Sandeep Murarka

Tragedy


4.5  

Sandeep Murarka

Tragedy


गोड़से ...एक हत्यारा

गोड़से ...एक हत्यारा

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दिनांक 30 जनवरी 1948 । मेरी हत्या कर दी गई । मुझे क्यों मारा , किसके कहने पर मारा , मुझे नहीं पता । पर मुझे याद है कि मारने से पहले खाकी कपड़े पहने नाथूराम गोडसे ने मेरे पाँव छुए और कहा "नमस्ते बापू" ।


आजादी मिले 168 दिन ही तो हुए थे , उस समय तक ना पुलिस तैयार हो पाई थी , ना प्रशासन, ना खुफिया तन्त्र , सो पता ही नहीं लग पाया कि मैं क्यों मारा गया ? मुझे मारने से क्या लाभ हुआ ? 


दूसरे दिन मैं बिड़ला हाऊस में चिरनिद्रा में लेटा हुआ था , अंदर लोग मेरे शव का दर्शन कर रहे थे , बाहर लोगों का जुटान यमुना तक था , जहाँ राजघाट पर मेरा अन्तिम संस्कार होना था , संभवतः 25 लाख लोग रहे होंगे । मैं हर एक को देखना चाहता था कि किसकी आँखो में आँसू है , किनके चेहरे पर खुशी । असल में मैं ढूँढ़ना चाहता था वैसे चेहरे जो मेरी मौत पर खुश हों , क्योंकि कुछ तो अपराध किया होगा मैंने उनका , वरना इतनी घृणा क्यों ? मैं फिर निराश हुआ ! सभी अपने मिले । सभी रोते मिले । 


दिनांक 31 जनवरी । करीब पौने बारह बजे , लगभग 3.25 किलोमीटर लम्बे जुलूस के रूप में मेरी अन्तिम यात्रा प्रारंम्भ हुई , जो क्वींसवे, किंग्सवे और हार्डिंग एवेन्यू से होते हुए चार बजकर 20 मिनट पर यमुना किनारे पहुँची । मैं स्वयं के शव को धूप छिड़की हुई चंदन की लकड़ियों की चिता पर देख रहा था , मेरे तीसरे पुत्र रामदास ने ठीक पौने पाँच बजे मुझे मुखाग्नि दे दी । इधर मेरा मृत शरीर धू धू कर जलने लगा , उधर लाखों लोगों द्वारा भजन चलने लगा । क्या आज कोई घर नहीं जाएगा , क्या इन्हें भूख नहीं लग रही , अरे ! कोई यहाँ पानी की बोतले बांटने वाला भी तो नहीं, आजकल ये आराम है कि श्मशान घाट पर पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर की बोतल औऱ रजनीगंधा की पुड़िया अवश्य मिलती है । चिता चौदह घंटे तक जलती रही , मैं एक ओर अपने शव को जलता देखता रहा , दूसरी ओर बैठा बैठा गीता का पाठ सुनता रहा । चिता की लपटें आकाश की ओर उठ रही थी , सूरज डूब चुका था , लहरों की तरह लोग आगे बढ़ रहे थे, मै उनकी सिसकियों की आवाज सुन रहा था , लगता था मानो राजघाट पर कोई तूफान उतर आया हो, यह जनमानस की भावनाओं का तूफान था, कई राज्यपाल, राजदूत, केंद्रीय मंत्री , माताएँ , बहनें , क्या ग्रामीण , क्या शहरी सभी लोग चिता की परिक्रमा में लगे थे । 


तीसरे दिन 1 फरवरी , रात्रि 7.30 बजे विशेष प्रार्थना होने लगी , सभी तो थे , पंडित नेहरू, सरदार बल्लभभाई पटेल, देवदास गांधी, सरदार बलदेव सिंह, आचार्य कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद , मौलाना आजाद, लार्ड माउंटबैटन , आजाद भारत के प्रथम प्रधान सेनापति मेजर जनरल राय बूचर , चार हजार सैनिक, एक हजार वायु सैनिक, पुलिस के हजारों सिपाही, पण्डित , मित्र , रिश्तेदार । 


प्रार्थना सभा सम्पन्न हुई , अब मेरी अस्थियाँ इकठ्ठी की जा रही थी , ओह ! उसमें एक गोली भी निकली । हाथ से बुनी गई सूत की थैली में अस्थियाँ एकत्र की जा रही थी , फिर उनपर यमुना के पवित्र जल का छिड़काव किया गया , मेरी अस्थियाँ अब तांबे के घड़े में बंद हो चुकी थी, कलश को वापस बिड़ला हाउस ले जाया जा रहा था, मैं भी साथ था । 


