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Paresh Makwana

Romance

3  

Paresh Makwana

Romance

मरियम

मरियम

10 mins
591

''मरियम कुरेशी क्या आपको ये निकाह कबूल है..''

           आज उसके निकाह था। मंडप में जब काजी ने उसके सामने देख के ये प्रश्न किया तब वो एकदम खामोशी से मुझे ही देख रही।

           कहीं मुझे पाने की चाह में वो इस निकाह से इनकार न कर दे। मुझे बस इसी बात का डर था। उसके सामने एक हलकी सी मुस्कान देकर मैने उसे आँखों के भाव में ही कह दिया की वो ये निकाह कर ले।

           वो वैसी ही शिकायती नज़रों से मुझे देखने लगी मानो उसे इन सब बातों से कोई फर्क ही नहीं पड़ता हो।

          आखिर में उसे जब मेरी बात याद आई,

          ''तुम बस मेरी एक अच्छी दोस्त हो बस इतना ही.. उससे ज्यादा कुछ नहीं .. ये प्यार-प्यार यार मुझसे नहीं होगा। मुझे लगता है की तुम्हे ये निकाह कर लेना चाहिए। आखिर कब तक तुम मेरी हाँ सुनने की प्रतीक्षा करोगी।

          निकाह के अगले दिन जब वो आखिरी बार मुझसे मिलने मेरे घर आई तब भी उसकी एक ही ज़िद थी।

          ''मनीष प्लीज़... मेरे प्यार को अपना लो.. मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती। तुम हाँ कहो तो.. अभी इसी पल में तुम्हारे साथ घर से भागने को भी तैयार हूँ।

           मैं उसको वैसे ही खामोशी से देखते रहा। उस वक़्त उसका धैर्य मानो खाली सा हो गया मुझे पाने की चाह इतनी बढ़ गई की उसी पल उसने मेरे होठों पर अपने होठ रख दिए।

           दो होठों का वो यू ही आपस में मिलना और फिर उसका अपनी ही निगाहों में गिर जाना।

           ''तुम मेरे प्यार को कभी समझ ही नहीं सकते। मैं ही गलत थी। आई एम सॉरी..''

           बस इतना कह के वो गुस्से में वहाँ से चली गई। उसका वो गुस्सा भी जायज़ था।

           बचपन से ले के आजतक उसने दिल खोलकर सिर्फ मुझसे प्यार किया। मुझे चाहा और आज.. आज वो किसी और की होने जा रही थी।

           ''कबूल है..''

           काज़ी ने जब उससे दूसरी बार यही सवाल किया,

           ''मरियम कुरेशी क्या आपको ये निकाह कबूल है.?''

           ''कबूल है..''

           काज़ी ने तीसरी बार वही सवाल दोहराया।

           ''क्या आपको ये निकाह कबूल है..?''

           उसने वैसे ही चेहरा झुकाये कह दिया

           ''कबूल है...''

                                              

          राजकोट शहर के एकदम मध्य में दो मंज़िल वाला मेरे दादाजी के वक़्त का मेरा एक छोटा सा घर। वैसे तो आज इस घर में न ही दादाजी रहते नहीं दादी माँ बस उनकी कुछ यादें।

          घर के मुख्य कमरे की मुख्य दीवार पर ही दादा दादी की हार चढ़ाई हुई साथ में टंगी दो तस्वीरे.. उसके ठीक बाजू में पापा की फूलसाइज आर्मी यूनिफॉर्म वाली हार चढ़ाई हुई तस्वीर.. पापा के गए आज एक साल हो गया फिर भी ये फूल अभी सूखे नहीं है। इस घर में उनकी यादें अब भी वैसी की वैसी ही है।

         पापा आर्मी में थे। पिछले साल ही दीवाली की छुट्टियाँ मना कर वो चले गए। जाते वक़्त हमसे कहकर गए थे की

         ''मकर संक्रांति को वापस आऊंगा.. और हम सब मिलकर छत पर पतंगे चढ़ाएंगे।''

         पर मकर संक्रांति के एक हफ्ते पहले ही वो देश के लिए शहीद हो गए।

         उसके बाद पापा के बिना ये घर पूरा सुना पड़ गया। ये तो अच्छा था की रिज़वान चाचा का हमपर हाथ था। उन्होंने हमारे बिखरे परिवार को संभाल लिया।

         रिजवान कुरेशी हमारे पड़ोसी। हमारे घर के ठीक बगल में ही उनका घर। वैसे तो हमारे धर्म अलग फिर भी हमारे बीच एक ही परिवार जैसा ही मेल भाव। बचपन से ही हम उन्हें रिज़वान चाचा कहकर ही बुलाते थे।

