Devendra SHAKYA

Tragedy


4.3  

Devendra SHAKYA

Tragedy


मेरा कसूर

मेरा कसूर

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वैसे तो कलुआ का नाम कालीदास था, लेकिन जैसे राही मासूम रजा द्वारा रचित " नीम का पेड़ " में बुधईराम को बुधिया बुलाते थे, वैसे ही कालीदास को सब कलुआ कह कर बुलाते थे। वह कोई धनी तो नहीं था, जो उसे आदर के साथ कालीदास पुकारते। कलुआ अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। उसके माता-पिता ने उसे पढ़ाने की बहुत कोशिश की, लेकिन गरीबी और बीमारी ने उनकी एक न चलने दी। कलुआ भी अब अपने माता-पिता के साथ खेतों में मज़दूरी करने लगा। कलुआ हर काम को मेहनत और लगन से करता था, वह हमेशा सोचता था कि एक दिन उसके भी दिन बहुरेंगे, और सभी दुःख दूर हो जायेंगे।

 समय बीतता चला गया, अब कलुआ की शादी हो गयी थी, उसकी पत्नी का नाम रन्नो था, लेकिन उसे सब रनिया बुलाते थे। पति -पत्नी दोनों सुबह से शाम तक और कभी-कभी तो देर रात तक मज़दूरी करते थे। बूढ़े माता-पिता की सेवा और दिन भर कड़ी मेहनत उनकी दिनचर्या थी। इतनी मेहनत के बाद भी मुश्किल से परिवार का गुजारा होता था, कभी-कभी तो भूखा भी सोना पढ़ जाता था। 

समय निरंतर अपनी गति से चलता रहा। कुछ समय पश्चात रनिया ने एक सुन्दर सी कन्या को जन्म दिया, जिसे परी नाम दिया गया।

जब आसपास के लोग परी को परिया बुलाने लगे तो रनिया चिल्लाकर कहती कि मेरी बिटिया का नाम परी है और उसे परी कह कर ही बुलाओ। अब सारे लोग अपने दुःखो को भूल बैठे और परी में ही उनकी दुनिया सिमट गयी थी। कोई परी से कहता कि तू लक्ष्मी है हमारी दरिद्रता को खत्म करने के लिए ही हमारे घर अवतरित हुई है, कोई उसकी बड़ी -बड़ी आँखे देखकर कहता यह तो माँ दुर्गा का अवतार है। आस पास के सब लोग भी परी से अपना स्नेह दिखाते और उसे खिलाते और उस थोड़े समय के लिए ही सही अपने सारे दुःख भूल जाते। लेकिन सच तो यह है बड़े कभी भी बच्चों को नहीं खिलाते, अपितु बच्चे बड़ों को खिलाते हैं।

कहावत है कि सुःख क़ी आयु ज्यादा नहीं होती। इस प्रकार धीरे धीरे दुःख का अँधेरा गहराता गया, रनिया को कब तपेदिक की बीमारी हो गई पता ही न चला। इलाज तो तब हो जब हाथ में पैसे हो, जी तोड़ मेहनत करके भी मुश्किल से दो जून की रोटी ही मिल पाती थी। इलाज तो बहुत दूर की बात थी। एक दिन कलुआ ने हिम्मत कर अपने माता पिता और पत्नी से कहा कि वह किसी शहर जाकर नौकरी करेगा, अपने गांव के भी तो कई लोग है कहीं न कहीं काम दिला ही देंगे। लाचारों के पास और कुछ चारा न था और अनमने मन से सबने हाँ दी।

कलुआ की मेहनत से सब वाकिफ थे, अतः कुछ समय बाद उसे कभी न रुकने बाले शहर मुंबई में मजदूरी मिल गई। लेकिन यह भी स्थायी न थी। लेकिन इतना ज़रूर था कि ठेकेदार का कमीशन निकाल, अब इतनी मज़दूरी मिल जाती थी कि घर का अच्छे से न ही सही लेकिन ठीक ठाक गुजारा होने लगा।

