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Dinesh Dubey

Drama

3  

Dinesh Dubey

Drama

इंसानियत भाग 2

इंसानियत भाग 2

13 mins
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मामा दिव्या के सामने आता है और पूछता "है ये कौन है ? 

दिव्या घबरा जाती है। वह कहती है " क्लास में साथ पढ़ता था, कलेक्टर बन गया तो मिलने आया था "!!


ठाकुर के सामने दिव्या खड़ी है। ठाकुर गुस्से से उसे देख रहा है। 

वह उससे कहता है" तेरा दिमाग़ खराब हो गया है, एक ठाकुर की बेटी होकर चमारों से रिश्ता रखती है, अरे वह सब हमारे सामने खड़े होने की औक़ात नहीं रखते, तुम उनसे मित्रता कर रही हो!!


बाप-बेटी में बहस होती है, ठाकुर गुस्से में उसे एक थप्पड़ जड़ देता है।

फ्लैशबैक टूटता है।

इधर ऑफिस में बैठे आशुतोष को अपने गाल पर थप्पड़ का एहसास होता है। 


उसी समय डिप्टी कलेक्टर एक फाइल लाकर देता है, और कहता है " यह सब ठाकुर सुरेन्द्र प्रताप के अवैध प्रकार से बनाई हुई संपत्ति का ब्यौरा है, पर आज तक किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उसके खिलाफ़ कार्यवाही कर सके।!

आशुतोष कहता है-"अब कार्यवाही भी होगी और उसके अवैध निर्माण तोड़े भी जाएंगे, कानून सबके लिए एक है। उसके लिए कोई भी आदमी छोटा या बड़ा नहीं है"!!


ठाकुर साहब का एक गोडाउन तोड़ने के लिए जेसीबी लगी हुई है। पूरी पुलिस फोर्स साथ है। उसी समय ठाकुर साहब अपने

आदमियों के साथ आते हैं, 

वह कहते हैं " किसकी इतनी हिम्मत हुई"!!

उसी समय आशुतोष की गाड़ी आती है। 

वह गाड़ी से उतरता है। 

ठाकुर उसे देख चिढ़ जाता है। 

दोनों में बहस होती है, 

उसी समय सीआरपीएफ आती है, उसे देख ठाकुर चुप हो जाता है और धमका कर जाता है।

आशुतोष कहता है "ये तो अभी शुरूआत है"!!


दिव्या आशुतोष से मिलकर कहती है," तुमने जिसका गोदाम तुड़वाया है वह मेरे पापा हैं"!!

आशुतोष को यह सुन झटका लगता है। वह कहता है" क्या! वह तुम्हारे पापा हैं"!?? 

वह दिव्या को बताता है कि उसके भाई का कत्ल भी उन्होंने ही किया। 


दिव्या यह सुन शाॅक्ड होती है। 

वह आशुतोष का हाथ पकड़ कर कहती है "जो भी हो मैं तुम्हारे साथ हूँ।!!


ठाकुर मिनिस्टर से बात कर रहा है। मिनिस्टर कहता है कि " हम कुछ नहीं कर सकते हैं। उसका सपोर्ट तो होम मिनिस्टर कर रहे हैं। !!


ठाकुर कहता है," इसको भी इसके भाई के पास पहुँचाना होगा। मिनिस्टर कहता है, होश से काम लो, उसे छुआ भी तो तो तुम्हारा पूरा साम्राज्य समाप्त हो जाएगा। दिमाग़ से सोचो, तुम्हें कोई नया तरीका अपनाना होगा।


आशुतोष परेशान होकर ऑफिस में टहल रहा है। उसी समय डिप्टी कलेक्टर पांडे आता है। 


वह उसकी परेशानी का कारण

पूछता है तो वह दिव्या के प्यार के बारे में बताता है तो पांडे कहता है- सर, आपसे क्या कहूँ.... मैंने भी प्यार किया, वह भी

ब्राह्मण लड़की से.... फिर भी घरवालों ने हमें अपनाने से इन्कार कर दिया।


आशुतोष पूछता है " क्यों ? 


