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Sachin Godbole

Crime Thriller


1.0  

Sachin Godbole

Crime Thriller


फ्रेंड्स लॉज - 1

फ्रेंड्स लॉज - 1

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"२ आरोपी पुलिस हिरासत से फरार।" मैं एडिटर को अपनी आज की ताज़ा खबरें दे रहा था।

"कोई नयी खबर नहीं है क्या?" एडिटर ने मुझे और मेरे वार्ताहर साथी रमेश से पूछा।

"ये आरोपी फरार होने की खबर तो रोज ही आती रहती हैं, ये टीवी, मोबाइल का जमाना है लोगों को ये सब पहले ही पता लग जाता है। कब तक हम वर्गपहेली और राशि भविष्य से पेपर चलाते रहेंगे?" एडिटर साहब थोड़े गुस्से से कह रहे थे।

हमारा 'संध्या-प्रकाश' शाम को निकलने वाला दैनिक था जो अपनी पकड़ नहीं बना पाया था। कुछ दुकानों और ट्रैफिक सिग्नलों पर थोड़ा बहुत बिकता था। विज्ञापन भी न के बराबर ही आते थे।

 

"सर हमें कोई सनसनीखेज खबर बनानी चाहिए जो किसी और को पता न हो। बात विवादास्पद हो तो और मज़ा आएगा।" रमेश ने कहा।

 

"किसी नेता का स्टिंग आपरेशन करें ?" मैंने पूछा।

"नहीं अभी हम नए हैं किसी से पंगा नहीं ले सकते।" एडिटर बोले 

"तो फिर?"

"एक बात है मेरे दिमाग में अगर तुम लोग हिम्मत करो तो"

"आप कह कर तो देखिये हम किसी से नहीं डरते।"

"फ्रेंड्स लॉज के भूत की कहानी पेश करते हैं।"

फ्रेंड्स लॉज का नाम सुनकर मुझे और रमेश को सांप सूंघ गया।

"क्या हुआ? डर गए?"

"नहीं सर। पत्रकारिता में निडर होना याने ताकतवर, गुंडे, पुलिस या नेताओं से बिना डरे अपना काम करते रहना। भूत प्रेत का मामला तो अलग होता है" रमेश बोला।

"मतलब तुम मानते हो की वहां भूत है"

"हाँ बिलकुल। वहां के कुछ कमरों से रोने की आवाज़ें आती है। लॉज में रहने वाले लोगों ने एक बार पुलिस में शिकायत भी की थी। पुलिस ने कमरे खुलवाएं थे पर कमरे में कुछ मिला नहीं। हाँ रोने की आवाज के अलावा किसी को कोई परेशानी या असुविधा नहीं होती है पर रोने का रहस्य अभी तक समझ में नहीं आया है।" रमेश डरी हुई आवाज में बता रहा था।

 

"और सुदर्शन तुम ?" एडिटर साहब ने मुझसे पूछा।

 

"मैं भूत प्रेत में विश्वास नहीं करता। भूत प्रेत होते ही नहीं हैं। लेकिन मैं ये भी नहीं कह सकता की मैं भूत प्रेत से डरता नहीं हूँ।" मैंने कहा।

 

"ये क्या बात हुई ? जिस चीज़ पर विश्वास नहीं उससे डर कैसा ?"

 

"भूत की फिल्में देखने लोग जाते हैं क्या उन्हें पता नहीं रहता की ये फिल्म है, फिर भी वो घबराते हैं। डर का प्रभाव विवेक और बुद्धि दोनों को कमज़ोर बना देता है। "

 

"थोड़ा डर भी लगे तो कोई बात नहीं लेकिन मुझे लगता है की तुम ये काम कर पाओगे। कल से ही शुरू हो जाओ। फ्रेंड्स लॉज के मालिक से मिलो और कहानी बनाना शुरू करो। १० दिन बाद के शनिवार के स्पेशल एडिशन में छापेंगे। तब तक रोज़ एक कॉलम में 'शनिवार को होगा बड़ा खुलासा" जैसा विज्ञापन देते रहो। "

