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Kumar Rahman

Crime Thriller


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Kumar Rahman

Crime Thriller


शोलागढ़ @ 34 किलोमीटर भाग-9

शोलागढ़ @ 34 किलोमीटर भाग-9

10 mins 350 10 mins 350

लापता

सार्जेंट सलीम को गायब हुए 24 घंटे से ज्यादा हो गए थे। पहले दिन जब वह शाम तक नहीं लौटा तो सोहराब ने कई बार उसका फोन मिलाया था। हर बार एक ही जवाब मिलता रहा, ‘नॉट रीचेबल’। सोहराब ने सोचा कि वह तफरीह करने कहीं दूर निकल गया है। उसे ज्यादा फिक्र नहीं हुई।

सलीम जब रात में भी नहीं लौटा और न ही उसका कोई मैसेज ही आया तो इंस्पेक्टर सोहराब को फिक्र होने लगी। उसने श्रेया का मोबाइल नंबर भी मिलाया। उसका नंबर भी बंद था। सोहराब को मालूम था कि सलीम उस से ही मिलने गया था। दूसरे दिन सुबह फोन मिलाने पर स्विच्ड ऑफ बताने लगा।

दोपहर को एक खबर पुलिस को मिली। मिनी कूपर हीरा नदी किनारे एकांत में खड़ी थी। सलीम का मोबाइल सर्विलांस पर लगा दिया गया था। मोबाइल की आखिरी लोकेशन भी नदी के पास ही मिली थी। 

इंस्पेक्टर कुमार सोहराब की घोस्ट तेजी से हीरा नदी की तरफ वाले रास्ते पर जा रही थी। इंस्पेक्टर मनीष भी उसके साथ था। कार सोहराब ड्राइव कर रहा था।

मनीष पहली बार घोस्ट पर बैठा था। कार तेजी से भागी जा रही थी। कार का सस्पेंशन गजब का था। मनीष को ऐसा लग रहा था कि कार सड़क पर तैर रही है।

तकरीबन आधे घंटे के सफर के बाद वह दोनों नदी के करीब पहुंच गए। सोहराब ने सड़क के किनारे कार रोक दी। वह सागौन के पेड़ों के बीच से पैदल जाने के लिए बने रास्ते पर चल दिए। कुछ दूर जाने के बाद नदी की तरफ गहरी ढलान शुरू हो गई।

काफी गहरी और सीधी ढलान थी। इस पर चलना मुमकिन नहीं था। इंस्पेक्टर सोहराब जैसा मजबूत जिस्म का आदमी तेजी से नीचे की तरफ दौड़ रहा था। मनीष कुछ दूर तो दौड़ा लेकिन उसके बाद उसके पैर उखड़ गए। मनीष गिर पड़ा था और तेजी से लुढ़कता हुआ नीचे जाने लगा। आगे चल रहे सोहराब ने उसे संभाल लिया और उसे पकड़े हुए नीचे उतरता चला गया।

कार के पास दो सिपाही ड्यूटी दे रहे थे। उन्होंने सैल्यूट मारा था। इंस्पेक्टर सोहराब ने हाथों पर रबर के दस्ताने चढ़ा लिए। उसने पहुंचते ही कार का मुआयना शुरू कर दिया। कार की छत बंद थी। चाबी इग्नियेशन में लगी हुई थी। कार में जोरआजमाइश के कोई भी निशान नजर नहीं आ रहे थे।

सोहराब कार से बाहर आ गया। उसने मनीष से कहा, “दोनों इसी कार से यहां तक पहुंचे थे, लेकिन सवाल यह है कि वह आए किधर से थे।”

“मतलब ?” मनीष ने पूछा।

“कार के अंदर से लेडीज परफ्यूम की महक आ रही है। जाहिर सी बात है सलीम तो उसे यूज करेगा नहीं। सबसे अहम बात यह है कि कोई और रास्ता भी यहां तक आने के लिए नहीं है। वरना उस ढलान से कार तो यहां तक आने से रही।”

इंस्पेक्टर सोहराब ने रेत पर से कुछ उठा लिया। वह हेयर क्लिप थी। उसने क्लिप को पहचान लिया था। जब श्रेया, शेयाली के डूबने वाले दिन आई थी, तब भी उसने यही क्लिप बालों में लगा रखी थी। शायद यह उसकी फेवरेट थी। सोहराब ने क्लिप को जेब के हवाले कर दिया।