वह कहता है- मैं पांडे हूँ.... वह दीक्षित है.... अब बताये.... जब वह ब्राह्मण है, तब भी वह हमसे नीच है... तो पाठक दीक्षित को ब्राह्मण क्यों कहते हैं...


आशुतोष सोचता है।


एक स्थान पर बहुत सारे लोग जमा है। वह दो समुदाय हिंदू और मुस्लिम में एक जगह को लेकर विवाद हो रहा है। वहाँ


आशुतोष और पांडे पहुँचते हैं। दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीले देते हैं... वहाँ ठाकुर के आदमी भी आते हैं। 


आशुतोष दोनों के मुखिया को समझाता है और कहता है" इस जगह पर आप भी इबादत करे और ये भी पूजा करे, यह स्थान हर समुदाय का

होगा। सच्चा धर्म है इंसानियत का तो मैं यह चाहता हूँ यहाँ क्यों ना एक बढ़िया हाॅस्पिटल बनवा दिया जाए- जिससे सभी को फायदा मिले।"!!


थोड़ा ना-नुकुर के बाद सभी मान जाते हैं। 

ठाकुर के आदमी बवाल खड़ा करना चाहते हैं। 

आशुतोष उन सबको धमकाता है।

आशुतोष कुछ और भी समस्यों सुलझाता है, जिससे जिले के हर आदमी उसकी ओर झुक जाते हैं। उसके साथ दिव्या भी आती है।


ठाकुर अपनी कोठी पर परेशान है। उसी के पास उसके लोग घबराये से खड़े हैं। उसका भाई उसे समझाने का प्रयास कर रहा है। ठकुराईन भी समझाना चाहती है तो वह सभी को डपट देता है। 


उसी समय दिव्या आती है। उसे देख वह बिफर जाता है

और उसे थप्पड़ मारते हुए कहता है " कि मेरे लाड़-प्यार का यही नतीजा दे रही है। मैं तुझे भी काटकर फेंक दूंगा। मुझे अपनी

इज्ज़त से अधिक कोई प्यारा नहीं है।!!


ठकुराइन से कहता है- इसका शादी तक घर से निकलना बंद करो।


दिव्या गुस्से में जाती है!!


वह कहता है- साँप को अधमरा नहीं छोड़ना चाहिए। मुझे इस संपोले को पहले ही मार देना चाहिए था।!!



आशुतोष अपने सरकारी मकान में है। उसके माँ-बाप भी साथ हैं। उसी समय पांडे वहाँ आते हैं। वह बताते हैं कि कुछ और

फाइलें मिली हैं। 


वह कहता है कि" ठीक है, जो भी कानूनी कार्यवाही है, करो। !!

उसके पिता कहते हैं," बेटा, इससे दुश्मनी मोल मत लो, !!


आशुतोष कहता है- मैं अपना काम कर रहा हूँ, किसी से दुश्मनी नहीं, तभी एक आदमी आकर बताता है कि" ठाकुर ने दिव्या को घर में बंद कर दिया है और कहा है कि शादी से पहले वह बाहर नहीं आयेगी "!!


आशुतोष सोचता है और पांडे से कहता है "पांडे जी, कानूनी तौर पर किसी भी बालिग या नाबालिग को ज़बरदन कैद कर माँ-बाप हो या समाज बंदी नहीं रख सकता।!!


दिव्या अपने कमरे में बंद है, उसकी माँ खाना लेकर आती है। तो वह खाने से मना कर देती है। ठाकुर उसे जान से मारने की धमकी देता है,!!


वह कहती है "उसकी ग़लती क्या है, वह एक इंसान से प्यार करती है और एक इंसान को इंसान से प्यार करने के लिए कोई रोक नहीं सकता। आप सभी के इसी व्यवहार के कारण देश और समाज बंट जाता है।!! 


