लकीरों में छिपा सच
लकीरों में छिपा सच
अक्सर लोग भविष्य देखने के लिए हाथों की लकीरें पढ़ते हैं, लेकिन मैं जब भी अपने घर के बड़ों के हाथों को देखती हूँ, तो मुझे उनका बीता हुआ कल और कठिन संघर्ष साफ़ नज़र आता है।
मेरे दादाजी के उन सख्त और खुरदरे हाथों को देखिए, जिन्होंने तपती धूप में हल चलाया है। उनकी हथेलियों के छाले और सख्त चमड़ी चीख-चीख कर कहती है कि हम तक पहुँचने वाला अनाज कितनी मेहनत की उपज है।
मेरी दादी के वो हाथ, जो अब थोड़े कांपते हैं, लेकिन आज भी उनमें वही ममता की गर्माहट है। सालों तक चूल्हे की आग के सामनेजलकर और परिवार को जोड़कर रखने की कहानी उनके पोरों-पोरों में लिखी है।
और मेरे पिताजी, उनके हाथों की थकावट और काम के निशान गवाह हैं कि एक पिता अपनी संतान के सुनहरे भविष्य के लिए अपनी सुख-सुविधाओं का कैसे गला घोंट देता है। उन्होंने भारी बोझ उठाए ताकि मेरे हाथ में आज यह हल्की सी कलम और किताबें रह सकें।
आज जब मैं सुबह 4 बजे उठकर अपनी पढ़ाई के लिए कलम थामती हूँ, तो मुझे अपने इन नन्हे हाथों में उन तीन पीढ़ियों की उम्मीदें महसूस होती हैं। मेरे हाथ शायद अभी कोमल हैं, लेकिन इन पर चढ़ा संघर्ष का रंग बहुत गहरा है।
कहते हैं हाथ भाग्य बताते हैं, पर मेरा मानना है कि ये हाथ 'भाग्य' बनाते हैं।
