Akanksha Gupta

Drama


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Akanksha Gupta

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लौट आया वो

लौट आया वो

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सुबह के दस बज रहे थे। प्रयुक्त सड़क के किनारे अपनी कार खड़ी करके अपने दोस्त नीर को फोन लगा रहा था। पंद्रह बीस कॉल करने के बाद भी जब नीर ने फोन नहीं उठाया तो प्रयुक्त ने परेशान होकर कार की खिड़की से बाहर देखा तो उसके होश उड़ गए। सड़क के उस पार एक चेहरा उसे देखकर मुस्कुरा रहा था।


प्रयुक्त के दिल की धड़कनें बड़ी हुई थी। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि मरा हुआ कोई इंसान वापस आ सकता है। तभी उसे नीर का ध्यान आया जो इतनी देर से उसका फोन नहीं उठा रहा था। उसने तुरंत ही अपनी कार स्टार्ट की और नीर के घर पहुंच गया। उसके दिमाग मे चल रहा था कि कहीं नीर को कुछ हो तो नहीं गया, कहीं नीर ने भी तो उसे नहीं देख लिया जिस वजह से नीर किसी मुसीबत में हो।


यही सब सोचते-सोचते उसने डोरबेल बजाई। कुछ देर बाद घर के नौकर ने आकर दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही प्रयुक्त ने नौकर से नीर के बारे में पूछा और नौकर के नीर के कमरे की तरफ इशारा करते ही प्रयुक्त तेजी से दौड़ता हुआ सीढ़ियों से होकर नीर के कमरे में पहुँचा। नीर बहुत ही गहरी नींद में सोया हुआ था। उसे प्रयुक्त के कमरे में आने का पता भी नहीं लगा। नीर का फोन पलंग के साथ वाली मेज पर रखा हुआ था।


अब प्रयुक्त धीरे धीरे नीर के पास जाकर उसकी नब्ज़ देखता है तो उसकी नब्ज़ चलती देख प्रयुक्त ने चैन की सांस ली। उसके छूने से नीर की नींद खुल गई। वो हड़बड़ा कर उठ बैठा। उसने प्रयुक्त को देखा और पूछा- “यहाँ क्या कर रहे हो प्रयुक्त? तुम्हें तो ऑफिस में होना चाहिए।"

उसकी बात सुनकर प्रयुक्त ने गुस्से में कहा- “मैं यहां क्या कर रहा हूँ, ये तुम पूछ रहे हो? कितनी देर से तुम्हारा फोन ट्राई कर रहा हूँ, कम से कम एक मैसेज ही कर देते।”

“अरे यार, तुम्हें कल रात को ही तो बताया था कि मुझे मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही इसलिए घर जाकर दवाई लेने के बाद आराम करूँगा। भूल गए क्या?” इतना कहकर नीर बाथरूम में घुस गया।

तब प्रयुक्त को याद आया कि नीर ने वाकई उसे अपनी तबीयत के बारे में बताकर ऑफिस से छुट्टी ली थी। यह याद आते ही प्रयुक्त ने बाथरूम में बैठे नीर से चिल्लाकर कहा- “पर यार, मैं तो तुझे आज की मीटिंग की फाइल के बारे में पूछने के लिए फोन कर रहा था जो तू गलती से कल अपने साथ यहां ले आया था।”

“अच्छा क्या वाकई ऐसा है? फ़ाइल तो तू अलमारी में से भी निकाल सकता था। इसमें मेरी नब्ज़ चैक करने की क्या ज़रूरत पड़ गई। सच सच बता, क्या प्रॉब्लम हैं?” नीर बाथरूम से बाहर निकल कर हाथ धो रहा था।


प्रयुक्त को समझ नहीं आ रहा था कि वो नीर को क्या बताएं। पता नहीं नीर का क्या रिएक्शन होगा? क्या नीर उसका यकीन करेगा? जब प्रयुक्त काफ़ी देर तक कुछ नहीं बोला तो नीर ने उसे आवाज़ दी- “यार बता ना क्या हुआ? क्यों मेरे दिल की धड़कनें बढ़ाने पर तुला हैं? कुछ तो बोल मेरे भाई, बात क्या हैं?”

नीर के जोर देने पर प्रयुक्त ने एक सांस में कहा- “मैंने आज निशु को देखा हाईवे की सड़क के किनारे पर।” नीर जो ब्रश करने के बाद पानी से मुंह को साफ़ कर रहा था, नीशु का नाम सुनते ही घबरा गया और उसके मुंह से पानी बाहर निकल पड़ा। उसने प्रयुक्त से कहा- “यार उस हादसे को चार साल हो चुके हैं। मैंने बड़ी मुश्किल से उस हादसे को भुलाया हैं और तुम हो कि फिर से…..” नीर कुछ देर तक चुप रहने के बाद फिर बोला-“कहीं तुम फिर से तो डिप्रेशन की तरफ तो नहीं जा रहे हो?”