रनिया की तबियत स्थिर थी, परी अब दो साल की हो गई थी। एक दिन सहसा परी की तबियत ख़राब हो गई , रनिया तुरंत उसे गांव के हकीम के पास लेकर पहुँची। हकीम ने नाड़ी देखकर कुछ जड़ी -बूटी दी और कहा एक दो दिन में ठीक हो जाएगी, लेकिन एक सप्ताह बाद भी लाभ न होने पर रनिया ने कस्बे के डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने लक्षणों के आधार पर कुछ टेस्ट करवाने के लिए कहा, और रिपोर्ट आने तक इंतजार करने को कहा। तीन दिन बाद रिपोर्ट आयी तो डॉक्टर ने कहा कि परी के पिता को जितनी जल्दी हो सके यहां बुला लो।

कलुआ बदहवास भागा -भागा घर आया, पता चला कि परी के दिल में छोटा सा छेद है। सही समय पर इलाज न मिला तो बचना मुश्किल होगा, उनके पैरों तले जैसे जमीन खिसक गयी। आनन् फानन में वह रनिया के साथ परी को शहर ले आया इलाज के लिए। अब पति पत्नी दोनों मजदूरी करने लगे, रनिया घरों में और कलुआ बाहर। अब रनिया को अपनी चिंता न थी उनको तो अपनी लाड़ली की चिंता थी। काम की अधिकता और उचित खानपान न होने और परी की चिंता ने रनिया को और बीमार कर दिया और एक दिन इसी चिंता ने उसकी चिता बना दी। कलुआ बदहवास था , सुध -बुध खो चुका था। परी की देखभाल साथी मज़दूर कर रहे थे। वह कई दिनों तक काम पर नहीं जा पाया।

कहते हैं मुसीबतें थोक के भाव और सुख फुटकर आता है। एक शहर ही नहीं, एक देश ही नहीं , वरन पूरी दुनिया अदृश्य, विषाणु -संक्रामक महामारी की चपेट में आ चुकी थी। सरकार ने लॉक डाउन घोषित कर दिया। कोई कहीं आ-जा नहीं सकता था, आवश्यक लोगों और वस्तुओं को छोड़कर सब -कुछ बंद था, कुछ दिन तो इस आस में कट गए, कि अब सब सही हो जायेगा, लेकिन ऐसा न था, महामारी अमरबेल की तरह फैलती ही जा रही थी , जो उसके रास्ते में आता, उससे लिपट ही जाती थी। लोग घरों में रहने को विवश हो गए। लोग और सरकारें इस अप्रत्याशित घटना के लिए तैयार न थे, हर तरफ हाहाकार मचा हुआ था। व्यवसाय बंद होने लगे, लाखों लोग मारे गए, करोड़ों की संख्या में लोग बेरोजगार हो गए। एक अतिसूक्ष्म विषाणु ने शक्तिशाली देशों तक को पंगु कर दिया।

सबसे बुरा हाल रोज कमाने और खाने बालों का था, काम जाने के बाद अब उनके पास खाने के लिए कुछ न था यद्यपि, व्यक्ति, संस्थाएं और सरकारें अपना पूरा जोर उनकी सहायता के लिए लगा रहीं थीं, लेकिन वह बड़ी संख्या के आगे ऊंट के मुँह में जीरे के समान था।

हमेशा की तरह सबसे लाचार तो मज़दूर ही थे जो चिकनी सड़क तो बनाते है लेकिन कभी गाड़ी नहीं चला पाते, मकान तो बनाते, पर कभी रह न पाते, भव्य इमारत तो बनाते, पर इनमें बैठे बाबुओं से मिलने के लिए अनगिनत चक्कर लगाते। ये कैसी विडंबना थी।

लोग जो गांव छोड़ कर शहर पैसे कमाने - बचाने के लिए गए उनके पास २-३ महीने के गुजारे जितना न था। कलुआ सोच रहा था तो फिर शहर क्यों, गांव क्यों नहीं। लोग अब गांव लौटने को बेताब थे, उल्टी गंगा बहने लगी।

