रिश्ते प्यार और विश्वास के
रिश्ते प्यार और विश्वास के
मम्मी जब आप मां होकर हमारी बात नहीं समझ रहीं तो बताइए हम आपकी गलत बात को कैसे समझें। और रही बात हमारे लिए कुछ खरीदने की। तो भैया हमें बिन मांगे हर तीज-त्योहार पर हर मौके पर हमारी पसंद से ज्यादा अच्छे उपहार देते हैं।
उनका यह मुश्किल वक्त है तो इसमें हम उनसे बिना फालतू की फरमाइश करें। या जबरदस्ती आप हमारे लिए कुछ करवाएं तो हमें अच्छा नहीं लगता। जब उनके हालात अच्छे हो जाएंगे। हम फिर से फरमाइश करके जो लेना होगा लगेंगे। फिर से सब पहले की तरह हो जाएगा। और मम्मी हमें नहीं चाहिए आपका यह मकान। हमें हमारा मायका चाहिए।
जो आप के बाद हमारे दोनों भाइयों से के होने से रहेगा। मम्मी आप यह क्यों नहीं सोचती आप कितने दिन रहेंगी आपके बाद कौन हमें पूछेगा। और कल को भैया भी कह देंगे कि क्यों दोनों बहनों को पूछें। दोनों बहनों ने मिलकर हमारे घर में लड़ाई कराई थी। बेटियों के सिखाए में आकर माँ ने हम से लड़ाई की। इसलिए मम्मी भैया के साथ मिलकर रहिऐ। मम्मी जितना ख्याल आपका भैया और भाभी रखते हैं इतना तो हमसे भी नहीं हो पाएगा। फिर तो आप हमारे अंदर भी कमी निकालने लगेंगी। बेटियां मेरी सेवा अच्छे से नहीं कर रही है।
मम्मी आप मेहमान बनकर चाहे जितने दिन के लिए वहां आ सकती हैं। लेकिन आपको यही भैया के साथ रहकर हमारा मायका रखना पड़ेगा।
दोनों बहनों की बातों ने कविता जी को सोचने पर मजबूर कर दिया था। उन्हें सोचते देखकर विभा बोली।
"मम्मी कोई मुसीबत पड़ने पर या परेशानी आने पर अगर अपने साथ देते हैं। तो वह परेशानी बड़ी नहीं लगती। लेकिन उसके उलट परेशानी पड़ने पर जब अपने वक्त की नजाकत को नहीं समझते। और घर में लड़ाई करते हैं या बात-बात पर क्लेश करते हैं।
तो वह मुसीबत और भी ज्यादा बड़ी लगने लगती है। आप ही तो हमें यह बात बताया करती थी। फिर आप क्यों भूल रही हैं। मम्मी यह मुश्किल दौर भी आपस के प्यार और मोहब्बत से निकल जाएगा।"
"मैं भी तो तुम्हारी मम्मी को कब से यही समझा रहा हूं। लेकिन यह समझे तब ना।" दिनकर जी बोले जो रवि के पास थे। बेटियों की आवाज सुनकर रवि के साथ वहीं आ गए।
"मम्मी आपको लगता है मैं इस मकान के लिए आपकी सेवा या देखभाल कर रहा हूँ । तो मम्मी आपकी यह बहुत बड़ी गलतफहमी है। आपसे इसलिए मोहब्बत या लगाव नहीं रखता, क्योंकि मुझे मकान चाहिए। आप चाहे तो यह मकान मेरी दोनों बहनों में से किसी को भी दे दे या बड़े भैया को दे दें।
मैं अपनी कमाई से कुछ वक्त बाद ले लूंगा। लेकिन मम्मी अभी मेरा यह जो वक्त है आपको उसमें मेरे साथ मिलकर रहना पड़ेगा। फिर भी मैं आपकी हर जरूरत को पूरा करूंगा जितना मेरे से होगा उससे ज्यादा कर लूंगा। लेकिन मम्मी आपको यह ताने यह जली कटी बातें छोड़नी पड़ेंगी। सबके समझाने पर सविता की कुछ कुछ बात समझ में आ रही थी। और वह सोचने पर मजबूर हो गई थी
