पृथ्वी की प्रदक्षिणा
पृथ्वी की प्रदक्षिणा
कहते हैं भगवान को हर इंसान के घर में जाना असंभव था। इस लिए भगवान ने माता-पिता बनाए। उनकी सेवा करने पर भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। इस लिए ही यह कहावत मशहूर है। मातृ देवो भव, पितृ देवो भव।
ऐसे में ही एक कहानी बड़ी मशहूर है। दो भाईयों की कार्तिकेय और गणेश जी की है।
कहानी कुछ ऐसी है दोनों भाई खेल खेल में झगड़ रहे थे और ऐसे में ही झगड़ते हुए वे दोनों अपने माता पिता याने शंकर भगवान और पार्वती देवी के पास शिकायत करने पहुंचते हैं। सब सुनने के बाद शंकर भगवान और पार्वती देवी ने दोनों से कहा की हम तुम दोनों को एक नया खेल खेलने को देते हैं। बोलो खेलोगे, दोनों भाई खेल खेलने तयार हो जाते हैं।
शंकर भगवान कहते हैं की दोनों को पृथ्वी की प्रदक्षिणा करनी है और आगे कहते हैं की देखते हैं कौन जीतता है।
ये आदेश सुनते ही कार्तिकेय अपने सवारी मोर पर बैठ पृथ्वी की प्रदक्षिणा आरंभ करते हैं, वहीं गणेश जी जहां पर शंकर भगवान और पार्वती देवी बैठे रहते हैं उधर से प्रदक्षिणा शुरू करते हैं और उन्हीं को प्रदक्षिणा कर अपनी प्रदक्षिणा पूर्ण करते हैं।
थोड़ी देर बाद प्रदक्षिणा पूर्ण होने पर कार्तिकेय आते हैं और गणेश जी को वहीं खड़ा देख शंकर भगवान और पार्वती देवी को कार्तिकेय यह कहते हैं की उनकी प्रदक्षिणा पूर्ण हो गई है और वो जीत गए हैं।
तभी गणेश जी कहते हैं की उन्होंने अपने माता पिता की प्रदक्षिणा की है और उन्हें प्रणाम कर पृथ्वी की प्रदक्षिणा की है, और ऐसा करने से ना केवल उन्होंने पृथ्वी की प्रदक्षिणा की है बल्कि विश्व की भी प्रदक्षिणा की है।
गणेश जी का जवाब सुन दोनों शंकर भगवान और पार्वती खुश हो जाते हैं।
भारत देश में ऐसी अनेक कथाएं हैं।
हमारा देश पौराणिक कथाओं का देश है।