 

मैंने काफी बहाने बनाकर काम टालने की कोशिश की लेकिन एडिटर ने मेरी एक न सुनी।

 

मैंने पत्रकारिता की दुनिया में अपना पहला कदम रखा था। संध्या-प्रकाश में नौकरी लिए २ महीने ही हुए थे। उसके वेतन से कानपुर जैसे शहर में बस गुज़ारा भर हो पाता था। साथ ही में पत्रकारिता का एडवांस कोर्स और अंग्रेजी की ट्यूशन ले रहा था। संध्या-प्रकाश किसी राजनैतिक पार्टी से विज्ञापन का कॉन्ट्रैक्ट मिलने के इंतज़ार में जैसे तैसे चल रहा था। मुझे भी कुछ खास काम नहीं रहता था। सुबह से टीवी और इन्टरनेट पर समाचार देखो, ४-५ थानों के चक्कर लगाओ और २ बजे अपनी रिपोर्ट जमा कर दो। फिर पूरा दिन अपना।रमेश की तो मेडिकल स्टोर्स की दुकान थी , दो भाई मिलकर दुकान चलाते थे। रमेश को साहित्य और फिल्मों का बड़ा शौक था जिसे पूरा करने के लिए वो संध्या-प्रकाश में काम करता था। वो दोपहर को दुकान की जिम्मेदारी भाई पर सौंप कर, उसके इलाके के २ थानों में चक्कर लगता हुआ ३ बजे संध्या-प्रकाश के दफ्तर आता और फिर अपनी रिपोर्ट और फ़िल्मी कॉलम जमा करता।

 

 ये फ्रेंड्स लॉज का प्रकरण बड़ा रोचक था। रमेश जो इस लॉज में भूत प्रकरण के पहले जा चुका था उसने मुझे उसके बारे में थोड़ी जानकारी दी। इसके मालिक भगवान दास चौधरी ने इसे २० साल पहले बनवाया था। तीन मंजिला इमारत में १२ कमरों की व्यवस्था थी। दूसरी और तीसरी मंज़िल पर ६-६ कमरे थे। पहली मंजिल पर रसोई, खाने का कमरा और मैनेजर का कार्यालय। पहली मंज़िल के ही एक हिस्से में चौधरी साहब और उनका परिवार रहते थे। चौधरी साहब की पत्नी की मृत्यु काफी पहले हो चुकी थी। उनके परिवार में बेटा बहू और पोता थे। तीन साल पहले उनके बेटे, बहू और पोते की रात को सोते समय हत्या कर दी गई थी। मैंने पुराने समाचार पत्रों से इस घटना की जानकारी प्राप्त की।