         उनकी बेटी मरियम मेरी ही उम्र की थी। वैसे तो पूरा बचपन हम एक ही छत पर एक ही गली में साथ में खेले थे। मैं मेरी छोटी बहन सुरभि और वो सब साथ में ही स्कूल जाते थे।

         सुरभि हमसे छोटी थी इसलिए उसका और हमारा क्लासरूम अलग था। मैं और मरियम एक ही कक्षा में साथ में पढ़े

         उन दिनों कभी मेरी वजह से उसे या कभी उसकी वजह से मुझे टीचरों की हाथ की मार भी खानी पड़ती।

         वैसे तो मार खिलाने में वो एक्सपर्ट.. मेरी ही कॉपी ले के.. खुद की कॉपी बोलकर टीचर को वो होमवर्क में बता देती। और उसकी वजह से खामखा ही मुझे पनिशमेंट मिलती। कभी कोई बोरिंग लेक्चर में वो टीचर पर कागज़ का बॉल फेंकती और फिर बड़ी मासूमियत से उंगली मेरी तरफ कर देती।

        हम पूरा दिन लड़ते थे झगड़ते थे, एक दूसरे की झूठी शिकायतें करके एक दूसरे की ग़लती बता कर एक दूसरे को मार भी खिलाते थे फिर भी हमारी दोस्ती वैसी की वैसी ही रही।

                               

       जब हम कॉलेज में आए तब एक दिन क्लास बंक कर हम फ़िल्म देखने चले गए।

       वैसे मेरी तो ऐसी कोई इच्छा नहीं थी पर वो ही मुझे जबरदस्ती इतिहास के उस बोरिंग से लेक्चर में से खीच लाई।

       फ़िल्म थी सनम तेरी कसम..

       इस फ़िल्म के बारे में मैने काफी सुना था। इसलिए एकबार देखने की भी इच्छा थी। इसीलिए फ़िल्म के दौरान में फ़िल्म में खोया हुआ था। और वो मुझे देखने में।

       जब मेरा ध्यान उसकी और गया तब मैने उससे फ़िल्म देखने को कहा...

       उसके बाद की खामोशी.. फ़िल्म के बीच बदलते दृश्य .. फ़िल्म के रोमांटिक गीत और बहुत कुछ..

       अचानक ही उसने मेरी और देखा ओर कहा

       ''हेय.. सुन ना..'' मैने उसकी और देखा.. उस वक़्त वो कुछ कह रही थी.. पर मुझे उस वक़्त उसकी बातों में कोई रुचि नहीं थी। मुझे बस फ़िल्म देखनी थी। उसने कहा,

        ''तूने कभी किसी से प्यार किया है..?''

        उसके अचानक ही पूछे गए इस प्रश्न पर में हँस पड़ा।

        ''बोलो ना यार..''

        ''ना नहीं किया..'' मेरा जवाब सुनकर उसने बड़ी आसानी से सब लोग सुने इस तरह जोर से बड़ी आवाज़ में कहा,

        ''तुमने भले ना किया हो.. पर मैने किया है.. तुमसे..''

        उसकी बात सुनकर पहले तो मुझे एक झटका सा लगा.. और फिर उसी बात पर में ज़ोर से हँसा.. इसलिए आगे पीछे बैठे दो तीन लोगो ने हमसे कहा भी..

        ''आप लोगो को जो भी बातचीत करनी हो प्लीज़ बाहर जाकर कीजिए.. हमे शांति से फ़िल्म देखने दे।''

        उनकी बात सुनकर उसी पल मरियम ने मेरा हाथ पकड़ा

        ''चल..''

        मैं कुछ बोलूं उससे पहले ही वो आधी फ़िल्म के बीच खड़ी हो गई। और मेरा हाथ पकड़कर मुझे वहां से खींचते हुए बाहर ले गई।

                         

       रियाज़ अहमद खान क्या आपको ये निकाह कबूल है..?

       ''हाँ कबूल है..''

       उसके बाद दोनो पक्षों की सहमति से उनका निकाह मंज़ूर हुआ। उसी पल मरियम रियाज खान की बेगम बन गई..

       उसी पल अचानक ही मुझे लोही की उल्टी हुई.. रुमाल अपना मुँह छुपाते हुए सबकी नज़रों से बचकर मैं वहाँ से अपने घर चला आया।

       थोड़ा स्वस्थ होते ही मैं बाथरूम से मुँह पोछते हुए बाहर आया। और अपने टेबल पर बैठकर मैने अपनी डायरी खोली..

       डायरी के पहले ही पन्ने पर एक तस्वीर थी.. एक बेहद खूबसूरत लड़की की तस्वीर..

       सुरमा लगाई उसकी यही काली कातिल आंखे उस वक़्त सिनेमाघर में मुझे देख रही थी।

       उस वक़्त उसने पहली बार मुझे प्रपोज़ किया था। और मैं .. उस पल उसकी बात को मज़ाक में लेकर बहुत हँसा था।

       ''मैं मज़ाक नहीं कर रही मनीष... आई रियली लव यु..''

