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Suparna Mukherjee

Tragedy

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Suparna Mukherjee

Tragedy

मौत का तमाशा

मौत का तमाशा

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आज फिर से प्रकाशक जी को मेरी कहानी पसंद नहीं आई। मैं निकल पड़ा कहानी ढूढ़ने। बहुत घूमा पर चटकदार कहानी मिली नहीं। थक हारकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया। नज़र गई उस बच्चे पर जो कफन को चादर समझकर खिंच रहा था। उसे पता नहीं था कि माँ जागने के लिए नहीं फिर कभी नहीं उठने के लिए सोई है। पास में मीडियावालों की भीड़ थी सब खचाखच फोटो ले रहे थे कहानी बना रहे थे पर बच्चे को लाश से हटाए उसे कुछ खाने-पीने को दे कोई नहीं सोच रहा था। 

मैं बच्चे को लाश के पास से हटाने के लिए आगे बढ़ा सब पत्रकार,

चित्रकार और भी न जाने कौन-कौन मुझ पर भड़क गये सब कहने लगे "बच्चे को हटा लोगे तो गरीबी पर रिपोर्ट कैसे बनाएँगे ?" मुझे न चाहते हुए भी दूर हटना पड़ा। लोग गरीबी पर रिपोर्ट, कहानी,उपन्यास लिखने का प्रयास करते रहे। इसी प्रयास में कई घंटें बीत चुका था। बच्चा अब माँ की लाश और चादर छोड़कर भीड़ के साथ भी खेलने लग गया था। वह भूख,प्यास को हराकर जीना सीख गया था और मैं उसकी कहानी लाश बनकर लिखने लगा था। 


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