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chandraprabha kumar

Inspirational

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chandraprabha kumar

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श्रावणी रक्षाबन्धन

श्रावणी रक्षाबन्धन

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 आज भी जब भी रक्षाबन्धन पर्व आता है, मन बचपन की पुरानी यादों से घिर जाता है। इस दिन देवपूजा के बाद बहनें पूर्वाभिमुख भाई की दाहिनी कलाई पर है राखी बॉंधती हैं , भाई सिर कपड़े या रुमाल से ढक लेते हैं ,भाई को चावल रोली का तिलक लगा मुँह मीठा कराती हैं जवें की खीर से। जवों को सेंवई भी कहते हैं। जवें रक्षाबन्धन से कुछ दिन पहिले ताजे तोड़े जाते हैं। भाई राखी बँधवाने के बाद बहिन को कोई उपहार या रुपये देते हैं। इस दिन पूर्णिमा का व्रत भी रखा जाता है, पवित्र नदियों में स्नान का भी महत्त्व है। 

 भाई छोटा हो या बड़ा , वह बहिन को रूपये देता है। भाई छोटा हो तो पिता जी उसको रुपये पकड़ाते हैं बहिन को देने के लिये। मुझे यह भेद भाव अच्छा नहीं लगता था । भाई की मंगलकामना से विजय कामना से बहिन स्नेहपूर्वक राखी बॉंधती है, भाई बहिन के सम्मान की रक्षा करता है,नारी के गौरव की रक्षा करता है, राष्ट्र की रक्षा करता है। रक्षा बन्धन स्नेह का अमूल्य बन्धन है , इसका बदला धन देकर नहीं चुकाया जा सकता। 

 भाई से बदले में रुपये क्यों लें । मैं तो इसी कारण राखी बॉंधने से ही मना कर दिया करती थी। न मुझे राखी बॉंधनी, ना रुपये लेने। और मैं भाई को रक्षा कवच के रूप में ऐसे ही रक्षासूत्र राखी दे देती थी। बदले में पैसे नहीं लेती थी। 

      राखी से पूर्व घर में पूजा होती थी, सोन लिखे जाते थे, जवें तोड़े जाते थे, गणेशजी विष्णुदेव एवं लक्ष्मीजी एवं देवी देवताओं की पूजा होती थी। पंडित जी पूजा कराने आते थे। सोन पूजा होती थी।सभी कार्य में मैं भी सहयोग देती थी। पूजा घर में ,घर के मुख्य दरवाज़े के दोनों ओर , रसोई और हर कमरे के दरवाज़े के दोनों ओर गेरू से सोन लिखे जाते थे जिनमें “ राम राम सीताराम” आदि लिखा जाता था। सोन लिखने से पहिले छोटी सी चौकोर जगह को पहले गाय के गोबर से लीपकर फिर पिसे चावल को घोल से लीपकर तब सूखने के बाद गेरू से लिखते थे। आजकल कहीं कहीं यह सब नहीं करके बाज़ार में मिलने वाले स्टिकर लगा देते हैं ।

  रक्षाबन्धन का पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है।इसे श्रावणी, सावनी या सलूनो और राखी भी कहते हैं। इस दिन चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र में होता है इसलिये इस मास को श्रावण कहते हैं। वैदिक काल में श्रावणी पूर्णिमा को श्रावण के एक मास के यज्ञ की पूर्णाहुति होती थी। गुरु इस पूर्णिमा को शिष्य को रक्षासूत्र बॉंधकर आशीर्वाद देता था। पुरोहित यजमान को रक्षासूत्र बॉंधते थे। इन्द्राणी ने युद्ध में जाते समय इन्द्र को रक्षासूत्र बॉंधा था। कालान्तर में यह भाई -बहिन के अटूट स्नेह का त्यौहार बन गया। कन्याओं द्वारा राखी बॉंधने में नारी की गरिमा बढ़ जाती है। नारी को मॉं बहिन और पुत्री की नज़र से देखने का भाव है। आत्म रक्षा, धर्म रक्षा, राष्ट्र रक्षा राखी के तीन धागों में होती है। राखी बँधवाने के बाद गुरुजनों को या बहिन को पैसे बाँटना आवश्यक नहीं। बहिन भिक्षुक नहीं है कि पैसे के लोभ से राखी बॉंधने का प्रयोजन हो। 

