स्पंदन पहली नजर का
स्पंदन पहली नजर का
"कहे तोसे सजना तोहरी दुलहनिया , पग पग लिये जाऊँ तोहरी बलाईयाँ "....शारदा सिन्हा जी की सुमधुर आवाज जैसे जैसे कानों में घुलती जा रही थी , मैं अपने अतीत में खोयी जा रही थी ।
अपने पहले प्यार की मधुर यादों को कैसे अपने से दूर करूँ। अतीत की धुँधला चुके आईने में अब भी तुम्हारा चेहरा साफ झलकता है । ...इसके भीतर आज भी हमारे प्रेम की पहली अनछुई अनुभूति धड़कती है । प्यार क्या होता है , क्यों होता है , इन सबसे मैं अनजान थी । ये सब मुझे पता ही नहीं था । मैं अल्हड़ सी लड़की हमेशा मौज मस्ती में ही जीती थी ।यही मेरी जिंदगी थी ।
ऐसे ही एक ढलती हुई सांझ को मैं छत पर खड़ी थी कि तभी पड़ोसवाली छत पर किसी के आने की आहट सुनकर उत्सुकता से उधर देखा । बगलवाला मकान क कुछ दिनों से खाली था , माँ कह रही थी दो तीन दिन हुए उसमें कोई आया है । लेकिन पहचान नहीं हुई थी । देखा हमारी ही उम्र का एक लड़का खड़ा था ।.पता नहीं उम्र का तकाजा था या प्रकृति ने ही कोई संकेत दिये थे कि आँखें बरबस ही तुम पर जा टिकी थीं । ढलती शाम की लालिमा तुम्हारे गोरे चेहरे पर छाई थी , तभी तुम्हारा ध्यान मेरी तरफ गया ।मैंने फौरन अपनी आँखें झुका ली ।देर तक हम छत पर ही खड़े रहे ।वो पहली नजर की छुअन , वो पहला एहसास मैं कब अपने भीतर महसूसने लगी , मुझे पता ही नहीं चला ।
हमारी मुलाकातें होती रहीं , पर दोस्तों की तरह ।.जब भी मैं छत पर जाती , अगर वहाँ तुम भी होते , तो मन हवा में तुम्हारे साथ को महसूस कर रोमांचित हो जाता ।हमारी मुलाकातें प्यार भरी मुलाकातों में बदलने लगी थीं ।
हमारे साथ साथ हमारे परिवारों में भी घनिष्टता बढ़ती गयी । अब हमारा मिलना और भी आसान हो गया ।साल कब बीत गया पता ही नहीं चला ।एक दिन घर के सभी लोग किसी रिश्तेदार के यहाँ गए थे कि तभी तुम आ गए ।तुम्हें कोई किताब चाहिए थी और मैं किताब लेने कमरे में चली आई । तुम भी आकर मेरे पीछे खड़े हो ग ए । तुम्हें अपने पीछे एकदम से खड़े देखकर , मैं कितना डर गयी थी , याद है तुम्हें ?...हमें एक दूसरे की धड़कनें साफ सुनाई दे रही थीं । अचानक से तुमने मेरा दुपट्टा उठाकर मेरे सिर पर ओढ़ा दिया , मैंने आईने में देखा तुम मुस्कुरा रहे थे ।तुम्हारी आँखों में जैसे सारी कायनात का प्यार उमड़ आया था । कितना पवित्र प्रणय निवेदन था ।बिना बोले भी सब कुछ तो कह दिया था तुमने । जैसे पूर्ण अधिकारों के साथ तुमने अपने जीवन में शामिल कर लिया था मुझे । मौन स्वीकृति दे दी थी ईश्वर के सामने कि मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ ।हम दोनों ने ईश्वर से प्रार्थना किया कि हमारा बंधन अटूट रहे , कहीं से गाने की आवाज आ रही थी " कहे तोसे सजना तोहरी दुलहनिया , पग पग लिये जाऊँ तोहरी बलाईयाँ ... " ... इस गाने ने हमारे बंधन को संपूर्ण सहमति दे दी थी । लेकिन कभी मन का किसी को मिला है क्या । पापा ने मेरी शादी कहीं और तय कर दी ।तुम भी शहर छोड़कर चले गए थे ।मुझे शिकायत थी तो बस नसीब से , तुम और तुम्हारा प्यार मुझसे छीन गया था ।
बाहर दरवाजे पर बजी कालबेल ने मुझे अतीत से वर्तमान में ला दिया ।दरवाजा खोला तो ऋषभ था । ऋषभ मेरा बेटा । " मम्मी क्या हुआ , क्यों उदास हो , ऐसे अकेले में चुपचाप क्यों हो ? एक साथ बहुत प्रश्न कर डाले थे उसने ।
", नहीं कुछ तो नहीं हुआ '" साड़ी के पल्लु से अपनी आँखों केकोरों को पोंछते हुए कहा ,
"ये बताओ तुम कहाँ थे अब तक " .?
" मैं आपको बताना भूल गया , मम्मी आज गौरव का बर्थडे था , सो मैंने बाहर ही खाना खा लिया ।" ऋषभ पार्टि के बारे में काफी कुछ बता रहा था मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था । क्योंकि मैं तुम्हारी यादों में ही खोयी थी ।
आज तुम अपनी दुनिया में खुश हो , पर तुम हर पल मेरी बातों में , उदासी ,में खुशियों में , ख्वाबों में साथ हो , बस मेरे पास नहीं । बस...इतनी गुजारिश है , मुझे तुम उतने मिल जाओ , जितने तुम याद आते हो।

