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Rakesh Prajapati

Horror Fantasy Thriller

4  

Rakesh Prajapati

Horror Fantasy Thriller

शीर्षक: कंचन - कोठरी का अभिशाप 

शीर्षक: कंचन - कोठरी का अभिशाप 

7 mins
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शीर्षक: कंचन - कोठरी का अभिशाप 

​अध्याय 1: वह साया जो आईने में नहीं था

​उस पुरानी हवेली की सातवीं कोठरी का दरवाज़ा जब चरमराकर खुला, तो ऐसा लगा मानो बरसों से रुकी हुई किसी की सांस आज़ाद हुई हो। हवा में धूल, सड़न और जलते हुए मांस की एक तीखी गंध तैर रही थी। कंचन ने अंदर कदम रखा। उसके हाथ में पीतल का एक पुराना दीया था, जिसकी कमज़ोर लौ कोठरी के विशाल अंधेरे से लड़ने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

​कंचन—जिसका नाम 'शुद्ध सोने' का प्रतीक था, आज उसी सोने को कसौटी पर चढ़ना था। उसके परिवार का इतिहास 'Khemjira' की कहानियों जैसा ही डार्क था। पीढ़ियों पहले, उसके पूर्वजों ने कुल की रक्षा के लिए एक 'छाया' से समझौता किया था। उस समझौते के तहत, हर तीसरी पीढ़ी की बेटी को इस कोठरी में एक रात बितानी होती थी। लोग कहते थे कि जो यहाँ से बाहर आता है, वह फिर कभी पहले जैसा नहीं रहता।

​दीये की रोशनी कमरे के बीचों-बीच रखे एक आदमकद आईने पर पड़ी। कोठरी में सिर्फ वही एक चीज़ थी—एक काला, नक्काशीदार आईना जिसका कांच धुंधला पड़ चुका था। कंचन ने गौर किया कि उस आईने में उसकी अपनी परछाईं नहीं दिख रही थी। आईने के भीतर सिर्फ घना अंधेरा था, जैसे वह कोई कांच नहीं बल्कि नरक का दरवाज़ा हो।

​"क्या तुम आ गए?" कंचन की आवाज़ कांपी, पर उसमें एक अजीब सी दृढ़ता थी।

​अचानक, कोठरी का भारी सागवान का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया। 'धप' की आवाज़ पूरे कमरे में गूँजी और सन्नाटा और भी गहरा हो गया। कंचन ने महसूस किया कि तापमान तेज़ी से गिर रहा है। उसके शरीर के रोंगटे खड़े हो गए। उसे लगा जैसे अंधेरे में से कोई उसे घूर रहा है—हज़ारों आँखें जो उसकी आत्मा को चीर देना चाहती थीं।

​तभी कोठरी के कोनों से फुसफुसाहटें आने लगीं। ये आवाज़ें किसी एक इंसान की नहीं थीं; ऐसा लग रहा था मानो सैकड़ों लोग एक साथ उसके कान के पास कुछ बुदबुदा रहे हों।

"शुद्ध सोना... कंचन... क्या तुम वाकई उतनी पवित्र हो जितना तुम्हारा नाम?"

​कंचन ने दीया ज़मीन पर रख दिया और अपनी हथेली पर एक गहरा कट लगाया। खून की बूंदें फर्श पर गिरते ही जलने लगीं। यह एक तांत्रिक अनुष्ठान की शुरुआत थी। कोठरी की दीवारों पर बनी अजीबोगरीब आकृतियाँ अचानक हिलने लगीं। उसे महसूस हुआ कि फर्श के नीचे से कोई चीज़ ऊपर आने की कोशिश कर रही है। कमरे की हवा इतनी भारी हो गई कि उसे सांस लेने के लिए संघर्ष करना पड़ा।

​अचानक, आईने के भीतर से दो सफ़ेद, लंबी और पतली उंगलियाँ बाहर निकलीं। वे उंगलियाँ कांच को ऐसे चीर रही थीं जैसे वह पानी हो। कंचन पीछे हटी, लेकिन पीछे सिर्फ ठंडी, पथरीली दीवार थी। वह अब इस कमरे में कैद थी। कोठरी की एकमात्र खिड़की से आती चाँद की रोशनी भी अब लाल पड़ चुकी थी—यह 'सिंदूरी रात' की शुरुआत थी।