इसके बाद सोहराब नदी की तरफ बढ़ गया। वह जमीन पर बैठ कर रेत पर बने पैरों के निशान देखने लगा। नदी के किनारे गीली रेत पर कई सारे पैरों के निशान बने हुए थे। उन निशानों का बारीकी से निरीक्षण करने के बाद वह खड़ा हो गया। मनीष भी पास ही खड़ा उन निशानों को गौर से देख रहा था।

अगर समुंदर होता तो यह निशान मिट गए होते, क्योंकि समुंदर में साहिल की तरफ लहरें आती हैं। नदी सीधे बहती है, इसलिए निशान अब तक बचे हुए थे।

“इन पैरों के निशानों में एक भी सार्जेंट सलीम का नहीं है। उसके जूतों के सोल की डिजाइन अलग है।” सोहराब ने मनीष से कहा, “ऐसा लगता है कि यहां से सलीम और श्रेया को बेहोश करके नाव या स्टीमर के जरिये कहीं ले जाया गया है।”

“बेहोशी का अंदाजा कैसे हुआ आपको ?” मनीष ने ताज्जुब से पूछा।

“नदी के किनारे कुल पांच जोड़ी पैरों के निशान नजर आ रहे हैं। चार जोड़ी पैरों के निशान काफी गहरे हैं। इसका मतलब साफ है कि उन्होंने कोई भारी चीज उठा रखी थी। दूसरी अहम बात, सार्जेंट सलीम पांच लोगों पर अकेले ही भारी था।” सोहराब ने कहा।

“यह भी तो हो सकता है कि उन्होंने सलीम साहब को हथियारों के दम पर बेबस कर रखा हो ?” मनीष ने पूछा।

“अगर ऐसा होता तो सलीम के जूतों के सोल भी नजर आते, क्योंकि तब वह अपने पैरों पर खड़ा होता। यह सोचना भी हास्यास्पद है कि उन लोगों ने सलीम और श्रेया को हांथों पर टांगने के बाद हथियारों से बेबस कर रखा था।” सोहराब ने उसे समझाया।

सोहराब की इस बात पर मनीष खामोश हो कर दूसरी तरफ देखने लगा।

“अहम बात यह भी है कि वह उन दोनों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते हैं। अगर जान लेनी होती तो इतनी मशक्कत करने की जरूरत नहीं थी।” इंस्पेक्टर सोहराब ने कुछ सोचते हुए कहा, “मिनी को रोड तक ले जाना है। आओ पहले रास्ता तलाशते हैं।”

तकरीबन एक किलोमीटर तक घूमने के बाद उन्हें सड़क तक कार को ले जाने का एक रास्ता मिल गया। यह एक चौड़ा रास्ता था। यहां ढलान भी कम थी।

कुछ देर बाद घोस्ट और मिनी कूपर शहर की तरफ रवाना हो गई। मिनी को मनीष ड्राइव कर रहा था। दोनों सिपाही मोटरसाइकिल से वापस आ रहे थे।

पिटाई

इंस्पेक्टर कुमार सोहराब एक कुर्सी पर बैठा सिगार पी रहा था। यह एक तहखाना था। तहखाने में तेज रोशनी का बल्ब जल रहा था। एग्जास्ट फैन की हल्की खड़खड़ाहट इरिटेटिंग थी। एक आदमी तहखाने के दरवाजे के पास बड़े आराम से खड़ा माचिस की तीली से कान साफ कर रहा था।

उसकी एक आंख बंद थी। ऐसा लगता था कि उसे इस काम में बहुत आनंद आ रहा है। वह आदमी काफी मजबूत कद-काठी का था। कनपटी की हड्डियां उभरी हुई थीं। थोड़ी पर एक गहरे जख्म का निशान भी था। सर पर बाल छोटे थे। उसका रंग काला था। चेहरे से ही लग रहा था कि काफी काइंयां इनसान है।

“तो क्या फैसला लिया जैकब। साफ-साफ बात करें या फिर पिटने के बाद बताओगे!” सोहराब ने सपाट लहजे में पूछा।

“मैंने कोई जुर्म नहीं किया है।” जैकब ने बड़ी ढिठाई के साथ कहा।

“यह फैसला बाद में होगा। अभी जो मैं पूछ रहा हूं उस बारे में बात करते हैं।” इंस्पेक्टर सोहराब ने सिगार का कश छोड़ते हुए कहा, “तुम उस रेस्टोरेंट में वेटर बन कर काम करने क्यों गए थे ?”

