बुरातिनो - 27
बुरातिनो - 27
27
नया कठपुतलियों का थियेटर अपना पहला ‘शो’ प्रस्तुत करता है.
अनुवाद: चारुमति रामदास
कराबास बराबास बड़े खतरनाक मूड में भट्टी के सामने बैठा था. नम लकडियां मुश्किल से जल रही थीं. बाहर बारिश की झड़ी लगी थी. कठपुतलियों के थियेटर की छत टपक रही थी. गुड़ियों के हाथ और पैर नम हो गए थे, रिहर्सल्स में कोइ काम नहीं करना चाह रहा था, सात पूँछों वाले चाबुक की धमकी के बावजूद. गुड़ियों ने तीन दिनों से कुछ नहीं खाया था, और पैंट्री में कीलों पर टंगे टंगे कड़वाहट से फुसफुसा रही थीं.
थियेटर में सुबह से एक भी टिकट नहीं बिका था. और कराबास बराबास के थियेटर में उकताहट भरे नाटक और भूखे, फटेहाल कलाकारों को देखने जाता भी कौन!
शहर के घंटाघर में घड़ी ने छः बजाये. कराबास बराबास निराशा से दर्शकहॉल में घूम रहा था, - हॉल खाली था.
“शैतान ले जाए, सभी सम्माननीय दर्शकों को,” वह गुर्राया और बाहर निकला. बाहर आते हुए उसने देखा, आंखें झपकाईं और इस तरह से मुंह खोला की एक कौआ उड़कर उसमें जा सकता था.
उसके थियेटर के सामने, बड़े, नए कैनवास के तम्बू के सामने, समुद्र से आ रही नम हवा की ओर ध्यान न देते हुए भारी भीड़ खड़ी थी.
टेंट के प्रवेश के ऊपर टोपी पहने, एक लम्बी नाक वाला आदमी खडा था, भर्राई हुई तुरही बजा रहा था और चिल्लाकर कुछ कह रहा था.
पब्लिक हंस रही थी, तालियाँ बजा रही थी, और बहुत सारे लोग तम्बू के अन्दर चले गए.
कराबास बराबास के पास दुरेमार आया; उससे, कीचड़ की बू आ रही थी, जैसी पहले कभी नहीं आती थी.
“ए-हे-हे,” चेहरे पर गुस्सैल झुर्रियां लाते हुए उसने कहा, “औषधीय जोंकों से कुछ लेना देना नहीं है. मैं उनके पास जाना चाहता हूँ,” – दुरेमार ने नए तम्बू की तरफ़ इशारा किया, “उनके पास मोमबत्तियां जलाने या फर्श साफ़ करने का काम मांगूंगा.”
“ये किसका नासपीटा थियेटर है? ये कहाँ से आया?” कराबास बराबास गुर्राया.
“ये खुद गुड़ियों ने अपना ‘कठपुतलियों का थियेटर ‘ मोलनिया’ (बिजली – अनु.) खोला है, वे खुद ही पद्य में नाटक लिखते हैं, खुद ही भूमिकाएं करते हैं.”
कराबास बराबास ने अपने दांत किटकिटाए, दाढी नोंची और नए कैनवास के टेंट की ओर चला. उसके प्रवेश द्वार के ऊपर बुरातिनो चिल्ला रहा था:
“लकड़ी के इंसानों के जीवन पर आधारित मनोरंजक, आकर्षक पहला प्रयोग. वास्तविक घटनाओं पर आधारित – इस बारे में, कि हमने कैसे अपने दुश्मनों को बुद्धि, बहादुरी और सूझ बूझ से हराया...”
कठपुतलियों के थियेटर के प्रवेश द्वार के पास कांच के बूथ में मल्वीना बैठी थी नीले बालों में ख़ूबसूरत रिबन बांधे और कठपुतलियों के जीवन पर आधारित मज़ेदार कॉमेडी के दर्शकों को मुश्किल से टिकट दे पा रही थी
पापा कार्लो नए मखमली जैकेट में हारमोनियम घुमा रहे थे और खुशी से सम्माननीय दर्शकों को देखकर आंखें मिचका रहे थे.
अर्तेमोन ने लोमड़ी अलीसा को पूंछ पकड़कर टेंट से बाहर घसीटा, जो बिना टिकट के घुस गई थी.
बिल्ला बजीलियो भी बिना टिकट के, चालाकी से निकल लिया था, और बारिश में पेड़ पर बैठकर गुस्सैल आंखों से नीचे देख रहा था.
बुरातिनो, गाल फुलाकर भर्राई हुई तुरही बजा रहा था:
“ ‘शो’ शुरू हो रहा है.”
और वह कॉमेडी का पहला दृश्य करने के लिए सीढ़ी से नीचे भागा, जिसमें दिखाया गया था कि कैसे गरीब बेचारे पापा कार्लो ठूंठ से लकड़ी का इंसान बनाते हैं, ज़रा भी सोचे बिना कि यह उनके लिए सुख लाएगा.
सबसे अंत में थियेटर में रेंगते हुए आया कछुआ तोर्तीला, मुंह में मानद टिकट पकड़े हुए जो सुनहरे कोनों वाले चर्मपत्र पर बना हुआ था.
‘शो’ शुरू हो गया. कराबास बराबास उदास होकर अपने खाली थियेटर में लौट आया. उसने सात पूँछों वाला चाबुक उठाया. गोदाम का दरवाज़ा खोला.
“मैं तुम्हें ऐसा सबक सिखाऊंगा, कि आलस भूल जाओगे!” वह तैश में चीखा. – “मैं तुम्हें पब्लिक को मेरे पास आकर्षित करना सिखाऊंगा!”
उसने चाबुक लहराया. मगर किसी ने भी जवाब नहीं दिया. गोदाम खाली था. सिर्फ कीलों पर रस्सियों के टुकड़े लटक रहे थे.
सारी कठपुतलियाँ – अर्लेकिन, और काले मास्क वाली लड़कियां, और सितारों वाली नुकीली टोपियां पहने जादूगर, और खीरे जैसी नाक वाले कुबड़े, और अरब, और कुत्ते – सब, सब, सभी कठपुतलियां कराबास बराबास के यहाँ से भाग गए थे.
भयानक विलाप करतरे हुए वह थियेटर से उछल कर बाहर रास्ते पर आया. उसने देखा, कि कैसे उसके बचे खुचे कलाकार डबरे से होकर नए थियेटर की ओर भाग रहे थे, जहां प्रसन्नता से संगीत बज रहा था, ठहाके सुनाई दे रहे थे, तालियाँ बज रही थीं.
कराबास बराबास केवल कागज़ के कुत्ते को ही पकड़ पाया, जिसकी आंखों के बदले बटन थे. मगर उसके ऊपर, न जाने कहाँ से, अर्तेमोन ने हमला किया, उसे गिरा दिया, कुत्ते को खींच लिया और उसे साथ लेकर तम्बू में भाग गया, जहां स्टेज के पीछे भूखे कलाकारों के लिए लहसुन के साथ गरम गरम मटन का सूप बनाया गया था.
कराबास बराबास उसी तरह बारिश में डबरे में बैठा रहा.
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