       सिनेमाघर के बाहर आते ही उसका ध्यान मुझपर गया। मुझे यूं ही उसपर हँसता देखकर उसने मुझपर काफी गुस्सा किया।

       वैसे तो उस वक़्त जो मैं सुनना चाहता था वो वही बोल रही थी। सच कहूँ तो जब से होश संभाला तब से ही मैं उसे पसंद करता था।

       अक्सर सोचता था की उसे जाकर मेरे दिल की बात कह दूँ । पर..

       मैं चाहूँ तो भी उससे प्यार नहीं कर सकता.. वजह..

                              

       डायरी का पहला पन्ना खुला था। उसके ऊपर एक तस्वीर थी। उसकी तस्वीर... मेरी मरियम की तस्वीर..

       और मैं उसी टेबल पर सर रखकर मानो गिर पड़ा.. मेरी अधखुली आंखे डायरी पर पड़ी उस तस्वीर को देख रही.. मेरे मुँह से खून निकल रहा था जो बह के पास पड़ी डायरी तक पहुँच चुका था.. मेरी आंखे धीरे धीरे बंद हो रही थी। शायद हमेशा के लिए।

        उसी वक़्त सुरभि मेरे कमरे में आ गई। मुझे यूं टेबल पर ही सोता देख वो मेरे पास आई..

       ''भैया..भैया आप यहाँ सोये है.. वहां मरियम की विदाई भी...''

       जैसे ही वो मेरे नज़दीक आई.. उसने मेरे मुँह से निकलती खून की धारा देखी.. और वो जोर से चीख पड़ी..

       ''भैया.., माँ जल्दी आओ .. माँ..''

       उसकी चीख सुनकर माँ भी बाहर से दौड़ती हुई अंदर आई..

       ''माँ देखो जल्दी भैया को क्या हो गया..''

       मरियम अपने शौहर के साथ कब की विदा हो चुकी थी। उसके बाद वो खुशी का पल मानो शोक में तब्दील हो गया।

       रिज़वान चाचा ने एम्बुलेंस बुलाई.. मुझे उसमे फ़ौरन अस्पताल ले जाया गया।

       मुझे क्या हुआ था वो वहाँ कोई नहीं जानता था सिवाए मेरे..

      मुझे केंसर था.. लास्ट स्टेज ब्लड केंसर.. मैं कब मरने वाला था ये तो मैं भी नहीं जानता था। यही एकमात्र वजह थी मरियम के प्यार को ठुकराने की।

       मैं रहूँ या ना रहूँ .. अपनी जिंदगी में वो खुश रहनी चाहिए। आख़िर उसकी खुशी में ही तो मेरी खुशी थी।

       मेरे रिपोर्ट्स देखने के बाद डॉक्टर ने मेरे परिवार को मेरे केंसर के बारे में बताया।

       मेरा परिवार तो पहले से ही टूटा हुआ था। ये खबर सुनकर तो मानो बिखर ही गया।

       माँ तो उसी पल बेजान सी हो गई। और सुरभि मेरे पास बैठकर कब से आँसू बहाए जा रही थी। रिज़वान चाचा और उसका परिवार भी मेरी इस खबर से बेहद दुखी था।

       वैसे देखा जाए तो पूरे मुहल्ले में सब लोग दुखी थे। सिवाए मेरे .. मैं खुश था.. क्योंकि उसकी जिंदगी मुझपर आकर रुक जाए उससे पहले वो अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गई..

                            

       अगली सुबह मरियम अपने शौहर के साथ अस्पताल आ पहुंची। मैं नहीं चाहता था की वो मुझे इस हालत में देखे।

       वो और रियाज़ अस्पताल के उस कमरे में आए। जहाँ मुझे रखा गया था। आते ही वो दौड़ कर मेरे पास बैठी और मेरे सीने पर अपना सर रखकर मुझ से लिपट गई।

       ''क्यो.. मनीष.. क्यो.. तुमने आज तक मुझे अंधेरे में रखा.. जितना प्यार मैने तुझसे किया उतना ही प्यार तुमने भी मुझसे किया.. एकबार बोल देते..''

        वो वैसे ही मेरे सीने पर सर रखकर फूट फूट कर रोने लगी।

        मुझे यही समझ नहीं आ रहा था की रियाज़ उसे यहाँ क्यो लाए। मैने उसकी और देखा उन्होंने सारी बात विस्तार से बताई..

        '' सुनो, कल रात जब मैं अपने कमरे में पहुँचा तब मैने देखा की..,

        मरियम जहर पीनेवाली थी। उसे पहले की वो उसे कुछ हो जाए मैने उससे वो बोतल छीन ली।

        उसके बाद पूछने पर उसने रोते रोते बताया की..

