प्रेम नदी
प्रेम नदी
भाग -1
एकाएक टकटकी लगाए सतरह बरस की प्रीष्ठी अपने कमरे की बालकनी से चाँद को निहारे जा रही थी। मुख पर कोई भाव नहीं, बस चाँद देखना ही उसे अच्छा लग रहा था। फिर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कराहट आई और उसने पलके निचे झुका ली और पलट कर अंदर कमरे में जाने लगी… तब ही मेज पर रखा खाली पेपर देख कुर्सी पर जा बैठी और पेन हाथ में ले रंगों के नाम व गीताजी के कुछ श्लोक लिखने लगी। तब ही अचानक उसे ख्याल आया कि कल सुबह कोचिंग जल्दी जाना है। परसों उसका गणित का पेपर है और सर ने हिदायत दी थी, कि लेट हुए तो वह नहीं मिलेंगे।
प्रीष्ठी जल्दी से सो गई और अगली सुबह कोचिंग के लिए तैयार हो गई। तभी अचानक उसकी माँ कमरे में आई और बोली- "आज शाम सात बजे हमें जाना है तुझे याद है ना ?"
"अरे यार मम्मी मेरा कल पेपर है मैं नहीं जाने वाली" (मुँह बिगाड़ते हुए प्रीष्ठी ने कहा)
"इसलिए ही तुझे याद दिलाने आई हूँ जो भी हो 7 बजे तक सब पढ़ लेना 8 बजे तक चल चलेंगे तुझे यहाँ घर में अकेला नहीं छोड़ेंगे।"
( घड़ी की सुई तेज़ी से भागती हुई 7 पर आकर रुक गई।)
"7 बज गए और तू अभी तक तैयार नहीं हुई कुछ भी पहन ले ठीक लगा तो रुकेंगे वरना जल्दी घर आ जाएँगे।" (माँ ने कहा)
–"माँ मेरा मन नहीं है जाने का, आप लोग जाओ। मैं यहीं रुकूँगी।"
"नहीं, साथ ले जाना। इसको कोई यहाँ अकेला मत छोड़ना। चल अब तैयार हो जा फटाफट, नखरे मत कर।" (भाई ने कहा)
(मुँह लटकाते हुए थोड़े गुस्से भरे स्वर में प्रीष्ठी ने कहा)
"क्या पहनूँ अब?"
"जल्दी से कुछ भी पहन ले" (माँ ने कहा)
प्रीष्ठी एक सुंदर और साधारण आचरण वाली लड़की थी उसका मन दर्पण सा साफ सुथरा और पढ़ाई लिखाई में होनहार प्रीष्ठी घर के काम काज भी बखूबी जानती थी। साथ ही ईश्वर में पूर्ण आस्था रखती थी। लेकिन उसे कहीं आना जाना, बड़े लोगो में उठना बैठना पसंद नहीं था। वो अपने परिवार में ही सहज महसूस करती थी। प्रीष्ठी को कोई घर में अकेला नहीं छोड़ना चाहता मज़बूरी में उसे सबके साथ जाना ही पड़ता है ।
भाग 2
अब प्रीष्ठी को जल्दी में लाल-पीला लहरिया दुपट्टा दिखा तो उसने उसके मनपसंद ड्रेस को बेमन से ही पहन लिया। उसकी नाजुक-सी नज़ाकत, खूबसूरत-सी मुस्कुराहट, गौरा रंग, खुले लम्बे बाल, हल्की सी लाली, बड़ी-बड़ी आँखें उन पर हल्का काजल, सब उस पीले साधारण से सूट में चार चाँद लगा रहा था। लग रहा था मानो खेत में पीली-पीली सरसों सी उग आई हो और उस पर सूर्य की लाल किरणें आ रही हो, मानो जाड़े में बसंत खुद आ गया हो ।
अब जैसे ही तैयार हो वो आई पूरा परिवार फटाफट चल पड़ा।
हर साल जाड़े में भजन संध्या का आयोजन होता है पुष्कर के लोग बड़ी संख्या में अपनी उपस्तिथि देते है और बड़े-बड़े गायक कलाकार भी बुलाये जाते है। देर रात तक ये कार्यक्रम चलता रहता है लेकिन प्रीष्ठी का परिवार हमेशा की तरह डेढ़-दो बजे के करीब घर आ जाता है।
