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chandraprabha kumar

Comedy

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chandraprabha kumar

Comedy

क्या आप अच्छे श्रोता हैं

क्या आप अच्छे श्रोता हैं

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  कहते हैं कि श्रवण की बहुत महिमा है, बात अच्छे से सुननी चाहिये। मेरे पति ज़रा भी अच्छे श्रोता नहीं हैं। जब भी मैं उत्साह से भरी कोई बात कहने जाती हूँ तो उनके पास जाते ही पाला मार जाता है। पहिले तो वे कोई बात जल्दी समझेंगे नहीं। समझाने पर गौर से सुनेंगे नहीं। उनका व्यवहार देखकर अपने पर झल्लाहट हो आयेगी कि क्यों मैं बेवक़ूफ़ सी हर बार बात बताने चली आती हूँ ; जब दूसरे को सुनने या न सुनने से कोई मतलब नहीं। और जब बात समझेंगे तो उसे वेरिफ़ाई करने के लिये टुकड़ों में तोड़कर दुबारा पूछेंगे। तब तक तो प्रतिक्रिया जानने का उत्साह ही ख़त्म हो गया होता है। बात के चिथड़े हवा में उड़ते रह जायेंगे। उनके एक अटपटे से रिमार्क के बाद बीच में लम्बा मौन घिरा होता है। मन ही मन अफ़सोस होता है कि कौनसी शामत आयी थी जो भैंस के आगे बीन बजा दी, बंदर से अदरक का स्वाद पूछ लिया , या पत्थर को रस्सी से घिसने की कोशिश करने लगी। 

   इनसे अलग कहानी मेरी पड़ोसिन की है। जब भी उनसे बात करने जाओ तो वे मेरी बात , बात तो दूर की बात , मेरा वाक्य पूरा होने से पहिले ही बोलने बैठ जायेंगी। बल्कि मैं तो कहना कहूँगी कि वाक्य को सुनने या समझने से पहिले ही बोलने लगेंगी। 

       जैसे बात बात में मैंने कहा कि मेरी मुनमन के दाँत निकलने ……..। बस वे कहने बैठ जायेंगी-“ यही उम्र है दॉंत निकलने की, पर उसके तो दॉंत देर से निकले। मेरे पहिले बच्चे के दाँत तभी निकल गए थे जब वह छह महीने का था।” 

    फिर उनके दूसरे बच्चे या तीसरे बच्चे के दॉंत निकलने की कहानी शुरू हो जाती है। बीच में मैं बोलने की कोशिश करूँ कि -उसकी तबियत ख़राब……. तो बात को सुनने का उनमें उत्साह ही नहीं। अपने बच्चों के दाँत निकलने के समय उन्हें क्या क्या परेशानी हुई उसका ब्योरा सामने आ जाता है।……. वे ये भी भूल जाती हैं कि वे यही बात अनेक बार मेरे पास दोहरा चुकी हैं, मुझे उन्हें जानने की कोई उत्सुकता नहीं। मैं तो केवल यह पूछने आयी थी कि बच्ची की तबियत थोड़ी ख़राब है— ऐसे में क्या कुछ डर की बात तो नहीं। पर घंटा भर उनका गरुड़ पुराण सुनने के बाद तब कहीं अपने मतलब की बात उनसे पूछ पाते हैं। इतने में तो उनकी बात सुनते- सुनते दिवाला निकलने लगता है।

   उनके लिये कोई भी बात असामान्य या रोचक नहीं होती। मुझे तो विश्वास है कि अगर कभी मैं यह कहकर देखूँ कि कल मेरी तबियत इतनी ख़राब थी कि मरते मरते बची, तो भी वे अपनी बात कहने से न रुकेंगी। 

  जब भी आप किसी से बात करते हैं तो एक सामान्य सी आशा भी करते हैं कि यदि आपने कोई रोचक बात सुनाई तो वह उसमें रोचकता अनुभव करेगा। यदि आप किसी बात के बारे में कह रहे हैं तो दो एक बुद्धिमत्तापूर्ण प्रश्न उस बारे में पूछेगा जिससे पता चलेगा कि वह बात सुन रहा है। हँसी के बात करने पर थोड़ा हँसेगा , दुःख की बात सुनाने पर आपको धैर्य बंधाने की एक दो बात कहेगा। अर्थात् श्रोता से अपने भावों की अनुकूलता और सामान्य समझ की अपेक्षा करते हैं। 

      परंतु बात बात पर ‘क्या कहा’ , ‘मैं समझा नहीं’ कहने वालों की भी कमी नहीं। अरे भाई हरेक बात पर ‘तुमने क्या कहा,मैं समझा नहीं’ कहोगे तो क्या तुम्हारे कान कहीं और टंगे हैं या तुम अध्यात्म चिन्तन में लीन हो जो सामने बैठे आदमी के बात नहीं सुन पा रहे। या फिर ये लोग ऐसा प्रकट करते हैं कि मानों कहीं साक्षात्कार देने बैठे हुए हों और नर्वस हुए जा रहे हो, और प्रश्नकर्ता के प्रश्न पूछने पर हर बार ‘आपसे क्षमा चाहता हूँ’ कहना अपना फ़र्ज़ समझते हों। 

  इससे तो अच्छा है कि साफ़ कह दें कि मैं व्यस्त हूँ या मैं अभी बात करना नहीं चाहता। 

    कभी कभी तो मन में आता है कि ‘बातचीत की कला’ पुस्तक की एक एक प्रति इन लोगों के हाथ में पकड़ा दी जाए और इन्हें उसको पढ़ने व मनन करने को कहा जाए, जिससे ये सामान्य नियमों की तो कम से कम कद्र कर सकें। 

   यह कहॉं की लियाक़त हुई कि कहने वाले की बात आपने सुनी नहीं, उस पर अपना मतामत व्यक्त किया नहीं और अपना राग अलापने लगे।

 

 



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