“रेस्टोरेंट में काम करना क्या सरकार ने जुर्म घोषित कर दिया है ?”

“सवाल के जवाब में सवाल नहीं।” सोहराब ने शांत लहजे में कहा।

जैकब कुछ नहीं बोला।

“जब कोई बदमाश कुछ दिनों के लिए अचानक शरीफ बन जाए तो मेरे लिए यह दिलचस्पी की वजह बन जाता है।” सोहराब ने उसे घूरते हुए कहा।

“मैंने अपने सारे धंधे बंद कर दिए हैं। मैं रेस्टोरेंट में काम करने इसलिए गया था, क्योंकि मैं खुद का एक रेस्टोरेंट खोलना चाहता हूं।” जैकब ने सफाई दी।

“पिटे बिना मुंह नहीं खोलोगे तुम।” सोहराब ने फैसला सुनाया।

“मैं वापस जा रहा हूं।” जैकब ने फैसला सुनाते हुए कहा।

इसके साथ ही वह मुड़ कर सीढ़ियां चढ़ने लगा। कुछ सेकेंड में ही सोहराब उसके सर पर था। उसने पीछे से कॉलर पकड़ कर उसे नीचे खींच लिया।

जैकब सोहराब के हाथों पर आ रहा। इसके साथ ही उसने सोहराब के थोड़ी पर पूरी ताकत से घूंसा मारा। सोहराब ने अपना चेहरा फुर्ती से पीछे कर लिया। इसके साथ ही उसने जैकब को दाहिने तरफ की दीवार पर दे मारा।

दीवार से टकराने के बाद जैकब चारों खाने चित हो गया। उसका माथा फट गया था और उससे खून का फव्वारा फूट पड़ा था। खून उसकी एक आंख में भीनभर गया था।

जैकब में गजब की फुर्ती थी। वह तेजी से उठा और जेब से चाकू निकाल कर सोहराब पर छलांग लगा दी। कुमार सोहराब इस हमले के लिए पहले से ही तैयार था। उसने एक भरपूर पंच उसके मुंह पर मारा। वह लड़खड़ाकर औंधे मुंह जमीन पर आ रहा। उसका होंठ फट गया और वहां से भी खून बहने लगा। चाकू दूर जा गिरा। सोहराब ने चाकू उठा कर जेब में डाल लिया।

जैकब उठने की कोशिश कर ही रहा था कि सोहराब ने एक भरपूर लात उसके पीठ पर मारी और वह चारों खाने चित हो गया। वह कुछ देर यूं ही पड़ा रहा।

कुछ देर बाद सोहराब ने उसे हाथों से उठा कर पास पड़ी कुर्सी पर बैठा दिया। वह बैठ कर हांफने लगा।

सोहराब ने जेब से रूमाल निकाला और पास रखी पानी की बोतल से भिगो कर उसके चहरे के जख्म साफ करने लगा। वह गौर से सोहराब का चेहरा देख रहा था। जख्म साफ करने के बाद सोहराब ने उसे पीने के लिए पानी भी दिया। पानी पीकर वह सीधा होकर बैठ गया।

“बहुत टाइम खराब कर दिया। चलो अब फटाफट बताना शुरू करो।” सोहराब का लहजा नर्म था।

“मैं कुछ नहीं बता सकता।” उसने मुस्कुराते हुए कहा।

“ओके। मैं तुम्हें इसी तहखाने में सड़ने के लिए छोड़े जा रहा हूं। जब मर जाओगे तो लाश किसी गटर में फिंकवा दी जाएगी।” यह कहने के साथ ही सोहराब उठ कर खड़ा हो गया। वह तेजी से बाहर की तरफ जा रहा था।

“मैं सब कुछ बताने के लिए तैयार हूं।” पीछे से आवाज आई।

सोहराब पलट पड़ा। उस आदमी ने दोबारा कहा, “मेरी एक शर्त है।”

“अपराधी शर्तें नहीं सुनाया करते।” सोहराब के लहजे में तल्खी थी।

“वह बहुत खतरनाक है। आपको मेरी जिंदगी की गारंटी लेनी होगी।”

“क्या चाहते हो ?”