भजन संध्या में बड़े-बड़े लोगो की भीड़ देख प्रीष्ठी का हिचकिचाना शुरू हो जाता है। वो खुद को असहज महसूस करती है। कुछ देर बाद कार्यक्रम शुरू हो चला विशेष अतिथियों के स्वागत और भाषण से प्रीष्ठी बोर होने लगती है उसे बेकार सा लगता है परन्तु जब भजन उसके कानों में पड़ते है तो उसे आनंद आने लगता है। तब अचानक कल के पेपर की चिंता करने लगती है उसका मन गणित के सवालों में अटक जाता है और सोचती है कि वो अब घर चली जाए लेकिन पूरे परिवार के साथ आई है तो जा भी नहीं सकती। तभी चिंता भरा मुँह लिए वो इधर-उधर जगह का मुआयना करते हुए नज़रे घुमाए जा रही थी। तब अचानक से प्रीष्ठी की नजर दूर खड़े मंच के कार्यभार को सँभालते हुए एक 20-21 बरस के लड़के पर आ पड़ी। नारंगी कुर्ता और सफेद पजामा, साँवला रंग, मोटी आँखें, सौम्यता भरी मासूम सी मुस्कान, उसे वो भीड़ में सबसे अलग और हटके लग रहा था। लेकिन उसने उसे उस वक्त बस देखा ही फिर उसका ध्यान गणित के सवालों में आ उलझा।और घर जाने की जिद्द करने लगी तब पुरुष पांडाल में अपने पापा को ढूँढते-ढूँढते उसकी नज़र दोबारा उसी पर पड़ी।
प्रखर का धुँधला सा चेहरा उसके अंदर कब बस गया था उसे पता नहीं चला। उसका दुबला पतला शरीर उस पर भारत माँ का पुत्र होने का एक तेज़ था जो कि उसने उस एक पल की नज़र में वो सब कुछ देख लिया था, लेकिन प्रीष्ठी का मन गणित के पेपर में अटका था जिस कारण उसका ध्यान प्रखर पर नहीं रहा।
रात अपनी मौज में थी तेज़ हवा चल रही थी ठंड ने भी मुस्कुराते हुए अपना बर्फीला तूफान छोड़ दिया अब तो प्रीष्ठी थक गई थी वो अब घर जाना चाहती थी उसने माँ से कहा- "अब चले !" तब सबने सोचा अब चलते है ठंड बढ़ रही है, घर जाते-जाते तो कुल्फी जम जाएगी।
भाग- 3
अगली सुबह प्रीष्ठी जागते ही उगते हुए सूर्यदेव को नमन करते हुए प्रभात बेला का आनंद लेने लगी। वो चहचहाती चिड़िया, मुर्गियों की बांग, धीमी बहती नदी जो उसके घर के पीछे से नज़र आती है प्रकृति का अनुपम नज़ारा सब उसके मन को अंदर तक आनंदित कर रहा था। तभी सूर्य की फैल रही नारंगी नवकिरणों को देख उसकी आँखों में वो नारंगी रंग के कुर्ते में खड़ा लड़के का धुँधला चेहरा याद आ गया। अनायास ही वो उसे सोचने लगी "न जाने कौन था?" पल पल उसका महक रहा था, पर वो नहीं जानती थी कि कौन सी खुशबू है, जो उसे महका रही है। पूरा दिन उसका बड़ी खुशी और मस्ती से गुज़र रहा था। शाम का वक्त था। मंदिर में जाते वक्त मुख्यद्वार की साकल में उसका दुपट्टा अटक गया और उसे लगा किसी ने खिंचा होगा, लेकिन जब उसने पलट कर देखा वैसे ही वो प्रखर से टकरा गई और दोनों के मुँह से सिर्फ एक शब्द निकला "सॉरी" ! ये कहते हुए दोनों की आँखें चार हो गई लग रहा था रात के समय रंग-बिरंगी तितलियाँ मंडरा रही हो। वे दोनों जाने अनजाने इस एक शब्द "सॉरी" को ही दिल में उतार चुके थे। वे दोनों ही नहीं जानते थे कि उनकी ज़िंदगी में इस पल से एक नया मोड़ आ गया है।
अब प्रीष्ठी सॉरी बोल कर जाने लगी तब प्रखर का मन गुदगुदाया और वो प्रीष्ठी के आगे आ गया और उससे कहने लगा "ही मेरा नाम प्रखर है"
प्रीष्ठी मुस्कुराहट से ही उसे जवाब दे जाने लगी और प्रखर चुपचाप देखता रह गया कि इसने अपना नाम नहीं बताया। तभी प्रीष्ठी पीछे मुड़कर दोबारा मुस्कुराई प्रखर उसकी इस मुस्कान से बाग-बाग हो गया था ।
अब अगले हर दिन प्रखर, प्रीष्ठी के लिए मंदिर आने लगा। पूरे दो दिन बाद प्रखर को उसका नाम मालूम हुआ ।
प्रीष्ठी…!!
