नाक - 2

नाक - 2

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सुपरिंटेंडेंट कवाल्योव उस दिन कुछ जल्दी ही उठ गया, उठते ही उसने होठों से आवाज़ निकाली : “बर्र..” जो वह हमेशा ही नींद खुलने पर करता था, हालाँकि उसे इसका कारण ज्ञात नहीं था। कवाल्योव ने एक अँगडाई ली और उसने मेज़ पर रखा हुआ छोटा आईना उसके हाथों में देने का हुक्म दिया, वह उस मस्से को देखना चाहता था जो कल शाम को अचानक उसकी नाक पर उग आया था, मगर उसके होश फ़ाख़्ता हो गए, यह देखते ही कि नाक के स्थान पर एक चिकनी सफ़ाचट जगह है। घबरा कर उसने फ़ौरन तौलिया और गरम पानी लाने की आज्ञा दी, तौलिये से आँखें भली-भाँति पोंछकर दुबारा देखा: बिल्कुल ठीक, नाक थी ही नहीं। उसने हाथ से ख़ुद को चिकोटी काट कर देखा, कहीं नींद में तो नहीं है ? पता चला कि पूरी तरह जागा हुआ ही है। सुपरिंटेंडेंट कवाल्योव उछल कर पलंग से नीचे आ गया, उसने भली प्रकार अपने आप को झटका, नाक ग़ायब... उसने तत्काल कपड़े पहने और पुलिस के बड़े अफ़सर के पास लपका।

मगर कवाल्योव के बारे में कुछ कहना आवश्यक है, जिससे पाठकों को कुछ अंदाज़ हो जाए कि यह सुपरिंटेंडेंट था किस किस्म का। जिन सुपरिंटेंडेंटों को अपनी शैक्षणिक योग्यता के बलबूते पर यह पदवी मिलती है, उनका उन सुपरिंटेंडेंटों से कोई मुकाबला नहीं किया जा सकता जो कॉकेशस में बनाए जाते हैं। यह दोनों किस्में एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं। विद्वान सुपरिंटेंडेंट...मगर रूस इतना अद्भुत देश है कि यदि किसी एक सुपरिंटेंडेंट के बारे में कुछ कहा जाए, तो सभी सुपरिंटेंडेंट, रीगा से लेकर कमचात्का तक, उसे अपने ही बारे में समझेंगे। यही हाल अन्य पदवियों और उपाधियों का भी है।

कवाल्योव कॉकेशस वाला सुपरिंटेंडेंट था। वह दो साल पहले इस उपाधि से विभूषित हुआ था और इसीलिए एक मिनट भी उसके बारे में भूलता नहीं था, और तो और, स्वयम् को सम्मान एवम् वज़न देने के उद्देश्य से वह अपने आपको कभी भी सुपरिंटेंडेंट नहीं कहता, बल्कि मेजर कहता है। “सुनो, प्यारी,” वह अक्सर कमीज़ का अग्रभाग बेचने वाली बुढ़िया से सड़क पर टकराने पर कहता, “तुम मेरे घर आ जाना, मेरा फ्लैट सादोवाया रास्ते पर है, किसी से भी पूछ लेना कि मेजर कवाल्योव कहाँ रहता है ? कोई भी बता देगा।” किसी चिकनी परी से टकराने पर फुसफुसाता, “मेरी जान, मेजर कवाल्योव का फ्लैट पूछ लेना !”, इसीलिए अब हम भी इस सुपरिंटेंडेंट को मेजर ही कहेंगे।