 चौधरी साहब उस दिन किसी काम से लखनऊ गए हुए थे। हत्यारे लॉज में ठहरने के बहाने से आए और रात को मौक़ा पाते ही पहली मंज़िल के घर में घुस गए। नींद में सोते हुए हत्या होने के कारण कोई शोर-शराबा नहीं हुआ। हत्यारे सामने मिला कीमती समान लेकर भागे गए थे ,लेकिन ये स्पष्ट नहीं हो पाया की ये हत्या लूट के लिए की गयीं थी या किसी आपसी रंजिश के चलते। दूसरे दिन सुबह जब चौधरी साहब कानपुर लौटे तो उनकी पैरों तले ज़मीन खिसक गयीं। उनका सब कुछ लुट चुका था। उनकी बरेली के पास थोड़ी ज़मीन थी जिसके कारण उनका उनके चचेरे भाइयों से विवाद चल रहा था। एक कयास ये भी लगाया गया था की हत्या उनके चचेरे भाइयों ने करवायी हैं। चौधरी ने क़ानूनी लड़ाई लड़ी। क़ातिलों को गिरफ़्तार करवाया लेकिन सबूत नहीं मिल सके। आरोपी पेशेवर क़ातिल थे और इससे पहले भी हत्या के मामलों में पकड़े जा चुके थे। लेकिन जहाँ सच को झूठ और झूठ को सच बनाना आसान हो और भ्रष्टाचार का बोलबाला हो वहाँ चौधरी साहब को न्याय कैसे मिलता। हत्यारे छूट गए। ६ महीने पहले चौधरी साहब के एक चचेरे भाई की भी संदिग्ध अवस्था में मृत्यु हो गयी। एक अफवाह यह उठी थी की ये हत्यारे पैसे लेने चचेरे भाईयों के पास गए, पैसे को लेकर कहासुनी हुई और हत्यारों ने गुस्से में चचेरे भाई की भी हत्या दी, तो कुछ लोगों के मुताबिक चचेरे भाई की हत्या चौधरी साहब के बेटे की भटकती आत्मा ने की। लोगों का ये विश्वास है आज भी उनके बेटे, बहू और पोते की आत्माएँ उस घर में आ कर रोती हैं, इंसाफ़ की माँग करती हैं, गिड़गिड़ाती हैं, मुक्ति की याचना करती हैं।

 मुझे इस पूरे प्रकरण को जान कर उस पर कहानी बनानी थी। मैं कोई बहुत हिम्मतवाला आदमी नहीं हूँ, लेकिन पहले ही डर के भाग जानेवालों में से भी नहीं हूँ। ये प्रकरण क़ानूनन पेचीदा हो या ना हो मेरे लिए बहुत मुश्किल हो गया था। पहले तो मुझे चौधरी साहब से बड़ी सहानुभूति थी और उसके कारण ये चिंता थी कि मेरे इस कार्य से मैं कहीं उनका दुःख न बढ़ा दूं। दूसरे ये हत्या का मामला है, मुझसे बहता खून तो देखा नहीं जाता, उस कमरे में कैसे जा पाऊँगा। और फिर कहीं सच में आत्माएँ आ गयीं और मेरे सामने गिड़गिड़ाने लगी तो? उस रात मैं हनुमान चालीसा पढ़ते-पढ़ते सोया।

 सुबह उठा तो थोड़ी हिम्मत आ गयी थी। ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रमा को विचारों का स्वामी कहा जाता है और सूर्य को शक्ति का। चन्द्रमा के राज्य में जो विचार शक्तिशाली होकर मुझे परेशान कर रहे थे, सुबह सूर्य के प्रभाव के कारण कमज़ोर पड़ गए थे। रात के विचार मैंने बिस्तर के साथ लपेट के रख दिए और स्नान करके सीधा निकल पड़ा फ्रेंड्स लॉज की तरफ़।

 

फ्रेंड्स लॉज पुराने शहर में ही था लेकिन उससे एकदम लग कर कोई बस्ती नहीं थी। आस पास सिर्फ खाली प्लाट, बगीचे या मैदान थे इसके कारण वो कुछ और डरावना लग रहा था। मुझे इस बात का आश्चर्य हुआ की लॉज में भूत होने ही अफवाह के बावजूद लॉज चालू था। मैं लॉज के बुकिंग ऑफिस में गया तो वहाँ तो किसी आम लॉज जैसा माहौल था। मेरी उत्सुकता बढ़ी और मैंने चौधरी साहब से मिलने से अच्छा इसी लॉज मे एक कमरा लेकर ठहरने का निर्णय लिया।

"हाँ कहिये" काउंटर पर बैठे आदमी ने पुछा।

"जी मुझे कमरा चाहिए। "

"कितने दिनों के लिए। "

"पता नहीं कितने दिन लगेंगे, बहन के लिए काफी रिश्ते आये हैं कानपुर से, उनसे मिलना है, हो सकता है १ हफ़्ता लगे या २ महीने। "

"उससे मुझे क्या मतलब? आप मुझे इतना बताइये की कमरा कितने दिनों के लिए चाहिए ?मुझे कमरा उपलब्ध है की नहीं देखना है, और हाँ २०% भुगतान अभी करना पड़ेगा, अगर जल्दी चले गए तो बाकी दिनों के ५०% पैसे भरने पड़ेंगे।"

"२ हफ़्तों के लिए। "

"ठीक है"

"नाम ?"