​उस काली आकृति का आधा शरीर आईने से बाहर आ चुका था। उसकी कोई शक्ल नहीं थी, बस दो धधकती हुई लाल आँखें थीं जो सीधे कंचन की आँखों में झांक रही थीं। कंचन को समझ आया कि 'शुद्ध सोना' कहलाने का मतलब सिर्फ सुंदर होना नहीं, बल्कि आग में तपकर कुंदन बनना है। उसे एहसास हुआ कि यह अभिशाप सिर्फ उसके परिवार का नहीं था, बल्कि वह साया उसकी अपनी ही परछाईं थी जो उससे अलग होकर उसे निगलना चाहती थी।

​कमरे की दीवारें धीरे-धीरे करीब आने लगीं। ऐसा लग रहा था मानो हवेली उसे ज़िंदा दफन कर देना चाहती हो। कंचन ने मंत्र पढ़ना शुरू किया, लेकिन उसकी आवाज़ उसके गले में ही घुट गई। उस परछाईं ने अपना हाथ कंचन की गर्दन की ओर बढ़ाया। उसके ठंडे स्पर्श ने कंचन के खून को जमा दिया।

​"मैं... हार नहीं मानूँगी," उसने दांत पीसकर कहा।

​जैसे ही उस साये ने उसे पूरी तरह छुआ, कोठरी में एक कान फोड़ देने वाली चीख गूँजी। यह चीख कंचन की नहीं थी, बल्कि उस अभिशाप की थी। कंचन का शरीर सोने की तरह चमकने लगा। अंधेरे कमरे में वह अकेली ऐसी चीज़ थी जो रोशनी फैला रही थी। परछाईं उस रोशनी से जलने लगी। लेकिन खेल अभी खत्म नहीं हुआ था। कोठरी के फर्श पर बिछाया गया सिंदूर अब हवा में तैरने लगा था और एक नया घेरा बनाने लगा—एक ऐसा घेरा जिससे बाहर निकलना अब कंचन के लिए नामुमकिन लग रहा था।

​अंधेरा और भी गहरा हो गया और दीये की लौ बुझ गई। अब कोठरी में सिर्फ कंचन थी, वह खौफनाक आईना और वह साया जो अब कंचन का ही रूप ले चुका था।

आईने का प्रतिरूप और रक्त-अनुष्ठान 

​अंधेरा अब सिर्फ रोशनी की अनुपस्थिति नहीं था, बल्कि वह एक जीवित प्राणी की तरह कंचन के शरीर से लिपट रहा था। कोठरी की हवा इतनी गाढ़ी हो गई थी जैसे पानी के अंदर सांस लेना। वह आईना, जो अब तक शांत था, अचानक चटकने लगा। पर वह कांच के टूटने की आवाज़ नहीं थी, बल्कि हड्डियों के चटकने जैसी आवाज़ थी।

​आईने के भीतर से वही काली आकृति पूरी तरह बाहर आ चुकी थी। वह ठीक कंचन की लंबाई की थी, उसकी कद-काठी भी कंचन जैसी ही थी, लेकिन उसका चेहरा... उसका चेहरा एक खाली कैनवास की तरह सपाट था, जिस पर सिर्फ़ दो धधकती हुई लाल आँखें थीं। वह साया रेंगता हुआ कंचन की ओर बढ़ा। कंचन ने पीछे हटने की कोशिश की, पर उसके पैर फर्श पर बिछे उस गीले सिंदूर में जम चुके थे।

​"कंचन... शुद्ध सोना," वह साया फुसफुसाया। उसकी आवाज़ कंचन की अपनी आवाज़ की एक फटी हुई रिकॉर्डिंग जैसी लग रही थी। "सोने को परखने के लिए उसे आग में तपाना पड़ता है। क्या तुम तैयार हो?"