“नहीं यार, मैं तो बस सड़क किनारे खिड़की खोल कर ठंडी हवा खा रहा था और अचानक ही उसे देख लिया।” इतना कहते-कहते प्रयुक्त चार साल पहले उस हादसे के ओर चला गया जहाँ से यह सब शुरू हुआ था।


चार साल पहले प्रयुक्त की जन्मदिन की पार्टी थी। उस पार्टी में प्रयुक्त के केवल दो ही दोस्त थे, नीर और निशांत। चूंकि तीनों अलग अलग शहरों से आकर एक ही कम्पनी में काम कर रहे थे तो उन्होंने एक ही कमरा किराए पर लिया हुआ था। तीनों एक दूसरे की खुशियाँ और परेशानियाँ बांटने के लिए एक परिवार की तरह थे।

उस दिन शाम को भी एक रेस्तरां में डिनर लेने के बाद जब बाहर निकले तो आपस में बात करते हुए उन्हें इतना होश भी नहीं रहा कि सामने से कोई तेज़ रफ़्तार गाड़ी आ रही थी। जब गाड़ी हॉर्न बजाते हुए उन लोगों के बिल्कुल पास से गुज़री तो निशांत का संतुलन बिगड़ गया और वो आगे की तरफ एक दूसरी गाड़ी के सामने आ गया और बुरी तरह घायल हो गया। यह सब देखकर प्रयुक्त और नीर बहुत घबरा गए। उन्होंने तुरंत ही निशांत को अस्पताल में भर्ती करवाया और बिना अपनी पहचान जाहिर किए वहाँ से निकल पड़े। उन्होंने आनन फानन में अपना सामान पैक किया और अपने घर के लिए निकल पड़े।


कुछ समय बाद उसी अस्पताल में प्रयुक्त ने निशांत के बारे में पूछने के लिए फोन किया तो उसे निशांत की मौत के बारे में बताया गया। यह सच जानकर प्रयुक्त को धक्का लगा। उसने नीर को इस बारे में बताया तो उसे बड़ा दुख हुआ। उन दोनों को अपने आप पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि खुद पर पुलिस केस दर्ज होने के डर से उन दोनों ने निशांत को अस्पताल में अकेला छोड़ दिया था। उसे पता नहीं किस चीज की जरूरत पड़ी होगी, जिसकी वजह से निशांत की ज़िंदगी यूँ ही खत्म हो गई।


इसके बाद प्रयुक्त डिप्रेशन में चला गया। उसके परिवार में किसी को इसकी असल वजह नहीं पता थीं। उन्हें लग रहा था कि निशांत की मौत की वजह से प्रयुक्त परेशान हैं। धीरे-धीरे अपने परिवार के प्यार की बदौलत प्रयुक्त डिप्रेशन से बाहर से बाहर निकल आया। फिर नई नौकरी पाने के बाद काम के सिलसिले में आज फिर उसी शहर में था जहाँ पर ये सब शुरू हुआ था।


उस हादसे के बाद कुछ दिन तक नीर भी परेशान रहा था लेकिन उसे इस हादसे को भुलाने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। वह जल्दी ही अपने लिए नई नौकरी ढूँढने लगा। इत्तफाक से उसे भी प्रयुक्त की ही कम्पनी में नौकरी मिल गई और आज वो प्रयुक्त के साथ इस कम्पनी में काम कर रहा था।


प्रयुक्त यह सब सोच ही रहा था कि तभी दरवाजे की घंटी बजी। आवाज़ सुनकर प्रयुक्त वापस वर्तमान में लौट आया। उसने नीर से कहा- “इस वक्त कौन हो सकता हैं? कहीं निशु तो नहीं?”

“अपनी इमेजिनेशन पर लगाम लगा भाई, लगता हैं कोई ऑफिस से आया हैं हमें बुलाने। मैं जल्दी से तैयार होकर आता हूँ वरना नौकरी के साथ साथ ये घर और नौकर हाथ से गया समझो।” नीर ने कहा और जैसे ही तैयार होने के लिए मुड़ा, नौकर ने आकर उसे एक ग्रीटिंग कार्ड दिया। नीर ने कार्ड खोलकर देखा तो उस पर बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था- ‘थैंक यू।’

नीर ग्रीटिंग कार्ड की लिखावट देखकर चौंक गया। यह निशांत की लिखावट थी। जब नौकर ने बताया कि इस कार्ड को भेजने वाले व्यक्ति बाहर बैठे हैं। इतना सुनते ही प्रयुक्त और नीर बाहर की ओर भागे। बाहर जाकर उन दोनों ने देखा कि सोफे पर और कोई नहीं बल्कि खुद निशांत बैठा था।

निशांत को देखते ही दोनों के शरीर सुन्न पड़ गए। वो डर के मारे कुछ बोल नहीं पा रहे थे। उन दोनों को इस तरह देखकर निशांत हँसते हुए बोला- “भूत नहीं हैं हम, तुम्हारे निशु हैं।



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