मिट्टी का कर्ज और जलती सिगरेट
मिट्टी का कर्ज और जलती सिगरेट
प्रस्तावना:
कभी-कभी किसी की एक छोटी सी लापरवाही दूसरों की पूरी जिंदगी की कमाई को राख कर सकती है। लेकिन जहाँ इंसानियत जिंदा होती है, वहां आग की लपटें भी हार जाती हैं।
कहानी:
दोपहर का वक्त था, सूरज अपनी पूरी तपिश के साथ खेतों पर चमक रहा था। रामू काका का खेत सोने जैसी गेंहूँ की फसल से लहलहा रहा था। रामू काका किसी काम से शहर गए हुए थे और खेत सूना था। तभी सड़क से गुजरती एक शानदार गाड़ी रुकी। उसमें बैठे युवक ने लापरवाही से आधी जली हुई सिगरेट खिड़की से बाहर फेंकी और आगे बढ़ गया।
वह छोटी सी सिगरेट खेत की सूखी मेड़ पर गिरी और देखते ही देखते आग की लपटों ने फसल को घेरना शुरू कर दिया। धुआं आसमान छूने लगा। रामू काका वहां नहीं थे, लेकिन पास के खेतों में काम कर रहे दूसरे किसानों की नज़र उस धुएं पर पड़ गई।
"अरे! रामू काका के खेत में आग लगी है!" एक चिल्लाया।
बिना एक पल गंवाए, सब अपना काम छोड़ दौड़ पड़े। कोई कुएं से पानी खींचने लगा, तो कोई गीले बोरे लेकर लपटों से भिड़ गया। किसी ने ये नहीं सोचा कि यह मेरा खेत नहीं है, सब बस उस 'मिट्टी के कर्ज' को चुका रहे थे जो एक किसान दूसरे के लिए महसूस करता है।
जब तक रामू काका शहर से वापस आए, आग बुझ चुकी थी। फसल का एक छोटा हिस्सा काला पड़ गया था, पर बाकी सब सुरक्षित था। रामू काका फफक कर रो पड़े और बोले, "भाइयों, मैं तो यहाँ था भी नहीं, तुम सबने अपनी जान क्यों जोखिम में डाली?"
एक बुजुर्ग किसान ने मुस्कुरा कर कहा, "काका, खेत भले ही आपका था, पर अन्न तो सबका है। और यहाँ खेत नहीं जल रहा था, हमारा 'विश्वास' जल रहा था। अगर आज हम पड़ोसी होकर हाथ पर हाथ धरे बैठते, तो कल खुदा को क्या जवाब देते?"
सीख:
इंसानियत का सबसे बड़ा 'डिडेक्टर' मुसीबत का समय होता है। जहाँ स्वार्थ खत्म होता है, वहीं से असली भाईचारा शुरू होता है।