मेजर कवाल्योव को हर रोज़ नेव्स्की एवेन्यू पर टहलने की आदत थी। उसकी कमीज़ की कॉलर हमेशा साफ़ और इस्त्री की हुई होती थी। उसके गलमुच्छे ऐसे थे जैसे पुराने ज़मींदारों के, वास्तुशिल्पियों के, सेना के डॉक्टरों के, कई पुलिस अफ़सरों के और आमतौर से उन सभी आदमियों के होते हैं जिनके गाल भरे-भरे, गुलाबी-गुलाबी होते हैं, और जो ताश के खेल में माहिर होते हैं। ये गलमुच्छे गालों के बीचों-बीच से होकर सीधे नाक तक पहुँचते हैं। मेजर कवाल्योव कई तमग़े लटकाए रहता था, राजचिह्न वाले और ऐसे भी जिन पर खुदा रहता था बुधवार, बृहस्पतिवार, सोमवार आदि. मेजर कवाल्योव अपनी गरज़ से पीटर्सबुर्ग आया था, मौका लगे तो वह अपने पद के अनुरूप स्थान लपकना चाहता है, उपराज्यपाल का, या किसी महत्वपूर्ण विभाग में कमिश्नर का। मेजर कवाल्योव शादी के ख़िलाफ़ तो नहीं था, मगर वह शादी तभी करना चाहता था, जब दुल्हन दो हज़ार का दहेज लाए।

तो अब पाठक समझ गए होंगे कि इस मेजर की क्या हालत हुई होगी जब उसने देखा कि उसकी सुंदर और पतली नाक के स्थान पर है एक फूहड़, सफ़ाचट, समतल मैदान।

दुर्भाग्य देखिए कि सड़क पर एक भी गाड़ीवान नज़र नहीं आया और उसे रूमाल में अपना चेहरा छिपाकर पैदल ही चलना पड़ा, यह दिखाते हुए कि जैसे उसकी नाक से खून बह रहा हो। ‘शायद यह मेरा भ्रम हो, वर्ना ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि नाक ही गायब हो जाए।’, ऐसा सोचते हुए वह चॉकलेट, गोलियों की दुकान में इस इरादे से घुसा कि आईने में अपना चेहरा देख सके। सौभाग्य से दुकान में कोई नहीं था, नौकर छोकरे कमरे धोकर कुर्सियाँ सजा रहे थे, कुछ नौकर उनींदी आँखों से ट्रे में केक-पेस्ट्रियाँ सजाकर ला रहे थे, मेज़ों और कुर्सियों पर कॉफ़ी के धब्बे पड़े पुराने अख़बार पड़े थे। “शुक्र है ख़ुदा का, कि यहाँ कोई नहीं है”, वह बुदबुदाया, “अब आराम से देख सकूँगा।” वह दबे पैर आईने के पास पहुँचा और अपना चेहरा देखने लगा। “शैतान जाने क्या मुसीबत है,” वह थूकते हुए बड़बड़ाया, नाक की जगह पर कुछ और ही होता, यहाँ तो एकदम सफ़ाचट है...”

निराशा से होंठ काटते हुए वह दुकान से बाहर निकला और अपनी आदत के विपरीत उसने निश्चय किया कि वह न तो किसी की ओर देखेगा और न ही मुस्कुराएगा। अचानक एक घर के दरवाज़े पर वह मानो बुत बन गया, उसकी आँखों के सामने एक ऐसी घटना घटी जो समझाई नहीं जा सकती। दरवाज़े के सामने एक बन्द गाड़ी रुकी, गाड़ी के दरवाज़े खुले, चेहरा नीचा किए, वर्दी पहने एक भद्र पुरुष बाहर की ओर उछला और सीढ़ियों पर लपक लिया। कवाल्योव के भय और आश्चर्य का पारावार न रहा जब उसने देखा कि यह तो उसकी अपनी नाक थी। इस अभूतपूर्व दृश्य से उसके सामने सब कुछ घूमने लगा, अपनी काँपती हुई टाँगों पर काबू पाते हुए उसने निश्चय किया चाहे जो भी हो, वह उसके गाड़ी में वापस आने का इंतज़ार करेगा। वह यूँ थरथरा रहा था मानो तेज़ बुखार में हो। दो मिनट बाद सचमुच ही नाक वापस आई। वह सुनहरे धागों से सुशोभित विशाल, सीधी कॉलर वाली वर्दी में थी, उसने पतलून पहन रखी थी, कमर में थी तलवार, टोपी पर जड़े फुन्दे से प्रतीत होता था कि वह उच्च श्रेणी का अफ़सर है। ऐसा जान पड़ता था कि वह किसी से मिलने आया है। उसने दोनों ओर देखा और गाड़ीवान से कहा: “चलो !” और बैठकर चला गया।