और पिछली बातें याद करने लगी कि कैसे बड़े बेटे बहू उनकी बातें बर्दाश्त नहीं कर पाए थे और वह भी उन्हें छोड़कर चले गए थे तब उन्होंने रवि की शादी की। दोनों बेटियों की शादी की वह रवि से पहले ही कर चुकी थी।वह कितना काम करती थी। बीमारी में भी लगी रहती थी। तब रवी की शादी होने के बाद। सौम्या ने उनसे कहा था।" मम्मी आपने बहुत काम कर लिया अब आपका आराम करने का समय है" और तब से आज तक उसने उनसे कोई काम करने के लिए नहीं कहा था। बल्कि वह तो उनकी हर बात चुप लगाकर सुनती थी। कभी पलट कर जवाब नहीं दिया था।
और रवि भी हर बार उनकी बात सुनकर चुप रह जाता था। वह तो आज ना जाने क्यों वह बर्दाश्त नहीं कर पाया। शायद बच्चों की बीमारी और माली हालत की वजह से वह पूरी तरह से टूट गया था। शायद यही वजह है कि वह उनकी जली कटी बातें बर्दाश्त नहीं कर पाया और आज उन्हें जवाब दे बैठा। उन्होंने भी तो हद ही कर दी थी।
उन्होंने सारी अपनी जिंदगी ऐश में गुजारी थी। उनके पति की कमाई अच्छी थी और उन्हें कभी किसी चीज की कमी नहीं आई थी। उन्होंने आगे को लिए ना जोड़कर बस जो है अब है, कि बिना पर सब कुछ अपने और अपने बच्चों के ऊपर खर्च कर दिया था। उन्होंने कभी कोई मुश्किल भरा समय नहीं देखा था। जो अब वह रवि के मुश्किल समय को समझ पाती।
उन्हें आज अपनी गलती नजर आ रही थी। फिर भी अपनी अकड़ और बड़े पन के चलते वह माफी मांगने में हिचकिचा रही थी।
उनकी हालत को समझते हुए रवि ने कहा।
"मम्मी मैं नहीं चाहता कि आप माफी मांगे या मेरे आगे झुके या मेरे बीवी बच्चों के आगे झुके। मैं बस यह चाहता हूं कि आप हमारे साथ मिलकर बस खुशी से रहे मेरे हालात को समझे बस।" रवि की बात सुनकर सविता जी की आंखें भर आई और बोली।
" आप सही कह रहे थे रवी के पापा! मैंने कभी अपनी जिंदगी में कोई परेशानी नहीं देखी। इसलिए शायद मैं अपने बच्चे की परेशानी नहीं समझ पाई। लेकिन अबसे यह नहीं होगा मैं अबसे हर दुख सुख में अपने बच्चों के साथ ऐसे ही मिलकर रहूंगी।" और फिर रवि की तरफ देख कर बोली।
" रवी! तुम कहो तो मैं सोम्या से भी माफी मांग लूंगी।" सौम्या जो अभी बच्चों को लेकर आई थी। वह उनके पैरों में छूकर बोली।
" मम्मी जी! आप कैसी बात कर रही हैं। मैं आपसे माफी मंगवाऊंगी। मेरी मां नहीं है, मैंने हमेशा आपको ही अपनी मां समझा है। इसीलिए आज तक कभी आपको पलट कर जवाब नहीं दिया और अब आप मुझसे माफी मांगने की बात कर रही हैं। बड़े आदेश देते अच्छे लगते हैं माफी मांगते नहीं।
सौम्या की बात सुनकर सविता जी ने उसे गले लगा लिया
समाप्त.