"सुरेंद्र कुमार" मैंने अपना असली नाम नहीं बताया।

"कहाँ से आये हैं ?"

"मेरठ का रहने वाला हूँ, लखनऊ में डॉक्टरी पढ़ रहा हूँ, अभी छुट्टियां है तो बहन की शादी के लिए थोड़ा समय निकाल कर यहाँ कानपुर आया हूँ"

 

मैं पढ़ा लिखा हूँ और अपनी बहन की शादी के लिए प्रयत्न कर रहा हूँ यह सुन कर उनके चेहरे के हाव-भाव बदले और वे मुझसे थोड़ी प्यार से बात करने लगे।

"कौन सी जाती के हो ?"

"कायस्थ। "

"यहाँ तो काफी कायस्थ परिवार हैं, चलो हम प्रार्थना करेंगे की आपकी बहन को अच्छा वर मिले।"

"आपका नाम क्या है ?"

"हनुमान सिंह, लोग सिंह साहब कह कर पुकारते हैं "

"सिंह साहब किराया कितना लगेगा?"

"२ हफ्ते याने १५ दिन का ३००० रुपया और खाना-पीना भी चाहिए तो ४५००। "

"हाँ खाना पीना तो चाहिए"

"ठीक है आप ९०० रूपए जमा कर दीजिये, सुबह चाय-नाश्ता, दोपहर और रात का खाना भी मिलेगा। दूसरी मंज़िल पर १ बैठक है वहां टीवी, अख़बार किताबें रहती हैं, कैरम और शतरंज भी खेल सकते हो अगर कोई साथ खेलने वाले मिले तो। सुबह १ घंटा गर्म पानी मिलेगा। कमरों में इस्तरी या कोई भारी इलेक्ट्रिक की मशीन का उपयोग मत करना। तीसरी मंज़िल पर आपका कमरा है ३०८ नंबर का"

"सिंह साहब दूसरी मंज़िल पर नहीं मिल सकता, बार-बार चढ़ना उतारना पड़ेगा।"

"अरे जवान आदमी और इतना आलस, चलो ठीक है २०३ नंबर ले लो लेकिन वो बैठक से एकदम लग के है थोड़ा शोर-शराबा सहन करना पड़ेगा।"

"चलेगा, ये लीजिये पैसे।"

"ठीक है, कमरा खुला ही है।"

"सिंह साहब एक और बात पूछनी थी। "

"बोलो। "

"मुझे किसी ने बताया है की यहाँ के किसी कमरे में भूत रहते हैं। "

"हा हा हा अरे भाई डॉक्टरी पढ़ रहे हो और भूत प्रेत में विश्वास रखते हो। अगर ऐसा कुछ होता तो क्या ये लॉज भरा रहता ? देखो १२ में से ९ कमरे भरे हैं। कभी-कभी लोगों को कोई आभास होता है की कोई कहीं रो रहा है, या चिल्ला रहा है, लेकिन मुझे तो कभी कोई भूत नहीं दिखा। २० सालों से काम कर रहा हूँ यहाँ, जब से लॉज शुरू हुआ तब से। "

कमरे को ताला लगाकर मैं दफ्तर गया और अपना काम शुरू किया लेकिन काम में मेरा मन नहीं लग रहा था। इंतज़ार था रात का। रात के खाने पर लोगों से मुलाक़ात करनी थी और रात को रोने की आवाज़ें भी सुननी थी।

 


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