बेचारा कवाल्योव पगला गया। वह नहीं जानता था कि इस विचित्र घटना के बारे में सोचे तो क्या सोचे। ऐसा कैसे हो सकता है, कि वह नाक जो कल तक उसके चेहरे पर बैठी थी, हिल-डुल नहीं सकती थी, अचानक वर्दी पहन ले ! वह गाड़ी के पीछे भागा, जो सौभाग्यवश कुछ ही दूर जाकर कज़ान्स्की चर्च के सामने रुक गई थी।

वह चर्च की ओर लपका, उन निर्धन बूढ़ियों की कतार के बीच से होकर जिनके चेहरों पर पट्टियाँ बँधी थीं और आँखों के लिए सिर्फ दो झिरियाँ थीं और जिन पर वह पहले हँसा करता था। वह चर्च में घुसा. भक्तजनों की संख्या काफ़ी कम थी, वे सब प्रवेशद्वार के निकट ही खड़े थे। कवाल्योव इतना परेशान था कि उसमें प्रार्थना करने की शक्ति ही नहीं रह गई थी। वह सभी कोनों में आँखों से इस भद्रपुरुष को तलाशता रहा। आख़िरकार उसने उसे एक ओर खड़े हुए देख ही लिया। नाक ने लम्बी, ऊँची कॉलर में अपना चेहरा छुपा लिया था और बड़े श्रद्धा भाव से प्रार्थना में लीन था।

‘उसके पास कैसे जाऊँ ?’ कवाल्योव सोचने लगा, ‘सभी लक्षणों से, वर्दी से, टोपी से दिखाई दे रहा है, कि वह उच्च श्रेणी का अफ़सर है, शैतान जाने, पहुँचु कैसे वहाँ !’

उसने उसके निकट जाकर खाँसना शुरू कर दिया, मगर नाक ने एक मिनट के लिए भी अपनी श्रद्धालु मुद्रा छोड़कर उसके अभिवादन पर ध्यान नहीं दिया।

“आदरणीय महोदय,” कवाल्योव ने भीतर ही भीतर साहस बटोरते हुए कहा, “आदरणीय महोदय...”

“क्या चाहिए ?” नाक ने मुड़कर पूछा.

“मुझे ताज्जुब है, आदरणीय महोदय...मेरा ख़याल है, आपको अपनी जगह मालूम होनी चाहिए. अचानक मैं आपको पाता हूँ – कहाँ ? – चर्च में. आप भी मानेंगे...”

“माफ़ कीजिए, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, कि आप आख़िर कहना क्या चाहते हैं...ठीक से समझाइए.”

‘कैसे समझाऊँ ?’ कवाल्योव ने सोचा और साहस बटोरकर बोला :

“बेशक, मैं...ख़ैर, मैं मेजर हूँ। मुझे नाक के बगैर चलना, आप भी मानेंगे, यह अशिष्टता है। किसी दुकानदारिन के लिए, जो वस्क्रेसेन्स्की पुल पर बैठकर संतरे बेचती है, बगैर नाक के बैठना संभव है, मगर, ग़ौर कीजिए – मेरी तरक्की...कई महिलाओं से मेरे घनिष्ठ संबंध हैं : चेख़्तारेवा उच्च अधिकारी की पत्नी और – और भी कई, आप ही इन्साफ़ कीजिए...मैं तो कुछ समझ ही नहीं पा रहा हूँ, आदरणीय महोदय, [ऐसा कहते हुए कवाल्योव ने अपने कंधे उचका दिए] माफ़ कीजिए...अगर इस बात पर कर्तव्य और सम्मान के नियमों की तहत गौर किया जाए...तो आप ख़ुद ही समझ सकते हैं।”

“कुछ भी समझ नहीं पा रहा हूँ,” नाक ने जवाब दिया, “ठीक से समझाइए। आदरणीय महोदय, मेरा स्वतंत्र अस्तित्व है और फिर हमारे बीच कोई निकट संबंध हो भी नहीं सकता। आपके कोट की बटनों को देखने पर ही पता चलता है, कि आपका ओहदा मुझसे अलग है।”