कलुआ भी परी को लेकर अपनी मज़दूर टोली के साथ १००० किलोमीटर दूर अपने गांव के लिए निकल पड़ा। सब ऐसे चले जा रहे थे जैसे मंज़िल नज़दीक ही हो, , लेकिन ये सफर आसां न था इसमें दोपहर की तेज धूप थी, भूख थी, प्यास थी, थकान थी पर हौसला कम न था। सबसे बुरा हाल तो महिलाओं और बच्चों का था। तीन चार दिनों में बचाया हुआ खाना-पीना खत्म हो चुका था अब तो चलते-चलते कभी -२ रास्ते में कुछ लोग खाने -पीने को दे देते, उन पर ही निर्भर थे।

अब परी की तबियत बिगड़ने लगी, कलुआ उसे झूठा ढांढस देता कि अब गांव आने वाला है।

एक दिन परी की तबियत ज्यादा खराब हो गयी, कलुआ सड़क से निकलने वाले दुक्का -दुक्का वाहनों से मदद की गुहार लगाता रहा, लेकिन जैसे संवेदना

शून्य हो चुकी थी, मदद न मिली। कलुआ परी को गोद में उठाये हुए एक अस्पताल तक पहुंचा, तब तक परी अपने परी लोक में पहुँच चुकी थी। अस्पताल की दीवार पर लिखे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ शब्द निर्थक हो चुके थे।

कलुआ किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। वह अब भी परी को गले से लगाए इधर-उधर घूम रहा था। चेतना मन पर हावी होने लगी थी। अंततः कलुआ ने एक तालाब किनारे परी को अंतिम विदाई दी और उसकी समाधी पर फफक -फफक रो पड़ा। उसके होठ खामोश थे लेकिन हृदय उद्देलित था और चीख कर अपना कसूर पूछ रहा था। ओह ईश्वर ! क्या रनिया और परी, समाज -दुनिया के लिए इतने घातक थे कि तूने उन्हें मुझसे छीन लिया। निर्भया के गुनहगारों को सात साल और तीन जीवन दान, क्या रनिया और परी एक जीवन दान की हक़दार न थीं। ईश्वर इतनी ऊँच -नींच क्यों ! गरीबों को इतना गरीब तो न बनाते। क्या कसूर था मेरा, मैं तो अपना जीवन मेहनत -मजदूरी से जी रहा था। भ्रष्ट और अपराधियों को इतने मौके क्यों, सीधे सादे और गरीब लोगों को हर जगह दुत्कार क्यों।

कलुआ निढाल होकर पड़ा रहा। जब शरीर में चेतना आई लेकिन मस्तिष्क अर्धचेतन ही था। वह उठ खड़ा हुआ उसके पैरों पर कोई नियंत्रण न था बस चले ही जा रहा था। शायद यह उसके जीवन का पहला क्षण था जब वह चेतन होते हुए भी कुछ सोच न रहा था , अचानक वह एक तेज़ ट्रक की चपेट में गया, अब वह सब सांसारिक बंधनों से मुक्त हो चुका था। जिन्दा रहने पर कभी एयर कंडीशन और अस्पताल का मुँह भी न देखने वाला कलुआ का शरीर अस्पताल में अपने मरने का कारण जानने के लिए एयर कंडिशन्ड पोस्टमोर्टम रूम में पड़ा हुआ था।

कलुआ के बूढ़े माँ-बाप को सब खबरें मिल गयी थी। सरकारी अमला भी पहुँच चुका था। जिनमे अब जीने की इच्छा न थी उनकी वृद्धावस्था पेंशन के लिए कई बार आवेदन पत्र फाड़ने वाला बाबू उनके अंगूठे के निशान लेने के लिए बिलबिला रहा था, टूटे -भूटे घर को कब्जाने वाले दबंग, सरकार से पक्का मकान दिलाने का भरोसा दिला रहे थे, और कलुआ के बूढ़े माँ-बाप अपनी टपकने वाली झोपड़ी के कोने में बैठे अपने अब तक के जीवन का लेखा- जोखा सोच रहे थे और अपना कसूर ढूढ़ने की कोशिश कर रहे थे…..।


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