भाग 4
प्रखर ये जानकर साँतवे आसमान पर था। अब उसकी ख़ुशियों का ठिकाना नहीं था सीधा-साधा प्रखर अब गीत गुनगुनाने लगा था। हर तरफ उसे बरसते फूल नज़र आते थे। प्रखर और प्रीष्ठी दोनों ही अब रोज़ मंदिर में मिलने लगे, बातें करने लगे। धीरे-धीरे दोनों बहुत गहरे दोस्त बनते जा रहे थे। दोनों को एक दूसरे का साथ बहुत अच्छा लग रहा था। प्रीष्ठी भी दिन भर चिड़िया जैसी चहचहाती रहती थी। और इधर प्रखर अच्छे से जान गया था, कि वो प्रीष्ठी को सिर्फ पसंद ही नहीं करता बल्कि उससे बेहद प्रेम करने लगा है। अब उसके लिए प्रीष्ठी मात्र दोस्त नहीं ज़िंदगी बन गई है। वो प्रीष्ठी को जन्मों-जन्म के लिए अपनी जीवनसाथी बनाना चाहता था ।
प्रीष्ठी इस बात से अनजान कि उसके दिल में क्या चल रहा है? ये जो हलचल मची है, किस कारण है ? उसे तो बस प्रखर का साथ अच्छा लगता था, जो उसे खुद से जोड़ता था। वो जानती थी, प्रखर ही उसका सच्चा दोस्त है। उसके आगे उसे प्रेम समझ नहीं आया था। दोनों का प्रेम अपना रूप लिए जा रहा था। प्रखर ये बात जानता था तो प्रीष्ठी इस बात से अब भी अनजान थी। दिन भर की थकान और परेशानी दूर हो जाती थी, जब दोनों शाम को मिलते थे। हर शाम की तरह आज शाम भी दोनों मंदिर आये और एक दूसरे से रोज़ की तरह बात करने के लिए मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गए ।
प्रखर- "कैसी हो ?"
प्रीष्ठी- "हाहाहाहा.."
प्रखर- "क्या हुआ ?"
प्रीष्ठी- "आप रोज़ यही सवाल करते हो।"
प्रखर- "हाँ…तो, वो तो कल पूछा था ना, अब आज पूछ रहा हूँ। हर दिन अलग होता है ना।"
प्रीष्ठी- "अच्छा ठीक है। मैं अच्छी हूँ। आप बताओ… आप कैसे हो ?"
प्रखर- "मैं भी अच्छा हूँ।"
दोनों चुप हो मुस्कुराने लगते है तब ही प्रीष्ठी पूछती है।"क्या हुआ? आज कुछ कह नहीं रहे हो ?
प्रखर- "हाँ"
प्रीष्ठी- "रोज़ तो बहुत बातें करते हो आज कुछ नहीं।"
प्रखर- हाँ पर रोज़ सोचकर नहीं आता था। आज कुछ सोचकर आया हूँ।
प्रीष्ठी- "अच्छा ! क्या सोचा है?"
प्रखर- "अच्छा एक सवाल है। क्या आप प्रेम को जानती हो?"
प्रीष्ठी- "शायद!"
प्रखर- "हम्म पता…! मैं आपसे बात करता हूँ तो मुझे लगता है पेट में तितलियाँ उड़ रही है।"
"अच्छा! ( प्रीष्ठी हँसते हुए )
हाँ वैसे मुझे भी पेट में गुदगुदी होती है। अच्छा लगता है आपसे बातें करना, आप बहुत अच्छे हो।
अच्छा आप कुछ बता रहे थे प्रेम के बारे में।"
हाँ वैसे तो मैं भी प्रेम को इतना नहीं जानता पर मुझे इस छोटे से शब्द प्रेम में पूरा ब्रह्माण्ड नजर आता है। ये ख़ुशियों की बाढ़ सा है। सब अच्छा लगता है इसमें।
प्रीष्ठी प्रखर की बात सुनकर पूरी रात बार बार इसी बारे में सोचती रहती है। उसे नींद भी नहीं आती है। सुबह तक उसकी दिल में मची हर हलचल का कारण पता चल जाता है। वो समझ जाती है, कि वो कौन सी खुशबू है, जो उसका पल-पल महकाती है। उसका नाम है प्रखर…!!