ठाकुर उसे धक्का मारकर जाता है।


आशुतोष ठाकुर के घर आता है। ठाकुर उसे देख आग-बबूला हो जाता है। वह अपनी राइफल उठाकर उसके पास आता है।


आशुतोष को धमकाता है। तभी आठ-दस गाड़ी भरकर पुलिसवाले आते हैं, ठाकुर उन्हें देख हड़बड़ा जाता है। पुलिस कमिश्नर

भी आता है।


दिव्या को पांडे घर पर ले आता है। साथ ही आशुतोष भी है। पांडे की पत्नी दिव्या को सम्हालती है।


आशुतोष कहता है "पांडे जी मै। इसे यहाँ इसलिए रख रहा हूँ ताकि किसी को पता ना चले, कि यह कहाँ है, एक दो दिन में ही हम कोर्ट में शादी कर लेंगे।



ठाकुर के घर उसके होने वाले समधी आते हैं और कहते हैं " आपने तो हमारी भी नाक कटवा दी, सभी कह रहे हैं कि तुम्हारी

होने वाली बहू तो नीच के साथ भाग गई, मेरी बेटी होती तो मैं जिंदा जला देता...!!


ठकुराईन कहती है " इसीलिए आपको बेटी नहीं हुई.... अरे वह भी ठाकुर की बेटी है, तभी उसने सभी के सामने अपने प्रेमी का हाथ थामने की हिम्मत की, "!!


ठाकुर गुस्से में पत्नी को थप्पड़ मारता है और कहता है" हरामज़ादी... बड़ों के बीच में बोलती है, काश पैदा होते ही मार दिया होता...."!!


ठकुराईन कहती है" तुम मर्द जात औरतों पर जुल्म ढाने के अलावा कर भी क्या सकते हो... कहने को तो देवी माँ की पूजा करते हो, और औरतों को खिलौना समझते हो...!!!


ठाकुर कहता है "हट जा सामने से, नहीं तो यहीं भून दूँगा। वह गुस्से में जाती


है।

ठाकुर महेन्द्र सिंह से कहता है- मैं आपका अपराधी हूँ, अब जो सज़ा देना हो, दे लो, !!


महेन्द्र कहता है- सज़ा तो तुम वैसे भी पा गये, हम क्या दें...।


सुबह सभी अखबारों मे आशुतोष और दिव्या की ख़बर छपी है। आशुतोष अपने आफिस में बैठा है। पीयून आकर कहता है कुछ लोग आपसे मिलना चाहते हैं... वह इशारा करता है, भेज दो, !!


बुद्ध धर्म को मानने वाले कुछ लोग आते हैं, वह बैठने का इशारा करता है। वह सब कहते हैं " हम सब बौद्ध हैं। आप भी हमारे समाज से हैं। आप बौद्ध धर्म अपना लीजिए तो उस ठाकुर की हिम्मत नही होगी। हम उसे सबक सिखा देंगे।,!!


आशुतोष कहता है", भाइयों, भवगान बुद्ध ने अहिंसा का पाठ पढ़ाया था, पर आप सब तो हर बात पर हिंसा करने को उतारू हो जाते हो, कभी किसी ने किसी की मूर्ति पर कालिख लगा दिया तो आँख मूंद कर हिंसा शुरू कर देते हो, यह भी नहीं सोचते कि शायद यह हरकत किसी बाहरी ने की हो, ताकि हम सब आपस में लड़ें। देखिए, मैं आप सबसे एक ही विनती करता हूँ हम सब एक ही धर्म माने इंसानियत का.... एक इंसान दूसरे इंसान के काम आये, भाईचारा बढ़े, इससे बड़ा धर्म कोई नही है। !!


वह सब बड़बड़ाते हुए वहाँ से चले जाते हैं।


ठाकुर मिनिस्टर के साथ बैठा है। मिनिस्टर कहता है- मैंने तुम्हें इसलिए बुलवाया है कि तुम्हें समझा सकूं कि बेटी गवाँ कर

इज्ज़त तो गवाँ ही दी, अब शांति रखें अन्यथा बहुत बुरा होगा, कलेक्टर ने आते ही इतना अच्छा काम किया है कि सेंटर तक

उसकी हिमायत हो रही है। 


ठाकुर कहता है," अगर तुम्हारी इज्ज़त गई होती तो पता चलता, मुझे सिखाने की ज़रूरत नहीं है।!!


