी है। सभी एक दूसरे को देखते हैं। लड़की वही पड़े पत्थर पर बैठ जाती है और सोचती है क्या हमारी घाटी वाकई जन्नत है। लेकिन जन्नत में केवल खूबसूरती नहीं होती अमन भी होता है, चैन भी होती है, मजहब के नाम पर लड़ाइयां नहीं होती। तभी मेरा ख्वाब भी टूट जाता है। लेकिन वह ख्वाब मेरे जेहन में किसी स्याही के छाप की तरह छप गई है।

मेरी आंखें खुलती है मैं सोचती हूं मेरे आगाज तो खूबसूरत वादियों से हुआ था लेकिन अंत हिंसक झड़प पर खत्म हुई। शायद वाकई कश्मीर में अमन एक ख्वाब ही हैं। क्यों कश्मीर के लोग दो मुल्कों के बीच पीस रहे हैं क्या उन्हें अमन और चैन से जीने का हक नहीं क्या उन्हें हाथों में कलम थामने का हक नहीं क्या उन्हें इल्म हासिल करने का हक नहीं।

वह तो महज एक ख्वाब था जो मैंने देखा था लेकिन हकीकत इससे परे। नहीं मैं तो उस घाटी में रहने वाले लोगों के हक में केवल दुआएं ही कर सकती हूं, मेरी दुआ है-

बर्फ से ढकी घाटी, आबो - हवाओं में केसर की खुशबू बिखेरी घाटी, मेरी दुआ है तुम एक दिन अपने अंदर अमन को समेट लोगी। जिस तरह तुम्हारे अंदर पूरी कायनात की खूबसूरती है।

मेरा सपना भले ही थोड़ा अजीब है लेकिन यह पूरी तरह सच है।

   


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