नवप्रभात

नवप्रभात

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सुमति आज फिर उसी इत्मीनान से सीढ़ियां चढ़ती हुई ऑफिस में दाखिल हुई। वही सौम्य, संयत सजा व्यक्तित्व, वही हल्के रंग में बारीक छींट से सजी कलफ की गई सूती साड़ी। व्यवहार में कोई जल्दबाज़ी, कोई हड़बड़ाहट नहीं। कार्यालय का काम भी एक दम सधा बधा, एक व्यवस्थित कार्य प्रणालि में निबद्ध। कई बार सभी सहकर्मियों की फुसफुसाहट कि कैसे इतना व्यवस्थित काम इतने सुकून से निपटा पाती है। चेहरे हाव भाव पर एक शान्त स्निग्ध सी मुस्कान। न ज्यादा बातचीत न ज्यादा किसी से मेलजोल, पर हाँ ! किसी से मिलती तो अजनबीपन का एहसास नहीं रहता। एक पुरसुकूनियत सा, अपनेपन का औरा सुमति के चारों ओर फैला रहता।


महिला सहकर्मी अक्सर उसके इतने शांत जीवन में ईर्ष्या से भरा पत्थर फेंकती तो उसका जीवन अतीत की जल तरंगों सा आविर्धत हो उठता।


ऐसा क्या था सुमति के जीवन में जो ना चाह कर भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था। जब कोई उसके शांत जीवन में उपालंभ का तीर चलाता तो उसकी गहरी तीखी चुभन सुमति, अंतस की आखिरी सिरे तक महसूस करती। अंतर्द्वंद का फिर ऐसा अंधड़ चलता जिसमें सुमति के जीवन की एक और रात सुलगती सी बीत जाती। यूँ लगता कल की ही तो बात है स्नातक की प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान वाला और सुमति के चित्र वाला अखबार लेकर सुमति ने पूरे घर में धमाचौकड़ी मचाई थी। पिता का चौड़ा सीना, माँ का गर्व लोगों की वार्तालाप का विषय हो चला था। पढ़ाई में सदैव अव्वल सुमति प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहती थी और हुआ भी यही। अपनी बुद्धि मेहनत व लगन के बल पर सुमति प्रशासनिक अधिकारी का पद पा गई। स्वप्न आकाश में विचरण का था। अपनी मेहनत लगन के बल पर जल्द ही उसने अपने प्रशासनिक क्षेत्र में भी प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली। अपने अधिकारी प्रशिक्षण कार्यशाला के दौरान उसकी मुलाकात उसी के बैच के अजय से हुई। तेज तर्रार वेश में समाज में कुछ नया कर गुजरने का जज्बा उसकी जबान से ही नहीं उसकी विस्तारित नेत्रों से भी साफ टपकता था। लक्ष्य एक थे तो दोनों राही का मिलना तय था। जल्दी ही दोनों विवाह बंधन में बंध गए। अपने वैवाहिक रिश्ते में तालमेल बिठाते एक दूसरे की कार्य शैलियों को सम्मान देते दोनों पति-पत्नी जल्द ही अपनी निष्ठा के बल पर प्रशासनिक क्षेत्र में अपनी एक अच्छी पहचान बनाने में सफल हो गए थे।


उस रात खाने की मेज पर अजय सुमति से रेल माफिया से हुई अपनी भिड़ंत के बारे में बता रहे थे। एक पत्नी का भय सुमति की चिंता में साफ झलक रहा था लेकिन अजय उसको सांत्वना देते सही का साथ देने की बात कह उठकर चले गए। सुमति की चिंता फिर अपरिवर्तित सत्य में बदल गई। रेत माफिया के किसी भाड़े के आदमी ने अजय की जीप को अपने ट्रक से टक्कर मार सत्य और निष्ठा को मौत की नींद सुला दिया। साथ ही अजय की जीप से कुछ ऐसे आपत्तिजनक कार्यालयीन पेपर भी बरामद हुए जो अजय की सत्यनिष्ठा को चुनौती दे रहे थे। सुमति दुख के पहाड़ की चपेट में थी लेकिन अपने पति की ईमानदारी पर लगा दाग़ उसे किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं था। कोर्ट में कई वर्षों तक केस चला। सुमति की जीवन आस्था पर लगे और अपनी पति की कर्तव्यनिष्ठा पर लगे प्रश्न चिन्ह को सुमति धो डालना चाहती थी। अतीत का यही कड़वा सत्य लोगों के तमाशा, पसंद और चुटीली कहानियों की भौडी जिज्ञासा का विषय बन कर गपशप की प्रवृत्ति शांत करता रहता और सुमति अतीत से परे लोगों की अनर्गल प्रतिक्रिया से परे शांत मन से न्याय के परिणाम की प्रतीक्षा करती रही।


आज उसी न्याय का दिन था। आज अजय के केस की अंतिम सुनवाई थी। प्रशासनिक अधिकारी स्वर्गीय अजय तमाम जांचों में कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी साबित हुए। न्यायालय में कई वर्षो के अतीत से अपने स्वर्गीय पति की सद्चरित्रता को साबित करती सुमति के चेहरे पर संतोष की सुकून की वही चित परिचित मुस्कान थी जो हर अतीत पर भारी थी और समग्र अतीत से परे नवप्रभात झिलमिला रहा था।


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