मिनिस्टर कहता है- "मेरी मानो तो यह एक बढ़िया मौका है, उसे अपना दामाद बना लो, उसकी मशहूरियत का फायदा उठाओ और सांसद बन जाओ। वह आज हमसे भी ऊपर उठ चुका है। यह तो मान ही लो। यह अलग बात है कि हम अपनी

आन में कुछ माने ना।!! 


ठाकुर कहता है- अगर इसके आगे एक भी शब्द कहा तो आपकी खैर नहीं, !!


वह गुस्से में जाता है।



रात के समय आशुतोष के सरकारी मकान को ठाकुर के आदमी घेर लेते हैं। वह गार्ड को मारकर बेहोश कर देते हैं, और अंदर जाते हैं। अंदर दरवाज़ा खुला मिलता है। अंदर सो रहा अर्दली पूछता है, " क्या बात है- आप सब कौन हैं। ??


एक पूछता है " कहाँ है कलेक्टर, कहाँ हैं उसके माँ बाप? और ठाकुर साहब की बेटी ? वह कहता है वह तो यहाँ नहीं है।


सभी चैंकते हैं... तभी अचानक लाइट जलती है और चारों ओर से पुलिस उन्हें घेर लेती है। दोनों ओर से फायरिंग होती है। एक दो बदमाश

मारे जाते हैं और बसकी सब पकड़े जाते हैं।


पुलिस कमिश्नर स्वयं ठाकुर को पकड़ने जाता है। ठाकुर कहता है" मैंने क्या किया, "??


कमिश्नर कहता है " तुमने जो आदमी भेजे थे, वह सब पकड़े गये, उन्होंने तुम्हारा नाम लिया है चलो। 


ठाकुर कहता है " मैं मंत्री जी से बात करता हूँ। 


कमिश्नर कहते हैं, " मैं

नम्बर लगा देता हूँ। वह नम्बर लगाते हैं, मंत्री फोन उठाता है। कमिश्नर ठाकुर को फोन देता है।


ठाकुर कहते हैं" मंत्री जी, ये

सब मुझे पकड़ने आए हैं,"!!


मंत्री कहता है," मैंने तो पहले ही आपको मना किया था, कोई ग़लत हरकत मत करना, वरना भारी पड़ेगा, तुम मानते तो हो नहीं, अब मुझे सोने दो!!।


ठाकुर गाली देता है। 


पुलिस उसे ले जाती है। ठकुराईन बेटी को फोन लगाती है।


दिव्या फोन रखती है। 


उसी समय आशुतोष वहाँ आता है। दिव्या कहती है " आपने पिताजी को बंद करवा दिया, "!!


आशुतोष कहता है "मैंने नहीं, पुलिस ने बंद किया है। पांडे जी की बात मानकर यदि हम घर नहीं छोड़े होते तो अभी बात करने के लिए जीवित ना रहते। 20 गुंडे भेजे थे हमें मारने के लिए।!!


दिव्या कहती है," जब तक मैं हूँ, तुम्हें यमराज भी नहीं छू सकते।"!! 


आशुतोष मुस्कुराकर कहता है- ना तुम सावित्री हो और ना मैं सत्यवान हूँ। दिव्या भी मुस्कुराती है। दोनों एक दूसरे को प्यार से देखते हैं।


सुबह आशुतोष खुद ठाकुर साहब की जमानत करवाता है। ठाकुर थानेदार के पास आते हैं। सामने आशुतोष को देख बिफर उठते हैं। 


थानेदार कहता है- ठाकुर साहब, कलेक्टर साहब ने ही आपकी जमानत करवाई है। वरना आपकी जमानत भी नही होती, !!