इतना कहकर श्रीमान नाक ने मुँह फेर लिया और प्रार्थना में लीन हो गया।

कवाल्योव उलझन में पड़ गया, वह समझ नहीं पाया कि क्या करे और क्या सोचे। इसी समय किसी महिला के वस्त्रों की मीठी-सी सरसराहट सुनाई दी : एक अधेड़ उम्र की महिला निकट आई, झालर वाली पोशाक पहने और उसके साथ थी कमर पर तंग होती पोशाक और ढीली-ढाली टोपी पहने एक कमसिन सुन्दरी, उनके पीछे-पीछे आया बड़े-बड़े कल्लों वाला और दस बारह कॉलर चिपकाए एक सेवक।

कवाल्योव उनके निकट खिसका, उसने अपनी कमीज़ की कॉलर बाहर निकाली, अपने कोट पर सुनहरी जंज़ीर में लटक रहे तमगों को ठीक किया और मुस्कुराते हुए नवयुवती पर नज़र डाली जो बसन्ती फूल की तरह हौले से झुककर सफ़ेद दस्ताने वाला अपना हाथ माथे तक ला रही थी। कवाल्योव के मुख पर मुस्कुराहट और भी गहरी हो गई जब उसने टोपी के नीचे से उसकी गोरी हड्डी और बसन्त के पहले गुलाबों की छटा वाले उसके गाल का एक भाग देखा, मगर तभी वह उछल पड़ा, मानो जल गया हो। उसे याद आ गया कि उसके चेहरे पर नाक के स्थान पर कुछ भी नहीं है, और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने मुड़कर वर्दी वाले महानुभाव से साफ़-साफ़ कहना चाहा कि वह सिर्फ उच्च अफ़सर होने का ढोंग कर रहा है, मगर है वह झूठा और धोखेबाज़ और वह सिवाय उसकी नाक के कुछ भी नहीं है...मगर नाक वहाँ थी ही नहीं, शायद वह किसी और से मिलने चली गई थी.


अब तो कवाल्योव बुरी तरह तैश में आ गया। वह पीछे सरका और एक मिनट के लिए स्तम्भों के पास रुककर उसने ध्यान से देखा कि कहीं नाक तो दिखाई नहीं दे रही। उसे अच्छी तरह याद था कि उसके सिर पर फुँदने वाली टोपी थी और उसके कोट पर सुनहरी कढ़ाई थी, मगर उसके ओवरकोट को देख नहीं पाया था और न ही देख पाया था उसकी गाड़ी का रंग, न घोड़ों का रंग. यह भी नहीं देखा था उसने कि गाड़ी के पीछे कोई सेवक था या नहीं, फिर रास्ते पर इधर-उधर इतनी सारी गाड़ियाँ इतनी तेज़ी से जा रही थीं कि उन्हें पहचानना मुश्किल था, मगर यदि पहचान भी जाता उन्हें रोकना असंभव था। दिन बड़ा ख़ुशगवार था, धूप खिली हुई थी, नेव्स्की एवेन्यू पर लोगों की भीड़ थी, महिलाओं का रंगबिरंगा झरना-सा पूरे फुटपाथ पर बिखरा था, पलित्सेइस्की से लेकर अनीच्किन पुल तक। यह आ रहा है उसका परिचित अफ़सर, जिसे वह डिप्टी जनरल कहकर पुकारता था, ख़ासकर भीड़ में। यह है यारीगिन, बड़ा बाबू सिनेट का, गहरा दोस्त है, ताश बड़ी ख़ूबसूरती से खेलता है। यह है एक और मेजर, कॉकेशस से बनकर आया है, वह हाथ के इशारे से उसे अपने निकट बुलाया.


“ओह, शैतान ले जाए,” कवाल्योव ने कहा और वह एक गाड़ी में बैठ गया।

“ऐ, गाड़ीवान, सीधे डिप्टी पुलिस कमिश्नर के पास ले चलो। पूरी रफ़्तार से चलो !”



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