        ''मुझे मर जाने दो रियाज़..मुझे मर जाने दो.. मैं मनीष को चाहती हूँ .. और अब मैं उसके बिना जी नहीं सकती..''

        उसी पल मैने सोच लिया की मरियम को इस रिश्ते से आज़ाद कर के में उसे हमेशा के लिए तुम्हें सौंप दूँगा।

        अगली सुबह मैं और मरियम तेरे घर पहुँचे पर वहाँ कोई नहीं था। बस मुख्य कमरे की फर्श पर कुछ खून के निशान थे जो अंदर के कमरे की और जाते थे। हम घबरा गए। अंदर गए...

        सामने के टेबल पर ही एक डायरी खुली पड़ी थी। टेबल पर से खून की धारा पाए के सहारे बहकर नीचे फर्श तक चली पहुँच चुकी थी। ये सब देखकर हम काफी घबरा गए थे। मन में बहुत से सवाल थे।

        मरियम ने टेबल के पास जाकर उस डायरी को हाथ में लिया.. तभी उस डायरी के पन्नों के बीच से एक तस्वीर सरकी और एकदम उसके पाँव के पास उल्टी जा गिरी।

        मैने वो तस्वीर उठाई.. वो तस्वीर मरियम की ही थी।

        पीछे लिखा भी था। 'मरियम.. मेरा पहला प्यार..'

        मैने वो तस्वीर मरियम को दिखाई..

        उसे देखते ही उसे पता चल गया की तुम भी उससे बहुत प्यार करते हो। तुम्हें याद कर के उसी पल उसने वो तस्वीर अपने सीने से लगा ली।

       उसके हाथ से डायरी लेकर मैने पढ़ना शुरु किया..

       उस डायरी के एक एक पन्ने पर मानो बस एक ही नाम था.. मरियम

                          

       डायरी के हर एक पन्ने पर लिखा था की तुम अपनी मरियम को कितना चाहते हो। और आखिर में तुमने लिखा था की..,

       ''मरियम, बचपन से ही मेरा एक ही ख़्वाब है.. अपने पापा की तरह एक आर्मी ऑफिसर बनना। और देखना एक दिन में आर्मी ऑफिसर बनके दिखाऊंगा।

       मुझे जीना है मरियम.. तुम्हारे साथ जीना है.. अपने ख्वाबों के लिए जीना है.. पर ये जिंदगी देखो ना.. साली मेरे ही साथ नहीं है।

       कब मेरी आंख बंद हो जाएगी.. कब में चला जाऊंगा.. ये भी नहीं मालूम..''

                                                                                      -तुम्हारा मनीष...

       उसी पल मैने डायरी बंद की.. मरियम ने कहा चलो.. और फिर तुम्हें खोजते हुए हम यहाँ अस्पताल आ गए।

                      

       अस्पताल का वो करुण दृश्य.. जिंदगी और मौत के बीच सोया हुआ एक मैं ..और एक वो..

       उसकी बस एक ही ज़िद थी। मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी।

       ''तुम मुझे अकेला छोड़कर नहीं जा सकते मनीष.. मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती। मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी..''

       ''तुम्हें जीना होगा मरियम.. तुम्हारे सामने अभी पूरी जिंदगी पड़ी है।''

       आख़िर उसे मेरा सपना याद आया। मेरे सीने से सर उठाकर मेरा हाथ पकड़कर एक हाथ से उसने अपने आँसू पोछे.. और कहा

        ''हाँ ..मरियम जीएगी.. तुम्हारे सपनों के लिए में जिऊंगी.. मैं बनूँगी एक आर्मी ऑफिसर..''

        उसके आखिरी शब्द मेरे कान पर पड़े और ...

        उसी वक़्त मेरा हाथ उसके हाथ से फिसल गया। मेरा पूरा शरीर बर्फ सा हो गया। और वो मेरे उस बेजान शरीर से लिपटकर वही फूट फूट कर रोने लगी। उसके पास बैठकर रियाज़ ने उसे संभाला..

       आज एक साल बाद स्पेशियल ट्रेनिंग के अंत में मरियम एक आर्मी ऑफिसर के यूनिफॉर्म में मेरे सामने आई। मेरी ओर पापा की तस्वीर के सामने अदब से खड़े होकर उसने हमे सेल्यूट किया।

       अपने देश के लिए कुछ कर दिखाने का मेरा सपना आज उसकी वजह से पूरा हुआ। वैसे तो आज वो अपनी जिंदगी में रियाज़ खान और अपने आठ साल के बेटे मनीष के साथ बहुत खुश है। और उससे ज्यादा मुझे और क्या चाहिए।

  

              

                                   


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