ठाकुर गुस्से में दोनों को देखता है और कहता है," इसने अपनी मौत की ज़मानत करवाई है।


आशुतोष कहता है-" वैसे आप यमराज तो लगते नहीं, फिर भी मेरे होने वाले ससुर जी हैं.... इसलिए दिल नहीं माना, छुड़वा दिया.... वैसे मेरी एक बात माने ... तो काहे ना इन थोथी जात पात से उपर उठकर इंसानियत का धर्म अपना लेते...."!!


ठाकुर गुस्से में जाता है।



ठाकुर अपने आदमियों के साथ आशुतोष के गाँव जाता है और उसके घर में आग लगवा देता है और गाँव वालों को धमकाता

है कि " अगर उसने हमारी बेटी से शादी की तो तुम सभी के गांव को जलाकर खाकर कर दूंगा।!!


उनका मुखिया कहता है"- वह ना ही इस गाँव में रहता है और ना ही हम सब उसे कोई सहायता कर रहे हैं...!!


ठाकुर कहता है- मुझे नहीं मालूम.... तुम सब अपने समाज के नाम पर उसे रोक सकते हो, नहीं तो अंजाम भुगतोगे।!!



मंत्री कहता है यह सही चाल है, अब गाँव वालों की बात तो उसे माननी ही होगी, नहीं तो समाज से हटना होगा।" 


मंत्री का आदमी कहता है" महाशय, क्या बहकी बहकी बातें कर रहे हो, अरे उसे क्या फर्क़ पड़ने वाला है। वह तो समाज कब का छोड़

इंसानियत की डगर पर चल पड़ा है!!। 


मंत्री कहता है"" तुम नहीं समझोगे, यह एकदम सही चाल है।!



आशुतोष के गाँव में कुछ लोग उसके सामने बैठे हैं। 


आशुतोष कहता है- अच्छा हुआ मेरा पुराना घर जला दिया, उसकी जगह पर नया घर बनवा लेंगे। और आप लोग चिंता मत कीजिए। वह आपके गाँव के पास भी नहीं आ पायेंगे। सभी गांव वाले कहते हैं" आप उसकी लड़की से शादी मत करो। वह साँप है। कितने दिन तक फोर्स बिठाओगे... जिस दिन उसे मौका मिले, वह

जरूर डसेगा। तुम्हें हमारी बात माननी ही होगी। नहीं तो हम सब यहीं आमरण अनशन करेंगे।



रात में ठाकुर बौखलाया हुआ है। उसे पता चल चुका है कि कल दोनों कोर्ट में शादी करने वाले हैं। वह अपने आदमियों से कहता है" कुछ भी हो, उन्हें ढूंढो और खत्म कर दो।"!!


वह मंत्री को फोन लगाता है कि वह पता लगाये कहाँ रूके हैं। मंत्री कहता है" मुझे इसमें मत फंसाओ। उसकी शादी में स्वयं गृहमंत्री रूचि ले रहे हैं, तुम भी शांत रहो, बल्कि मेरी बात यदि समझ में आये

तो उन्हें जाकर आशीर्वाद दो और उनकी प्रसिद्धि को मानो"!!


ठाकुर गुस्से में फोन काटता है। वह कहता है " मैं उन्हें ढूंढ लूंगा।!!


आशुतोष के साथ पांडे और उसके सहयोगी हैं। साथ ही मुस्लिम समाज के कुछ लोग भी हैं। मुस्लिम का नेता कहता है, " जनाब मैं तो कहता हूँ आप मुसलमान होते तो क्या मजाल होती कि इस ठाकुर की.. ,"!!


आशुतोष कहता है" जनाब, मैं इंसान हूँ और इंसानियत ही मेरा धर्म है और रही बात मुसलमान होने की तो आप भी तो अपने बेटे से नाराज़ हैं कि उसने आपसे नीची जाति की लड़की से विवाह क्यों किया? आप सब चिंतित मत होइये, ठाकुर साहब हमें छू भी नही पायेंगे। बस आप सब शांति बनाये रखें। पांडे जी आपने सारी व्यवस्था कर दी।!