कहते हैं अन्तिम यात्रा से ही इन्सान की अच्छे व बुरे कर्म का पता चलता है , कोई किसी उम्र में मरे , श्मशान घाट पर लोगों के बीच दो बातें अवश्य होती है, "भला आदमी था जल्दी चला गया" अथवा "चला गया पर था तो .........ही " , मैंने बहुत ढूंढ़ा कि कोई तो मिले दूसरी वाली चर्चा करते , पर मैं फिर निराश हुआ। सभी दुःखी मिले। सभी उदास मिले । 


" मेरे पिता "


मैं खुश हूँ , कुछ ही देर में अपने पिता से मिलूँगा , करमचन्द उत्तमचन्द गाँधी, जो पोरबंदर , राजकोट , बीकानेर की राजसभा में उच्च पदों पर आसीन रहे , वे निरंकुश अयोग्य राजाओं की मनमानी पर दुःखी रहते , युगों से दबी कुचली प्रजा पर होते अत्याचार को देखकर सिसकते , ब्रिटिश सत्ता के निरंकुश प्रतिनिधियों के समक्ष दंडवत होते राजाओं को देख तिलमिला उठते , परन्तु मौन व मजबूर दिखते । आजाद भारत का सपना पहली बार मैंने अपने पिता की आँखो में ही देखा था , औऱ यह भी समझ पाया कि इस गुलामी के जितने जिम्मेदार अंग्रेज थे , उससे ज्यादा जिम्मेदार थे रियासतों में बँटे स्वार्थी राजपरिवार औऱ उनके महलों में तैरते षड़यंत्र । 


" कस्तूरबा "


पिछले तीन साल ग्यारह महीनों से कस्तूरबा भी तो वहीं है , कैसी होगी वो , धार्मिक , सादगी की प्रतिमूर्ति , दृढ़ , शाकाहारी , मेरी पत्नी कस्तूरबा , ना जाने कितनी बार जेल गई , कितनी यातनाएँ सही , दक्षिण अफ्रीका में "बा" जब तीन महीनो के बाद जेल से छूटीं तो उनका शरीर ठठरी मात्र रह गया था, चम्पारण में जब उसकी झोपड़ी जला दी गई , तो खुद पूरी रात जागकर घास का झोंपड़ा खड़ा करने में लगी रही , सत्याग्रह के दौरान कई बार नजरबंद रही , "बा" प्रायः उपवास पर रहती , एक समय खाया करती , अफसोस आजादी ना देख पाई , आज मिलेगी वो , तो बताऊँगा उसे , उसका भारत अब आजाद हो गया है । 


"बा" को बेटी ना होने की कमी सदा खलती रही , पर खुशी थी कि हमारे चार पुत्र थे , हरिलाल , मणिलाल , रामदास एवं देवदास । मुझे आज भी गर्व है कि मेरे चारों बेटों ने ना अंग्रेजों से पदवी ली , ना पद , ना आजाद भारत में कोई सरकारी नौकरी ली , ना ही राजनीति में आए , ना माइंस पट्टा हासिल किया , ना चाय के बगान खरीदे । 


"पहला बेटा हरिलाल" - 


मुझे याद है हरिलाल को ब्रिटेन जाकर पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप का ऑफर दिया गया , किन्तु मैंने ही यह कह कर मना कर दिया कि गांधी के लड़के की जगह किसी ज़रूरतमंद को यह सुविधा मिलनी चाहिए । हरिलाल नाराज भी हुआ था , इसके बावजूद यदि आज कल के कुछ लोग मेरे आदर्शों पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं , मुझे दुःख होता है । मुझे तब दुःख नहीं हुआ जब गोड़से ने गोली चलाई औऱ मैं मारा गया , मुझे दुःख तब होता है जब नासमझ लोग गोड़से को आदर्श बना कर पेश करते हैं । 


हरिलाल का पुत्र कांतिलाल डॉक्टर था , उसके बेटे यानि मेरे पड़पोते डॉ. शांति गांधी की पहचान एक कुशल हार्ट सर्जन के तौर पर अमेरिका के टोपीका शहर में है , 70 की उम्र में शांति रिटायर्ड हुआ , उसने देखा कि अमेरिका के कई राज्यों की तरह कैनसस में भी नस्ली भेदभाव का पुराना इतिहास रहा है , तब उसने वहाँ सामाजिक समरसता पर कार्य प्रारम्भ किया औऱ वर्ष 2012 में वहाँ की प्रतिनिधि सभा में निर्वाचित हुआ । वो अमेरिका गया मेरे मरने के 19 साल बाद 1967 में , सो यह कलंक भी मुझपर नहीं कि मेरे पड़पोते की पैरवी मैंने की हो । 