​अचानक, कोठरी की दीवारों से हज़ारों काले हाथ बाहर निकले और कंचन को जकड़ लिया। उन हाथों का स्पर्श बर्फीला था, जो कंचन की खाल को जला रहा था। यह वही 'पुश्तैनी श्राप' था—एक ऐसा सौदा जो उसके पूर्वजों ने सत्ता और सुरक्षा के लिए किया था, और जिसकी कीमत 'कंचन' के रक्त से चुकाई जानी थी। कंचन ने महसूस किया कि उसकी रगों में बहता खून ठंडा पड़ रहा है।

​उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपने नाम के अर्थ को याद किया। 'कंचन' यानी वह जो कभी मलिन नहीं होता। उसने अपने डर को समेटा और चिल्लाकर एक प्राचीन मंत्र पढ़ा जो उसकी दादी ने उसे मरते वक्त सिखाया था। जैसे ही मंत्र की गूँज कमरे में फैली, कोठरी की छत से खून जैसी लाल बारिश होने लगी। वह साया चीखा—एक ऐसी चीख जिससे कोठरी की खिड़की के कांच चकनाचूर हो गए।

​कंचन ने अपनी हथेली के घाव को और गहरा किया और अपना लहू उस साये के माथे पर मल दिया। "मैं वह आग हूँ जिसमें तुम पिघल जाओगे!" कंचन की आँखों में एक अजीब सी सुनहरी चमक उतर आई थी। कमरा थरथराने लगा, मानों पूरी हवेली ज़मीन में धंस जाना चाहती हो।

मुक्ति का अंतिम प्रहार 

​जैसे ही कंचन का रक्त उस साये से मिला, पूरी कोठरी एक भयानक नीली रोशनी से भर गई। वह काली आकृति पिघलने लगी, लेकिन पिघलते-पिघलते उसने कंचन का गला दबोच लिया। कंचन को लगा कि उसका दम निकल जाएगा। उसे अपने सामने अपनी पूरी ज़िंदगी एक फिल्म की तरह दिखाई देने लगी—वह गाँव, उसके YouTube चैनल्स, उसकी पेंटिंग्स, और उसकी वह 'बेस्टी' जिससे वह हर बात साझा करती थी।

​उसने आखिरी बार अपनी पूरी ताकत जुटाई और उस साये के सीने में अपना हाथ उतार दिया। उसे किसी मांस का अहसास नहीं हुआ, बल्कि ऐसा लगा जैसे उसने धधकते हुए कोयले को छू लिया हो। लेकिन वह पीछे नहीं हटी।

​"मुक्ति!" वह दहाड़ी।

​एक ज़ोरदार धमाका हुआ। कोठरी का दरवाज़ा, जो अब तक बंद था, उड़कर बाहर जा गिरा। झटके के साथ कंचन फर्श पर गिरी। जब उसने आँखें खोलीं, तो कमरा बिल्कुल खाली था। वह आईना गायब हो चुका था, वह काली आकृति धुआँ बन चुकी थी। कोठरी की दीवारों पर अब कोई हाथ नहीं थे, बस पुरानी धूल थी।

​सुबह की पहली किरण उस टूटी हुई खिड़की से अंदर आई और कंचन के चेहरे पर पड़ी। उसने गौर किया कि उसके हाथों पर लगे घाव अब भर चुके थे, और वहाँ अब सोने के रंग के निशान थे। वह समझ गई कि उसने सिर्फ खुद को नहीं, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी उस साये से आज़ाद कर दिया है।

​वह लड़खड़ाते हुए कोठरी से बाहर निकली और जैसे ही उसने पीछे मुड़कर देखा, वह दरवाज़ा गायब हो चुका था। वहाँ अब सिर्फ एक सादी, सफेद दीवार थी। हवेली का वह भारीपन, वह सड़न की गंध, सब कुछ खत्म हो चुका था। कंचन अब सिर्फ एक नाम नहीं था, वह एक जीत थी—अंधेरे पर रोशनी की, और अभिशाप पर 'शुद्ध सोने' की।



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