पांडे कहते हैं "जी सर। आप निश्चिंत रहें। मुस्लिम आदमी पूछता है- आप कोर्ट कैसे जाने वाले हैं? 


आशुतोष कहता है- वह तो मैं सुबह ही बताऊँगा- मैं अपने ससुर की ताकत और उनके रसूख को अच्छी तरह से जानता हूँ। इसलिए मैं अंत समय में सोचूंगा कैसे जाना है.... !!!


पांडे मुस्कुराकर कहता है- "आपकी इसी खासियत की वजह से तो ठाकुर जी भी कुछ कर नहीं पाये, क्योंकि आप किसी को कुछ सोचने-समझने का मौका ही नहीं देते।


आशुतोष और दिव्या शादी करके बाहर आते हैं। वह दोनों अपनी गाड़ी की ओर बढ़ते हैं। उनके साथ पांडे जी और भी कई

लोग हैं। वह गाड़ी के पास पहुँचते हैं, तभी सामने से ठाकुर की गाड़ी आकर उनके सामने रूकती है। ठाकुर गाड़ी से उतरते

हैं। उन्हें देख दोनों चैंकते हैं। उसी समय एक गाड़ी और रूकती है, जिसमें से ठकुराईन और उसका भाई उतरता है।!


ठाकुर अपनी राइफल आशुतोष के सीने पर लगाकर कहता है- तुमने मेरी इज्ज़त उछाली है, मैं तेरी जिं़दगी उछाल दूंगा। तभी दिव्या सामने आ जाती है। बाप-बेटी में थोड़ी बहस होती है।


ठाकुर कहता है- तो ठीक है, पहले तू ही मर,"!!

तभी ठकुराईन सामने आ जाती है। उसके बाद साला सामने आता है, उसको हटाकर पांडे सामने आता है। धीरे-धीरे एक एक करके कई सारे लोग उनके सामने आ जाते हैं.... इतने मेें वहाँ पुलिस भी आ जाती है।


ठाकुर गुस्से में कहता है ठीक है, "मैं तुम लोगों को नहीं मार सकता, तो खुद तो मर सकता हूँ। मैं अपनी बेइज्ज़ती बर्दाश्त नहीं कर सकता हूँ ।

वह खुद के सर पर गोली रख बंदूक चलाते हैं। तभी ठकुराईन आकर बंदूक पर हाथ मारती है तो गोली सर पर ना लग के कंधे में लगती है। सभी को लगता है गोली लग गई, दिव्या ज़ोर से चीखती है। आशुतोष भी भागकर देखता है तो गोली गंधे पर लगी है। वह चिल्लाता है एम्बुलेंस....।


ठाकुर हाॅस्पिटल में है। उन्हें खून चढ़ रहा है। उनकी आँख खुलती है तो देखते हैं उसके बगल के बेड पर आशुतोष खून दे रहाहै तो दूसरी ओर पांडे भी अपना खून दे रहे हैं।


तभी उनका साला आकर डाॅक्टर पर भड़क कर कहता है-अरे ये क्या कर दिया.... निकालो निकालो.... इनके शरीर से सारा खून फिल्टर करके निकालो..... तुमने यह भी नहीं सोचा कि इनसे छोटी

जाति का खून इन्हें कैसे चढ़ेगा... ये मर जायेंगे पर किसी छोटी जाति का खून नहीं लेंगे।!!


डाॅक्टर कहता है- भाई, यहाँ तो पता

नहीं कितने इंसान आकर खून दे जाते हैं। खून में कोई जात पात नहीं होती है, जिसका खून मैच होता है दे देते हैं....

साला कहता है " काहे भगवान, अल्लाह ईसा मसीह ने खून, जात पात के हिसाब से नहीं रखा? 


तभी ठाकुर धीरे से कहते हैं- साले साहब, अब तो सब लोग मुझे माफ कर दो।


सभी खुश होते हैं। ठाकुर साहब खुद ही दिव्या और आशुतोष का हाथ एक दूसरे के हाथ में देते हैं।




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