रिश्ते प्यार और विश्वास के
रिश्ते प्यार और विश्वास के
माता-पिता और बच्चों की जिद के आगे उसने हां तो कर दी थी लेकिन अब वह फिक्रमंद हो रहा था कि क्या करें।
उसने सोचा चलो अपने दोस्त से उधार ले लेता हूं नहीं तो वह मम्मी यही कहकर उसका जीना हराम कर देंगी। कि उसने अपने माता-पिता की वजह से बच्चों को मेला दिखाने के लिए मना कर दिया। और रवि अपने दोस्त से पैसे उधार लेकर अपने परिवार को मेला दिखाने के लिए ले गया। लेकिन उसने सोमया से कह दिया कि मेरे पास पैसे ज्यादा नहीं है। इसलिए सोच समझ कर खर्च करना सोमया तो जाना नहीं चाहती थी लेकिन रवि ने कहा।
"सब जा रहे हैं फिर तुम क्यों यहां रुक रही हो। अकेले तुम्हारे यहां रुकने से क्या हो जाएगा तुम भी चलो।"
और सोमया भी साथ आ गई। मेले में आकर बच्चे बहुत ज्यादा खुश थे। और रवि के माता-पिता भी रवि ने सबको अच्छे से मेले में घुमाया और फिर वह मार्केट की तरफ आ गए वहां से सविता जी सामान खरीदने लगी कि मैं यहां की मशहूर नान खटाई अपनी बेटियों के लिए लेकर जाएंगे। कि मेले में आए हैं और बेटियों के लिए कुछ लेकर नही जाएं यह अच्छा नहीं लगता।
सोमया ने कुछ नहीं कहा। क्योंकि अगर वह कुछ कहती तो सविता जी वही मेले में ही उसे सुनाना शुरू कर देती। कि वह नंदों को देने से खुश नहीं रहती।
फिर सविता जी को कुछ ड्रेसेस दिखाई थी तो उन्होंने यह भी अपनी बेटियों के लिए खरीद ली। फिर अपनी बेटियों के लिए और ना जाने क्या क्या सामान खरीद लिया।
बच्चे भी खिलौनों के लिए जिद कर रहे थे। तब रवि ने बच्चों को एक-एक खिलौना दिला कर उन्हें समझा दिया कि बेटा यहां पर बहुत महंगे हैं। हम बाहर से ले लेंगे अब तुम इनसे खेलो बच्चे भी समझ गए। लेकिन सविता जी नहीं समझ पा रही थी और वह सामान पर सामान खरीदे जा रही थीं।
सोमया का मन भी वहां के सामान को देखकर खरीदने का हो रहा था। लेकिन वह अपनी पती की हालत अच्छे से जानती थी। इसलिए उसने अपनी ख्वाहिशों को दबा दिया। की मम्मी तो खरीदारी कर ही रही है, जाएगा तो सब घर में ही। लेकिन सविता जी तो सिर्फ अपने और अपने बेटियों के लिए खरीद रही थी उन्हें रुकते ना देख कर रवी ने आखिर उन्हें टोक ही दिया।
"मम्मी अब बस रहने दीजिए और सामान हम बाद में ले लेंगे।"
"क्यों भई जब मेले में आए हैं तो यहीं से लेकर जाएंगे।" रवि के टोकने पर दिनकर जी भी समझाने लगे। लेकिन संगीता जी चिढ़ गई और कहने लगी।
" हां भई जब बीवी आ जाती है। तब तो मां-बाप से रिश्ता ही खत्म समझो बेटे का। फिर तो बस बीवी और बच्चे ही अच्छे लगते हैं। उनकी ही फरमाइशी अच्छी लगती है। क्या मां-बाप और क्या बहने। उनकी बात सुनकर सोमया को बहुत गुस्सा आया। लेकिन वह यहां मेले में कोई तमाशा नहीं करना चाहती थी। इसलिए चुप लगा गई। लेकिन सविता जी आगे बोली।
बच्चे तो इस चीज को भी नहीं समझते हैं कि जिन मां-बाप ने जन्म दिया और जिनकी वजह से उनका आगे को खानदान चलता है। उन्हीं को भुला देते हैं पुराने सामान से ज्यादा नहीं समझते। फिर तो अपनी बीवी ही अच्छी लगती है। जिन बच्चों को हमने इतने नाजों से पाला। वही देखो हमें थोड़ा सा सामान लेने पर रोक टोक कर रहे हैं। रवि का मूड बहुत ज्यादा खराब हो चुका था। उसने कहा-
" मम्मी जी आपको जो कुछ भी लेना है ले लीजिए और जल्दी घर चलिए मुझे सुबह ऑफिस भी जाना है। सविता जी को तो जैसी यही मौका चाहिए था। उन्होंने दोनों बेटियों के लिए काफी कुछ ले लिया। जो भी अच्छा लगता गया वह लेती गई और वह घर आ गए। अगले दिन सविता जी सारा सामान फैलाऐ बता रही थी। यह बड़ी बेटी के लिए यह छोटी बेटी के लिए लेकिन तभी वह सिर पर हाथ मार कर बोली।
"मैंने वहां पर बड़े ही अच्छे पैडेंट देखे थे। लेकिन रवि के टोकने से वह मेरे दिमाग से निकल गए और मैं वह नहीं ले पाई। और जब रवि के पास इतने पैसे नहीं थे। कि वह हमें कुछ दिला पाए। तो हमें मेले में नहीं ले जाना चाहिए था और पैसे नहीं होने का तो सिर्फ बहाना है। यही सब समान अगर उसकी पत्नी लेती तो वह इतनी रोक-टोक नहीं करता। क्या करें पत्नी और बच्चों के आगे मां बाप और बहन भाई कुछ नहीं लगते। बस फिर तो वही अपने होते हैं।
जारी है.......