“जब तक वह पकड़ा न जाए। आप मुझे किसी फर्जी केस में जेल में डाल दीजिए।”

“मंजूर है।” इंस्पेक्टर सोहराब ने कहा, “मैं सवाल दोहराऊं या फिर तुम बताना शुरू करोगे।”

“मैं चरस का धंधा करता हूं। यह तो आप को पता ही है। एक दिन सप्लाई देने वाले आदमी ने कहा कि तुम्हें किसी रेस्टोरेंट में नौकरी करनी है। मैंने पूछा था कि कैसी नौकरी ? तो उसने एक पाउडर वाली शीशी देते हुए कहा था कि वहां खाने के लिए आने वाले नौजवानों के खाने में एक चम्मच यह पाउडर मिलाना होगा तुम्हें। इस छोटे से काम के लिए उसने मुझे पूरे 25 हजार रुपये भी दिए थे।”

“बचा हुआ पाउडर कहां है ?” सोहराब ने पूछा।

“पाउडर खत्म हो गया था।”

“पाउडर देने वाला वह आदमी कहां मिलेगा ? उसकी कोई पहचान ?”

“वह कारों को बदल-बदल कर आता है। सिर्फ कार के शीशे से उसका हाथ निकलता है। या फिर जो कहना होता है वह अंदर से ही बता देता है। वह जगह बदल-बदल कर मिलता है।”

“अगर इसमें से कोई बात भी झूठी निकली तो तुम्हारी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होगी।” सोहराब ने कहा और उसने कोतवाली इंचार्ज मनीष के नंबर डायर कर दिए।

सलीम को नहला-धुलाकर वह दोनों महिलाएं उसकी कुटिया में लेकर आ गईं। उसे एक बड़े से जंगली पत्ते को बिछाकर बैठा दिया गया।

कुछ देर बाद उन्होंने उसके सामने एक बड़ा सा पत्ता रख दिया। पहले उस पर गीला-गीला सा चावल रखा गया। यह लाल रंग का छोटे-छोटे दाने वाला अजीब सा चावल था। इसे कुड़िया कहते हैं। उसके बाद आग पर भुना हुआ गोश्त चावल के बीचों बीच रख दिया गया।

सलीम को तेज भूख लगी थी। वह तेजी से खाने लगा। उसने यह भी नहीं सोचा था कि यह गोश्त किस चीज का है और चावल का स्वाद अजीब सा क्यों है।

कुड़िया एक तरह का अनाज होता है। कुड़िया, सांवा और कोदौं यह तीनों ही चावल की तरह के अनाज हैं। इन्हें अभी भी कहीं-कहीं पर उगाया जाता है। कुड़िया का चावल पकने पर लाल रंग का हो जाता है। कितना भी कम पानी डाला जाए, लेकिन पकने पर पिचपिचा रहता है। इसका स्वाद भी आम चावल के मुकाबले बुरा होता है।

सलीम को जागे हुए कई घंटे गुजर गए थे। अजीब बात यह थी उसकी अभी तक किसी से कोई बात नहीं हुई थी। उसने इस बारे में अब तक सोचा भी नहीं था। फिलहाल वह इस वक्त खाने पर हाथ साफ कर रहा था। भुना हुआ गोश्त और कुड़िया का चावल उसे बहुत लजीज लग रहे थे।

खाना खाने के बाद उसके होश दुरुस्त हुए। नींद न जाने टूटी खाट... भूख न जाने बासी भात.... प्यास न जाने धोबी घाट... प्रेम न जाने जात-कुजात। सलीम को यह मुहावरा याद हो आया।

खाना खा चुकने के बाद उसे नींद आने लगी। वह फिर लेट कर सो गया। कुछ ही देर बाद उसके खर्राटे गूंजने लगे।

जब उसकी आंख खुली तो शाम ढल रही थी। उसे एहसास हुआ कि कोई उसके बालों में हल्के-हल्के उंगली फिरा रहा है। वह चौंक कर उठ बैठा। उसने देखा कि उसके सिरहाने शेयाली बैठी हुई थी। शेयाली ने मुस्कुराते हुए उसके होंठों पर

रेस्टोरेंट का क्या चक्कर था ?

सलीम को शेयाली कैसे मिल गई थी ?

इन सवालों के जवाब पाने के लिए पढ़िए जासूसी उपन्यास ‘शोलागढ़ @ 34 किलोमीटर’ का अगला भाग...


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