  श्रावणी पर्व ज्ञान की साधना का पर्व माना गया है। इस दिन पुराना यज्ञोपवीत बदलकर नया धारण करते हैं। अर्थात् ज़िम्मेदारियों नए सिरे से स्मरण करते हैं। राष्ट्र की आध्यात्मिक शक्ति को पुंजीभूत करने का पर्व है। इसे ब्राह्म पर्व भी कहते हैं। वेद अध्ययन का प्रारम्भ इसी तिथि को किया जाता था। इसी दिन गुरुकुल में नए छात्र प्रवेश पाते थे। श्रावणी के पुण्य पर्व पर वृक्षारोपण किया जाता था। फूलों की सुगन्ध एवं सौन्दर्य से नेत्र और मस्तिष्क को बड़ी शीतलता मिलती है। 

  कुछ सदियों से रक्षाबन्धन पर्व भाई बहिन के स्नेह के पर्व के रूप में प्रसिद्ध हो गया है। कथा आती है कि देवी लक्ष्मी ने दानवराज बलि को भाई बनाकर राखी बॉंधने थी और विष्णुदेव को बदले में पाया था जो बलि के द्वारपाल बने थे। इस दिन कॉवड़ यात्रा भी सम्पन्न होती है। गुरू पूर्णिमा से शुरू हुई अमरनाथ की छड़ी यात्रा का समापन श्रावण पूर्णिमा को होता है। 

    कोई कोई भाई रक्षाबन्धन के दिन बहिन को रूपये नहीं देना चाहते। वे कहते हैं कि बहिन को रुपये क्यों दें। काफ़ी पहिले की बात है -हमारे ससुराल की तरफ़ के एक मामाजी थे।वे कई भाई थे, संयुक्त परिवार था। पर सब भाईयों के लड़कियॉं ही लड़कियॉं थी, पुत्र केवल एक था। इन सब बहिनों के बीच में केवल एक भाई था। कुछ बड़ी बहिनें तो शादी होकर चली गईं थी। पर फिर भी घर में ग्यारह छोटी बहिनें थी। इकलौता भाई भी ज़्यादा बड़ा नहीं था, स्कूल में पढ़ रहा था। राखी का त्यौहार आया। पूजापाठ के समय तो भाई था पर जब पूजा के बाद राखी बॉंधने का टाईम आया तो भाई नदारद हो गया,सब जगह खोजा, नहीं मिला। बहिनें राखी लिये बैठी रह गईं। सब कुछ निबट जाने के बाद भाई प्रकट हुए। 

उनसे पूछते-“ कहॉं गये थे, राखी बँधवाने के समय।”

तो उनका जवाब होता-“ ग्यारह ग्यारह बहिनें हैं। सब से राखी बँधवाता, और एक एक रुपया भी देता तो मेरे ग्यारह रुपये निकल जाते।”

फिर सफ़ाई देते-“ मुझे रुपये मिलें हैं तो बहनों को क्यों दूँ? इन्हें अपने पास रखूँगा। “बहिनें रुपये लेने के लिये राखी नहीं बॉंधती। बहिनें भाई की रक्षा और कल्याण की मंगलकामना के साथ राखी बॉंधती है और भाई को स्मरण दिलाती हैं कि बहिन की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी भी उनकी है। नारी की तरफ़ कुदृष्टि डालने वाले को सबक सिखाने का कर्तव्यपालन है। नारी सुरक्षा लिये पति पर ही नहीं भाई पर भी निर्भर थी। किसी अत्याचारी द्वारा नारी पर बलात् अत्याचार न हो। 

    रक्षाबन्धन का पर्व सब प्रकार से मंगलमय है। सैनिकों को बहिनें राखी भेजती हैं कि वे विजयी हों। पर्व से वातावरण में पवित्रता और देव अनुग्रह का अनुदान मिलता है। अपनी सॉंस्कृतिक महानता का बोध बना रहता है और उसके प्रति गौरव की अनुभूति होती है।


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