सोच का फर्क
सोच का फर्क
आज हरिहर बहुत खुश है .. इतना खुश है कि आने जाने वाले लोगों को मिठाई खिला रहा है ... हम उधर से ही जा रहे थे उबड़ खाबड़ रोड पर साइकिल चलाना मुश्किल हो रहा था, हम पूरी तल्लीनता से साइकिल चला के हरिहर के घर के सामने से निकल ही रहे थे की उसने रोक लिया। “और देवधर बाबू रुक जा हो .. सुबह सुबह खरगोश की तरह किधर जात हो .. आवा तनि के मुँह मीठा कई ल तो जा।" हम तनिक जल्दी में थे रुकना नहीं चाह रहे थे पर हरिहर पहली बार मुँह मिठा करा रहा है इस बात पर हमें बड़ा अचम्भा हुआ .. खैर साइकिल पीछे की और हरिहर के घर के दरवाजे पर आ कर साइकिल से उतर गये और गमछा से चेहरा पोंछने लगे इतने में I बाबू हाथ में बड़ा सा कटोरा में दूध की बनी बर्फी थी लिए हमारे तरफ आये और .. हमारे तरफ कटोरा बढ़ा दिया .. हमने भी संकोच वश 1 मिठाई उठा ली .. उठाते वक़्त हमने पुछ ही लिया “एक बात पूछे भैया बुरा तो न मनिहो न ... एको मिठाई कौने ख़ुशी में बनल बाटे हो।" हरिहर जैसे इसी मौके की तलाश में बैठा था .. .वो तपाक से बोल बैठा .. “ अरे तेको नहीं पता का .. हमरी ललिया को पड़िया हुई है”.. कुछ देर तक समझने की कोशिश करते रहे की ललिया किसका नाम है किसी इंसान का या भैस का क्योंकि ललिया नाम इंसान का होता है और पड़िया भैस को होता है पर फिर हम समझ ही गए की हरिहर भाऊ ने भैस का नाम ही ललिया रखा होगा जब हमें बगल में बंधी नई पड़िया दिखाई दी , हमने बधाई दी और चुपचाप खिसक लिए ... अब इस घटना को २ महीने भी नहीं बीते थे की हरिहर बाप बन गया है उसकी जोरू ने एक बच्ची को जना है .. हम तो एकदम से खुश हो गए की चलो लक्ष्मी आई है इस बार फिर से मिठाई खाने का मौका मिला पिछले बार संकोच वश 1 ही तो मिठाई उठा पाए थे इस बार पूरा कटोरा चाट जायेंगे हमने तुरंत ही अपनी साइकिल निकली और हरिहर के घर के तरफ निकल लिए .. हम सोच रहे थे की गाना बज रहा होगा , महिलाये सोहर और पता नहीं का का गाती है माइक पर गा रही होगी पर जब हम वह पहुंचे तो सन्न रह गए एक दम मरघट जैसा सन्नाटा पसरा हुआ था .. हमने साइकिल एक तरफ लगायी और घर के अन्दर की तरफ चल दिए देखा हरिहर चौखट पर मुँह लटकाए बैठा है .. “का हो हरिहर बाबु कैसन हो ??आज इतना ख़ुशी का दिन है और तुम आज मिठाई नहीं खिलायो .. ले आवो आज पूरा कटोरा चाट जाबे हम” “काहे की मिठाई देवधर बाबु बिटिया हुई है .. बेटवा नहीं हुआ है .. जो मिठाई खिलावत फिरे” “पर पिछली बार तो बछिया की मिठाई खिलाय रहो वहु तो जनाना है .. और इ तो लक्ष्मी है .. फिर ... हमारी बात बीच में ही काट कर हरिहर बोल पड़ा “देखो देवधर बाबु .. भैस .. गाये में जब जनाना यानी कन्या होत है न तब ओनकर कुल बढ़त है और हम इंसान के कुल तब बढ़त है जब हमने के यहाँ नर यानी लड़का होत है” हरिहर की बात सुनकर .. हमें दोगले मानसिकता का आभास हुआ और फिर बिना उसे एक शब्द कहे अपने घर को वापस लौट आये।
