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Reena Pujara

Tragedy Classics Inspirational


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Reena Pujara

Tragedy Classics Inspirational


खिड़की

खिड़की

7 mins 460 7 mins 460

आज भी वो वैसे ही खिड़की के पास बैठकर बहार आसमान की ओर देख रही है। जैसे हर बार जब वो बहुत खुश या बहुत दुखी होती है तब देखती थी। यह कहानी शूरू होती तब से जब वो लडकी पांच साल की थी। ओर हर बच्चे की तरह उसको भी स्कूल में रखा गया। पढ़ाई में बहुत काबिल थी वो पर कुछ दिनों बाद घर के हालात कुछ इतने खराब हुए की पहले ही साल स्कूल छोड़ना पडा। फिर कुछ दिनों बाद नानी उसे अपने साथ गांव ले गईं। वहां गांव की स्कूल में पढ़ाई फिर शूरू करवाई और दो साल गांव में रहने के बाद फिर वो अपने घर वापस लौट आई। सिया नाम था उस लड़की का। अब वो थोड़ी बड़ी और शायद थोड़ी सी समझदार भी हो गई थी। पर हंमेशा डरी हुई और अकेले रहेती। ज्यादा किसी से बात नहीं करतीं थीं। उसे अकेले रहना पसंद था। खुद में ही खोई रहती थी। छोटी सी उम्र में ही उसने पापा के काम में पढ़ाई के साथ मदद करना शूरू कर दिया था और माँ की भी घरकाम में मदद करती थी। पढ़ाई में भी बहुत अच्छी होने के कारण हर इंसान उसकी तारीफ करता। जैसे कोई भी काम उसके लिए मुश्किल नहीं था। धीरे धीरे अब वो जितनी बड़ी हो रही थी उतनी ही घरवाले और बहार के लोगों की भी चहीती होने लगी थी।कोई चाहता तो भी उससे नफरत् नहीं कर पाता।हर किसी का दिल जीत लेती। अपने से बडो की सेवा करना और छोटो से प्यार करना उसे बहुत खुब आता। अब वो नौं वी कक्षा में आ गई थी। उसी दौरान दादी का पैर टूट गया और वह अस्सी साल की थी।और चल नहीं पाती थी। उसने तीन महीने पढ़ाई छोड़ दादी की सेवा में लग गई और कुछ दिनों बाद फिर स्कूल जाना शुरू किया। साथ ही पापा की मदद करना और दादी की सेवा भी करती। वो अपनी दादी से और दादी उससे बहुत प्यार करती। परिवार के अलावा कुछ और उसके लिए मायने नहीं रखता था। और परिवार में सभी की जान भी थी वो। कोई उसकी आंखों में आंसू नहीं देख पाता था। अपने और पराए हर इंसान जो उसे जानता, सबके दिलो पर राज करती। इसका कारण उसकी खूबसूरती नहीं थी क्यों की वो साधारण सी दिखने वाली लड़की थी। पर उसके संस्कार और सेवा की भावना और उसका स्वभाव था

     अब उसकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया।उसे चमॅ रोग हुआ और बहुत सी दवाई करवाने पर भी ठीक नहींं हुुआ। धीरे धीरे वो हारने लगी थी, टूूटने लगी थी। अब वो ददॅ सह नहीं पाती थी। पढ़ाई में भी मन नहीं लगता था। दसवीं कक्षा के इम्तहान आ रहे थे। उसने बीना हिम्मत हारे इम्तहान दिए और अच्छे से पास भी हुई। वो फेशन डिजाइनर बनना चाहती थी और एडमीशन भी हो गया, पर वो सपना पूरा ना कर सकी और पढाई छोड़ दी। फिर एक साल बाद उसने 

बारहवीं की परीक्षा पास की। बीमारी के दौरान भी अपनों के साथ ने उसे हारने नहीं दिया। पर मन ही मन वो थक तो चुकी थी। ऐसे मे अब वो चमॅ रोग ठीक होने लगा और चार साल बाद अब बिमारी ठीक हो चुकी थी।अब वो फिर खुश होकर जीने लगी थी। लेकिन किस्मत को ये मंजूर नहीं था। फिर एक बार उसे शिर में गहरी चोट लगी और लगभग सात साल तक वो ददॅॅ सहती रही। डॉक्टर का कहना था कि पूूूरी उम्र दवाई खानी पडेगी। अब ददॅ नही सहा जाता था। दवाई खा कर थक चुुकी थी और सरददॅ में कुछ भी ठिक नही हो रहा था।  उसकी पढ़ाई, करीयर सब खत्म हो चुका था।  अब वो धीरे धीरे डिप्रेशन में चली गई। वो इस बार पूरी तरह से टूूूट चुकी थी। उतना भी कम ना था।अब उसे जो सपने आते थे वो सच होने लगे थे और उसके और उसके परिवार के सदस्यों के साथ वही सब होता था जो वो सपने मेंं देखती थी। अब वो डरने लगी थी। उसे कुछ भी अच्छा नहींं लगता था। घर में भी कुछ परेशानियाँ आने लगी थी और हैैरानी की बात ये है कि वो पहले से सपने में सब देख लेेेती थी।अब उसे सपनो सेे डर लगता था। सब जानते हुए भी वो कुछ भी बुुरा होने से रोक नहीं पाती थी। उसे घरवालो की हिम्मत ने और दादी के प्यार ने जिंंदा रखा था। मरने के भी खयाल आने लगे थे। और सात साल बाद भगवान की कृपा से उसका सरददॅ ठीक होने लगा और फिर एक बार उसे जीने का मौका मिला। सब खुश थे तभी उसके बड़ेे पापा और दादी की एक ही हफ्ते में मौत हो गई जो वो सपने मेंं पहले ही देेेख चुकी थी। अब वो खुद से नफरत करने लगी थी। उसके परिवार में  उसकेे जनम के बाद पहली बार किसी की मौत हुई थी। अब की बार ये सदमा उसके लिए बडा मुश्किल रहा। खुद की परेशानियों से वो लड लेती थी पर अपनो पे आती थी तो वो झेल नहींं पाती थी। अब वो फिर हार चुकी और इस बार वो मौत को मिलकर फिर जिंदा बच गई। सब आस छोड़ चुके थे कि अब वो जिंदा बचेेेगी। और एक बार फिर वो ठीक हुई पर अब जैसे कुछ भी नहींं बचा था। चुपचाप, डरी हुई और सबके साथ होकर भी अकेली रहने लगी थी। रोज रात खिड़की के बाहर आसमान मेंं देखती रहती और पूूरा दिन घर के कुछ काम में निकाल देेेती। बस जैैसे तैैैैसै जिंदगी काट रही थी।अपनों के लिए जिंदा थी। खुद के लिए जिने का मौका ही नहींं दिया जिंदगी ने। अब वो पच्चीस साल की हो चुकी थी। 


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