कांतिलाल सरस्वती बेन का दूसरा बेटा प्रदीप चार्टड एकाउंटेंट है , वो भी अमेरिका में ही रहता है । 


"दूसरा बेटा मणिलाल" -


मणिलाल का जीवन साऊथ अफ्रीका में ही बीता , वहाँ रहकर भी भारत उससे नहीं छूटा , उसने मेरे द्वारा प्रारम्भ किए गए "इंडियन ओपिनयन पत्र " को आगे बढ़ाया , इंग्लिश और गुजराती में छपने वाले साप्ताहिक का सम्पादन मणिलाल जीवन के अन्तिम समय तक करता रहा । 


मणिलाल का पुत्र अरुण भी अपने पिता की तरह पत्रकारिता में आया , उसने टाईम्स ऑफ इण्डिया में काम किया । 


मणिलाल की बेटी सीता पेशे से नर्स थी , वहीं ईला दक्षिण अफ्रीका में पीस एक्टिविस्ट । 


"तीसरा बेटा रामदास " -


रामदास मेंरा सबसे प्रिय था , उससे भी ज्यादा प्रिय था उसका बेटा कनु , यदि आप 1930 की ऐतिहासिक "नमक सत्याग्रह" में दांडी से निकाली गई यात्रा की तस्वीरें देखेंगे तो मेरी लाठी पकड़कर जो बच्चा मेरे आगे आगे चल रहा है वही था कनु , मेरा पोता कनु , जो आगे चलकर वैज्ञानिक बना , अमेरिका के नासा में कार्य करता रहा , अच्छा लगा था मुझे जब अपने बुढ़ापे में कनु भारत आ गया , आलीशान वीआइपी जीवन जीने नहीं , बल्कि वृद्धाश्रम में रहने , उसकी पत्नी यानि मेरी पतोहू शिवालक्ष्मी भी प्रोफेसर थी । आजकल तो लोग मंत्री या सांसद के साथ फोटो खिंचवा कर उसे भी भुना लेते हैं , मेरा कनु मेरे साथ की तस्वीरें ना भुना सका , जबकि खुद एक अच्छा फोटोग्राफर था , क्योकि वो गाँधी का पोता था । फिर भी आजकल के कुछ लोग सोशल मीडिया में मेरे हत्यारे गोड़से को सही औऱ मुझे गलत साबित करने में लगे रहते हैं । 


रामदास की बेटी सुमित्रा आई ए एस अधिकारी रही , उसका विवाह आई आई एम के प्रोफेसर गजानंद कुलकर्णी के साथ हुआ । 


"चौथा बेटा देवदास" 


देवदास ने देश के पत्रकार जगत में ख्याति अर्जित की , वो भी सरस्वती पुत्र ही रहा , हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक के रूप में उसने अपनी सेवाएँ दी , उसका विवाह स्वाधीनता सेनानी सी.राजगोपालाचारी की पुत्री लक्ष्मी से हुआ था । 


देवदास के बेटे राजमोहन की बेटी सुप्रिया ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी ली, आजकल वह पेनसेलविनिया यूनिवर्सिटी में पढ़ा रही है ।


देवदास का दूसरा बेटा गोपाल आई ए एस बना , इसने कई भाषाओं में स्तरीय लेखन किया , उसकी चर्चित पुस्तकें हैं ‘गांधी एंड साउथ अफ्रीका’, ‘नेहरू एंड श्रीलंका,’ तथा ‘गांधी इज गोन’। उसने विक्रम सेठ के उपन्यास ‘सूटेबल ब्याय’ का हिन्दी में ‘अच्छा लड़का’ नाम से अनुवाद किया। गोपाल पश्चिम बंगाल का राज्यपाल रहा साथ ही दक्षिण अफ्रीका और श्रीलंका में भारत का उच्चायुक्त भी । गोपाल 1945 में जन्मा , यानि इसकी तरक्की में मेरी कोई पैरवी नहीं थी । वैसे भी पैरवी से खेल संगठनो या सरकारी संगठनो में नौकरी दिलवाई जा सकती है , लोकसभा का टिकट दिलवाया जा सकता है , पैरवी के बल पर आप आई ए एस नहीं बन सकते । 