भाग 5
प्रखर के प्रति अपने प्रेम के एहसास को जानने के बाद प्रीष्ठी अपनी ख़ुशियाँ काबू में नहीं कर पाती है। वो सब कह देना चाहती थी, जो-जो उसके दिल में है। वो प्रखर से मिले बिना रह नहीं पा रही थी, लेकिन जैसे-तैसे खुद को समझाकर शाम तक इंतज़ार करती है और सोचती है ये बात कहने के लिए मंदिर से अच्छी जगह ओर कहाँ होगी। गुनगुनाते हुए प्रीष्ठी अब मंदिर जाने के लिए तैयार होती है और वो वही लाल पीला लहरिया दुपट्टा वाला सूट पहनती है, जिसे पहनकर वो भजन संध्या में गई थी और उसने पहली बार वही पर प्रखर को देखा था।
अब प्रीष्ठी पहले से मंदिर में जाकर बैठ जाती है प्रखर के इंतज़ार में। उस दिन प्रखर को आने में देर हो जाती है जब तक तो प्रीष्ठी बहुत बेचैन हो जाती।प्रखर के आते ही।
प्रीष्ठी - "इतनी देर कहाँ लगा दी ?"
प्रखर - "प्रीष्ठी…प्रीष्ठी…प्रीष्ठी ! जब से तुम आई हो सब कुछ बहुत अच्छा अच्छा हो रहा है। जानती हो आज क्या हुआ ? पहले तो तुम्हें बता दूँ, मैं तुम्हें आज से तुम कहूँगा। आज मैं बहुत खुश हूँ और तुम मेरी बहुत अच्छी दोस्त ही नहीं, उससे कहीं बढ़कर हो।
हाँ…प्रीष्ठी! मैं तुमसे प्रेम करता हूँ। बाकी मैं नहीं जानता लेकिन बहुत प्रेम करने लगा हूँ और मुझे पता है, तुम भी मुझसे प्रेम करती हो ।"
( प्रीष्ठी ये सुन चौक जाती है और सोचती है उसे कुछ कहना ही नहीं पड़ा और प्रखर सब जान गया।)
"अच्छा सुनो... प्रीष्ठी मुझे इस महीने की 26 तारीख को बहुत बड़ा सम्मान मिलने वाला है सबसे कम उम्र के युवा समाज सेवी के तौर पर।"
प्रीष्ठी - "अरे वाह ! ये तो बहुत अच्छी बात है।"
इतने में प्रखर बाय कह अपने दोस्तों के साथ चले जाता है उसकी ख़ुशियों का ठिकाना नहीं रहता। वो प्रीष्ठी को ठीक से देखता ही नहीं लेकिन प्रीष्ठी प्रखर के लिए बहुत खुश थी। उसने भी दर्शन किये और घर चली गई ।
प्रखर अब बहुत व्यस्त हो गया। उस दिन के बाद वो प्रीष्ठी से मिल नहीं पाया। ना ही किसी प्रकार से उससे जुड़ा रहा, जिससे प्रीष्ठी हमेशा चिंतित रहने लगी। उसकी चहचहाती शाम अब मुरझाई सी गुजर रही थी, पर प्रीष्ठी तो सिर्फ प्रेम शब्द ही जानती थी उसने सब स्वीकार किया, जो उसे प्रखर के प्रेम में मिला। यहाँ तक कि प्रखर का इस तरह बेख़बर रहना भी। उधर प्रखर, प्रीष्ठी के ख्यालों से दूर होने लगा। पर उसका प्रेम कम नहीं था। अब उसके पास लोगो की भीड़ थी, और उसी भीड़ में प्रीष्ठी पीछे छूटती जा रही थी, पर फिर भी उसके अंदर प्रेम साँसे ले रहा था। दोनों का ये अनछुआ रिश्ता बहुत पवित्र था, दोनों में कभी ऐसी कोई चाहत ही नहीं थी। वक्त बीते जा रहा था, प्रीष्ठी प्रेम नदी के उस प्रवाह में बहती ही जा रही थी। उसका प्रेम अपने आप में गहरा होते जा रहा था। वक्त पर वक्त की परतें चढ़ने लगी, साँसों को भी घुटन हो रही थी, आखिर प्रेम में इतनी दूरी कैसे हो ?
