कोडिंग के सपने और नवोदय की वो 'निशु'
कोडिंग के सपने और नवोदय की वो 'निशु'
घर की बैठक में ताऊ जी हमेशा एक ही बात दोहराते थे, "निशु सफेद कोट पहनेगी, स्टेथोस्कोप गले में होगा और बीमारों की सेवा करेगी।" उनके लिए सफलता का मतलब सिर्फ नर्सिंग था। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनकी बेटी ने अपने रास्ते बहुत पहले ही चुन लिए थे।
संघर्ष की शुरुआत:
निशु के इरादे बचपन से ही मज़बूत थे। जब वह सिर्फ पाँचवीं कक्षा में थी, तब उसने चुपचाप खुद ही 'नवोदय विद्यालय' का फॉर्म भरा। उसका चयन हुआ और वह घर की लाड-प्यार वाली दुनिया से बाहर निकलकर अकेले रहने चली गई। वहीं से उसकी आत्मनिर्भरता का सफर शुरू हुआ। नवोदय की उस आज़ाद हवा में उसे एहसास हुआ कि दुनिया बहुत बड़ी है और उसकी उड़ान सिर्फ एक अस्पताल तक सीमित नहीं हो सकती।
जब सपनों का टकराव हुआ:
12वीं की परीक्षा के बाद ताऊ जी ने नर्सिंग का फॉर्म लाकर मेज पर रख दिया। उनके लिए यह सुरक्षा और सम्मान की बात थी। पर निशु की आँखों में कोडिंग और कंप्यूटर्स की दुनिया बसी थी।
पूरे घर में सन्नाटा था। एक तरफ ताऊ जी का प्यार और ज़िद थी, और दूसरी तरफ निशु के वो सपने जो उसने नवोदय की रातों में जागकर देखे थे। निशु ने बड़ी शालीनता और हिम्मत से अपने पिता को समझाया। उसने उन्हें दिखाया कि आने वाला दौर तकनीक का है और उसकी खुशी प्रोग्रामिंग में है। बहुत बहस और इमोशनल उतार-चढ़ाव के बाद, आखिरकार ताऊ जी ने भारी मन से ही सही, 'हाँ' कह दिया।
आज की हकीकत:
निशु ने B.Tech (Computer Science) में अपना दिन-रात एक कर दिया। वह सफेद कोट तो नहीं पहन पाई, लेकिन आज बेंगलुरु की एक बड़ी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
जब आज ताऊ जी अपनी बेटी की सफलता की खबरें सुनते हैं और उसे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते देखते हैं, तो उनकी आँखों में वो मलाल नहीं, बल्कि गर्व होता है। उन्हें अब समझ आता है कि निशु ने नर्सिंग का फॉर्म छोड़कर अपने लिए जो रास्ता चुना था, वह उसकी काबिलियत का असली प्रमाण था।