देवदास का सबसे छोटा बेटा रामचंद्र गांधी भारतीय दर्शन का चोटी का विद्वान रहा , उसे आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने डॉक्टरेट की उपाधी दी । 


" महात्मा "


अंग्रेज मुझे मिस्टर गाँधी कह कर सम्बोधित किया करते थे , लेकिन 12 अप्रेल 1919 को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने मुझे एक खत लिखा , जिसमें मुझे "महात्मा" कह कर सम्बोधित किया , इसके पहले भी एक बार हरिद्वार के निकट कनखल स्थित गुरुकुल कांगड़ी में 8 अप्रैल, 1915 को स्वामी श्रद्धानंद ने मुझे "महात्मा" कहा था , मैं डरने लगा , मुझ्मे महात्मा जैसे कोई गुण नहीं थे , हाँ इतना दावे के साथ कह सकता हूँ कि मुझमे अवगुण भी नहीं बचे थे । मुझे तब बहुत प्रसन्नता नहीं हुई जब मुझे गहराई से जानने वालों ने "महात्मा" कहा , पर अब मन दुःखी होता है जब गोड़से को ना जानने वाले लोग भी उसे महान बताने की और मेरी हत्या को सही ठहराने की मूर्खतापूर्ण दलीलें देते हैं । 


राष्ट्रपिता बापू 


चंपारण का एक किसान राजकुमार शुक्ला मुझे बापू कहकर पुकारता था , फिर सुभाष चंद्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को रेडियो रंगून से मुझे 'राष्ट्रपिता' कहकर संबोधित किया था, मेरी हत्या के बाद प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रेडियो पर देश को संबोधित करते हुए कहा था "राष्ट्रपिता अब नहीं रहे" । कई बार कई विषयों पर तुम्हारे पिता से तुम्हारे विचार मेल नहीं खाये होगें , चाहे व्यापार का विषय हो , या पूँजी बँटवारे का , या लव मैरिज का , या नौकरी का , तुम्हें लगा होगा पिताजी की सोच पुरानी है , तो क्या तुम अपने पिता की हत्या कर दोगे ? नहीं ना ! किन्तु कृतघ्न गोड़से ने क्या किया , मार दिया मुझे । 


"रावण और गोड़से"


मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में स्थित नटेरन तहसील के रावणग्राम में रावण की पूजा की जाती है, यहां रावण की करीब 10 फीट लंबी पाषाण प्रतिमा लेटी हुई मुद्रा में विराजित है , थोड़ी देर के लिए ये मान लो कि रावण को अपना आराध्य मानने वाले समुदाय का कोई व्यक्ति बड़ा नेता बन जाए या बॉलीवुड का हीरो बन जाए , और तुम्हें बताए कि राम की क्या क्या गलतियाँ थी और रावण में क्या क्या अच्छाईयाँ थी , तो क्या उसके कहने पर तुम अपने आराध्य श्रीराम को भूल जाओगे और रावण को सही साबित करने लगोगे ? नहीं ना ! जिस प्रकार यह सत्य है कि रावण माता सीता का अपहरणकर्ता था उसी प्रकार यह भी सत्य है कि गोड़से भी 79 वर्षीय मुझ बुड्डे का हत्यारा था । 


"हत्या का कारण"


8 नवम्बर 1948, दिल्ली के लाल क़िला । मेरी हत्या की सुनवाई चल रही थी , लाल क़िले के भीतर ही विशेष अदालत बनाई गई थी, जज थे आत्माचरण । गोडसे ने 93 पन्ने का अपना बयान 5 घंटो में पढ़ा । 


गोडसे ने 10:15 बजे से बयान पढ़ना शुरू किया, पहले हिस्से में साज़िश और उससे जुड़ी चीज़ें, दूसरे हिस्से में मेरी शुरुआती राजनीति, तीसरा हिस्से में मेरी राजनीति के आख़िरी चरण, चौथा हिस्सा भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में मेरी भूमिका , पाँचवा हिस्सा आज़ादी के सपनों का बिखरना और आख़िरी हिस्सा 'राष्ट्र विरोधी तुष्टीकरण' की नीति थी । 


गोड़से जिसे तुष्टीकरण कहता था , मैं उसे मानवता समझता हूँ , मुझे वादाख़िलाफ़ी कदापि बर्दाश्त नही थी , चाहे दोस्त से हो या दुश्मन से । 


