काम विध्वंसक
काम विध्वंसक
महंत ने आग्नेय नेत्रों से देव दासी को देखा जो आज बसंत ऋतु पर कामराज और रति के कामुक प्रस्तावित नृत्य को सब श्रेष्ठ जनों के सामने प्रस्तुत करने वाली थी।
कालरात्रि भैरवी का रूप ले न जाने क्यों आज देवदासी शाम्भवी सबके सामने उतरी थी बुलाने पर।
शायद शाम्भवी के अन्तःकरण में धधकती ज्वाला की इंतहा हो गई थी।उसने आज शिव का तांडव नृत्य करके विध्वंसक बनने की करने की शुरुवात कर दी थी।
महंत उसका ये रूप देख अंदर तक सहम गया।गजरे व सुगन्ध से महकती देह जो उसे सुख का कारक लगती थी और पुरुष पिपासा को शांत करती दिखती थी,वो आज अर्धनारीश्वर के समक्ष उपस्थिति महसूस कर विरक्ति का अनुभव कर रहा था।
आज उसे स्त्री की पूर्णता का दर्शन हुआ।