कैसे प्रीष्ठी बिना प्रखर के रह पाए ?
भाग 6
( प्रीष्ठी खुद से कहने लगी )
"हद होती है हर चीज की! क्या एक बार भी मेरी याद नहीं आई? कोई कैसे किसी को इतना भूल सकता है?"
कुछ महीनों बाद प्रखर उसी मंदिर में मिला पर प्रखर अब प्रखर नहीं था। प्रीष्ठी के मन में सवालों की लड़ी लगी थी। पर वो प्रखर को परेशान नहीं करना चाहती थी। कुछ आगे कहती इससे पहले ही प्रखर औपचारिकता निभा कर जाने लगा।
प्रीष्ठी हैरान थी, कि अगर प्रखर इतना ही प्रेम करता है तो कैसे इस तरह मुझे भूल सकता ? उसने एक बार भी मेरे हालात जानने की कोशिश नहीं की। वो प्रखर के इस तरह के व्यवहार से बहुत आहत हो गई थी। सब समझने की कोशिश में उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। सब कुछ उसके हाथ से छूटा जा रहा था सिवाय प्रेम के…! उसने प्रेम करना नहीं छोड़ा, क्योंकि वो जान गई थी प्रेम को। उसने इन सबके बाद सिर्फ प्रेम ही चाहा और कुछ नहीं। प्रीष्ठी के प्रेम से बेख़बर प्रखर, प्रीष्ठी के मुश्किल दौर को नहीं समझ रहा था। प्रेम की आग लगाकर प्रखर नदारद था उस आग से और प्रीष्ठी उसमे जलती जा रही थी।
"मैं नहीं जानती प्रेम को और ना ही समझी हूँ, लेकिन मैं प्रेम की नदी के तेज़ प्रवाह में बहती ही चली गई। ना कुछ समझ पाई ना कुछ देख पाई केवल बहती ही गई। फिर वो बहना अचानक रुक गया बिल्कुल थम गया। कुछ वक्त बीता मैंने समझने की कोशिश की, कि मैं कहा हूँ ? पर प्रेम ठहर गया था! उसके बाद फिर से वो बहने लगा धीरे–धीरे... फिर तेज़ी से और उसका बहना फिर शुरू हो गया लेकिन इस बार मैं नहीं बही केवल प्रेम बहने लगा।क्योंकि उसने प्रेम को नहीं समझा ना ही मैंने समझा इसी समझ नासमझ में उसका प्रेम रहा, नहीं रहा और मेरा प्रेम हमेशा होकर रह गया।"
प्रीष्ठी अपने इन ख्यालों में ही बहुत उलझी हुई मंदिर की सीढ़ियों पर बैठी थी, जहाँ प्रखर और वो अक्सर साथ में बैठा करते थे। तब ही अचानक प्रीष्ठी का अंतर्मन हिलोरे लेने लगा। एक हवा का झोंका उसके चेहरे पर उसके बालों को उड़ाता हुआ पीछे गया और प्रीष्ठी ने तेज़ी से सर पीछे की ओर घुमाया और देखा…?
प्रखर! प्रखर मुस्कुराते हुए प्रीष्ठी को बाहें फैलाते हुआ पुकार रहा था। प्रीष्ठी खड़े-खड़े भरी-भरी आँखों से मुस्कुराई और दौड़ कर प्रखर के गले लग गई!! पहली बार प्रखर ने प्रीष्ठी के कोमल स्पर्श को महसूस किया था, वो पूर्णतः आत्ममुग्ध हो गया था। दोनों ने पहली बार एक दूसरे को अंदर तक महसूस किया। अब प्रखर को भी एहसास हो गया था कि वो प्रीष्ठी के बिना कितना अधूरा है। एक पल में प्रीष्ठी सिर्फ प्रखर की होकर रह गई। सिर्फ प्रखर की प्रीष्ठी!!
ये एक बहुत साधारण कहानी है जिसका अंत सुखद हुआ है। इस कहानी मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि प्रेम हमारी मर्ज़ी से नहीं होता और जब हम प्रेम में होते है तो उम्मीद चाहत साथ सब चाहने लगते और अपने आस पास सब कुछ भूल जाते है। मात्र आकर्षण के आधार पर प्रेम प्रेम नहीं होता। आकर्षण प्रेम की प्रारंभिक कक्षा है। जिसमे हमे सब अच्छा लगता है और हम समझ बैठते है, प्रेम…!!