विभाजन के बाद दोनों देशों में संधि हुई थी कि भारत पाकिस्तान को बिना शर्त के 75 करोड़ रुपए देगा, इनमें से पाकिस्तान को 20 करोड़ रुपए मिल चुके थे और 55 करोड़ बकाया था, आजाद भारत की पहली कैबिनेट का फ़ैसला था कि जब तक दोनों देशों के बीच विभाजन का मसला सुलझ नहीं जाता है तब तक भारत पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए नहीं देगा । हालाँकि पाकिस्तान ने ये पैसे माँगना शुरू कर दिया था और भारत वादाख़िलाफ़ी नहीं कर सकता था । मैंने कहा कि जो वादा किया है उससे मुकरा नहीं जा सकता, अगर ऐसा होता तो द्विपक्षीय संधि का उल्लंघन होता । 


हाँ मैं भूख हड़ताल पर बैठा था , किन्तु मेरी भूख हड़ताल का मुख्य मक़सद पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिलवाना नहीं था बल्कि सांप्रदायिक हिंसा को रोकना और सांप्रदायिक सद्भावना क़ायम करना था, काश यह बात उस नासमझ गोड़से को समझ आ पाती । 


चलो माना कि वैचारिक मतभेद थे , मैं ही गलत रहा होऊंगा , लेकिन गोड़से अपने बयान में जब खुद स्वीकार करता है कि भारत के लिए, आजादी के लिए, मेरा क्या योगदान था , तो क्या वैसे में किसी एक वैचारिक अंतर होने से , हत्या जायज थी ? 


मन की बात 


मेरा मानना था कि अगर एक व्यक्ति समाज सेवा में कार्यरत है तो उसे साधारण जीवन जीना चाहिए , सादगी, ब्रह्मचर्य, अनावश्यक खर्च से बचना , साधारण शाकाहारी भोजन और अपने वस्त्र स्वयं धोना ये मेरे निजी जीवन के पहलू थे , मैं सप्ताह में एक दिन मौन धारण करता था , मेरा मानना था कि बोलने के परहेज से आतंरिक शान्ति मिलती है। 


मैंने भगवद् गीता की व्याख्या गुजराती में की , महादेव देसाई ने गुजराती पाण्डुलिपि का अतिरिक्त भूमिका तथा विवरण के साथ अंग्रेजी में अनुवाद किया था , मेरे द्वारा लिखे गए प्राक्कथन के साथ इसका प्रकाशन 1946 में हुआ था । मुझे लिखने पढ़ने की आदत थी , मैंने कई पत्रों का संपादन किया - हरिजन, इंडियन ओपिनियन, यंग इंडिया , नवजीवन आदि । मेरी कई पुस्तकें प्रकाशित हुई - हिंद स्वराज, दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास, सत्य के प्रयोग (आत्मकथा), गीता पदार्थ कोश । 


खैर ! बच्चों की पुस्तकों में मेरी चर्चा हो , या भारत के करोड़ों घरों में मेरी तस्वीर टंगी हो , या हजारो चौराहों पर मेरी मूर्तियाँ लगी हो , या मेरे नाम से सरकारी योजनाएँ चल रही हो , या पूरे विश्व में मेरा जन्मदिन 2 अक्टूबर "अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस" के रूप में मनाया जाता हो , या मैं आपके नोटों पर छपा होऊँ , या मेरे नाम पर अंतर्राष्ट्रीय गाँधी शांति पुरस्कार दिया जाता रहे , या मेरे नाम पर कुछ और स्मारक बना दो , या मुझ पर बनी फिल्मे बॉक्स आफिस पर हिट होती रहें , मुझे कोई प्रसन्नता नहीं होती , मुझे तो यह बात कचोटती रहती है कि मेरे अपने देश में एक भी व्यक्ति ऐसा क्यों है जो मेरे हत्यारे गोड़से के पक्ष में बात करता है । 


अपराधी गोड़से 


हर अपराध की अपनी एक वजह होती है और हर अपराधी की अपनी दलीलें । चोरी के पीछे भूखा पेट होता है , बलात्कार के पीछे आकर्षण या वासना , मारपीट के पीछे आवेश होता है , गालीगलौज के पीछे धैर्य में कमी , चाहे जो हो , अपराध अपराध होता है , अपराधी अपराधी होता है , गोड़से अपराधी था , मेरा अपराधी , गाँधी का अपराधी , आजाद भारत का पहला अपराधी । 



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