Neha Gupta

Drama


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कोरोना और हमारे अनुभव (पहले और बाद की स्थिति)

कोरोना और हमारे अनुभव (पहले और बाद की स्थिति)

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2020 से पहले की दुनिया एक अलग ही दुनिया थी। जहां लोग अपनी इच्छा प्रकट करते थे,योजनाएं बनाते थे,व्यापार करने के लिए देश-विदेश जाते थे,मौज-मस्ती करते,घूमते और इंटरनेट के जरिए कुछ भी कर सकते थे। एक क्लिक पर ऑनलाइन शॉपिंग, बिजनेस , पेमेंट्स और भी न जाने बहुत कुछ....

देखते-ही-देखते यह सब बढ़ता गया, लोग अपने परिवार से कटने लगे, कुछ लोग काम के सिलसिले से विदेशों में जा बसे,तो कुछ इंटरनेट के माध्यम से इतने व्यस्त हो गए कि अपना अधिकतर समय फोन , लैपटॉप और इस तरह के अलग-अलग डिवाइस आदि अन्य जगह व्यतीत करने लगे। फिर चाहे काम हो या मस्ती लोग सिमट गए। उन्होंने अपनी खुद की एक नई दुनिया तैयार कर ली। 

*डिजिटल दुनिया* जिसमें प्यार,इमोशन,संस्कृति,पारिवारिक- संबंध सब लुप्त होता चला गया और रहा भी तो ऑनलाइन रूप में जैसे कॉल, वीडियो कॉल या फिर व्हाट्सएप्प, फेसबुक टेक्स्ट सन्देश के रूप में । लोग अपनी बनाई हुई इस दुनिया में इतना खो गए कि उन्हें प्रकृति का भी ध्यान ना रहा। शराब पीना,धूम्रपान करना,समुंदर किनारे पार्टी करना और इन सबके चलते मानो सफाई क्या होती है,यह याद ही नहीं रहा। सड़कों को गाड़ियों ने भर दिया। वहीं दूसरी तरफ जनसंख्या में वृद्धि और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को देखते हुए खेल के मैदान,पार्क आदि को सिकोड़ कर रख दिया। संसार से मानो प्रकृति घटती जा रही थी। दिन-प्रतिदिन जहां पत्ते,पेड़,खेत सभी लहराते थे, हरे-भरे थे,अब मानो फीके पड़ने लगे, जैसे मर गए हों।

 लोगों ने एक-दूसरे से मिलना,बातें करना,सब अपने मतलब पूरे होने तक रखा। प्रदूषण के चलते ओजोन लेयर में छेद बढ़ता गया,सितारे लुप्त हो गए। पेड़,जंगल सब सूख गए। समुद्र प्लास्टिक कचड़े से भर गए।

 हम कह सकते हैं,यह दुनिया जहां एक तरफ अच्छी दिशा में वृद्धि कर रही थी,वहीं दूसरी जगह कहीं चीजों में लुप्त होती नजर आई। यह बर्बादी की दुनिया थी। जहां गरीब-अमीर तो थे ही साथ ही साथ कुछ आश्चर्य करने वाली चीजें भी थी। 

कहते हैं

 *जब नाश मनुज पर छाता है,

पहले विवेक मर जाता है।।* 


ऐसे ही अविवेकी क्रियाकलापों ने अचानक, *2020* में एक नए वायरस को जन्म दिया *कोविड-19*

 जिसने देखते ही देखते पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया। 

बड़े से बड़े देश जो स्वयं को अस्त्र शस्त्रों और विज्ञान- तकनीक के मामले में अव्वल समझते थे, इसके आगे झुक गए। 

सरकार ने इन सबके चलते,स्थिति को ध्यान में रखते हुए लोगों को प्रतिक्रिया दी और कहा कि सामाजिक दूरी का पालन करें और अपने घरों में रहे यानी *लॉकडाउन* 

जो इससे बचने या इसकी गति रोकने का एकमात्र सम्भव तरीका था। लोगों ने डर और स्थिति को ध्यान में रखते हुए खुद को घरों में कैद कर लिया। अब सड़कें भी वीरान हो गई, चहल-पहल,घूमना-फिरना,कारोबार,देश- विदेश की यात्रा सब रुक सा गया,पर इसमें भी कुछ अच्छा हुआ ।

आंतरिक तौर पर,जैसे:- लोगों ने अपने परिवार को समय देना शुरू किया,खुद को समझा,मुस्कुराने की वजह खोजी, नाचना,गाना,खाना बनाना आदि कई टैलेंट उभर कर सामने आए। लोग प्रकृति के नजदीक आये। गन्दा-मैला और बुरी तरह प्रदूषित हो चुका हमारा यह पर्यावरण फिर से लहलहा उठा।

 यह दुनिया एक अलग ही दुनिया थी। जहां बस प्रेम और अपनापन था। इन सबके चलते फिर से पृथ्वी,प्रकृति सब जी गए,सांस लेने लगे और खेत भी लहराने लगे। कुछ लोगों ने इस दौरान बहुत कुछ पाया। यहां तक की प्रकृति भी हरी-भरी हो गई। आसमान नीला दिखने लगा। शहरों में प्रदूषण कम हो गया आदि। लोगों ने lockdown के चलते अपने अंदर काफी बदलाव किए जो सकारात्मक थे और हैं भी। 

आने वाले समय में जब हम इलाज पा लेंगे और हमें बाहर जाने की अनुमति दी जाएगी। तो हम सभी को वह दुनिया पसंद आएगी जिसे हमने पीछे छोड़ दिया था। पुरानी आदतें विलुप्त हो जाती है और वे नए के लिए रास्ता बनाती है। इस वायरस के चलते लोग फिर से एकजुट हो गए। इंटरनेट की दुनिया से निकल कर अपनी संस्कृति,समाज से जुड़े अपने बीच लोगों की बढ़ती कमी को महसूस किया और अपने परिवार को अपना समय दिया।


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