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Santosh Kumar

Tragedy


4.6  

Santosh Kumar

Tragedy


एक कुत्ते की आत्मकथा

एक कुत्ते की आत्मकथा

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मैं पुलिस का वफादार खोजी कुत्ता रहा हूँ। आज मेरी सेवानिवृत्ति हो रही है । मुझे चिन्ता सता रही है कि सेवानिवृत्ति के बाद मैं जाऊँगा कहाँ? रहूँगा कहाँ? क्या खाऊँगा? समझ में नहीं आ रहा है।  

अब मैं पुलिस विभाग के काम का नहीं रहा हूँ। जिस मुहल्ले में जाऊँगा, उस मुहल्ले के कुत्ते मुझे रहने नहीं देंगे। मारेंगे बुरी तरह। बिना बात अपने बिरादर भाई से लड़ना उनका जन्मजात स्वभाव है। वे किसी की मजबूरी को नहीं समझते हैं। बस, मुहल्ले में दादागिरी करनी है उन्हें।


"नहीं बन्धु, ऐसी बात नहीं है। अपनी कूकर विरादरी में भी जाग्रति आई है। सहयोग की भावना बढ़ी है। जहाँ भी जाओगे स्वागत होगा तुम्हारा। आज तो हर कोई अपनी विरादरी ढूँढ रहा है। देश के नेताओं तक में ये बुद्धि जाग्रति हुई है। पहले अपनी जाति, बाद में अपना देश ।" दूसरे कुत्ते ने मुझे सांत्वना दी।


मैं बोला, 'मित्र, भले ही वे मुझे अपने मुहल्ले में रखने को तैयार हो जायें, पर रैगिंग जरूर करेंगे। रैगिंग से मुझे बहुत डर लगता है। कोई पूँछ पकड़ेगा तो कोई टाँग खींचेगा; कोई दाँतों से कचोटेगा तो कोई कान उमेंठेगा। बाप रे बाप! बड़ा बेहाल कर देते हैं रैगिंग में। इंसान ने भी रैगिंग का खेल हमारी विरादरी से ही सीखा है। लेकिन बहुत बेदर्द और अमानुस अर्थात पशुवत!" मैं सिहरने लगा।.... तभी हवलदार आता दिखाई दिया। हम चुप हो गए। हवलदार चला गया। बातों का क्रम फिर चल पड़ा।


मैंने कहा, "मेरे दो भाई और हैं पुलिस विभाग में। हम तीनों ही आज सेवानिवृत होंगे। कोई आदमी आश्चर्य से कह सकता है, एक ही दिन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? हमारी विरादरी में पाँच-पाँच, छ:-छ: जुड़वां बच्चे पैदा होने का वरदान मिला हुआ है। फिर परिवार नियोजन का भी भय नहीं है। पालन-पोषण की जिम्मेदारी माँ-बाप निभाते नहीं हैं। इसलिए जो भाग्यशाली होते हैं, वे मनुष्य द्वारा पाल लिए जाते हैं और शेष करते हैं आबारागर्दी और मुहल्लों में दादागिरी। सभी उनसे डरते हैं। वे अपने क्षेत्र के नेता बन जाते हैं और फिर लोकतंत्र के रक्षक कहलाते हैं देश के नेताओं की तरह।


मेरे साथी ने कहा, “मनुष्य को बुरा लगेगा। उनके बारे में ऐसा मत कहो मित्र। मैंने कहा, “मनुष्य हमारे जैसे गुण गृहण कर रहा है तब बुरा क्यों मानेगा? किसी को थोड़ा-सा लालच दिया नहीं कि उसी के गीत गाता है अर्थात कुत्ते की तरह दुम हिलाता फिरता है। इतना ही नहीं कुछ मनुष्य भी कुत्ते की मौत मरने लगे हैं। आज बहुत से मनुष्य ऐसे मिल जायेंगे, जो हमारे जैसे वफादार बनकर, हमारी जैसी मौत मारे जाते हैं, लेकिन अन्त तक हमारी तरह दुम हिलाना नहीं छोड़ते।"


मुझे लगा, मैं कुछ ज्यादा ही बोल रहा हूँ। मैं चुप हो गया। कार्यक्रम का समय हो गया है। चलता हूँ उधर ही, जिधर मेरी विदाई का समारोह होना है। 

  पूरी परंपरा के साथ मेरा विदाई समारोह हुआ । सभी ने मेरे गले में मालाएंँ पहनायीं।


    

आलीशान कोठी के सामने बहुत बड़ा लॉन; लॉन में हरी मखमली घास; चारों ओर रंग-बिरंगे फूलों के पौधे; गेट पर भारी भरकम दरवान- शायद खैनी रगड़ रहा है। जीप गेट के पास रुकी। हवलदार उतर कर दरबान के निकट गया। कुछ बातें कीं और वापिस चला आया। मैंने देखा, दरवान अपने मालिक को बुला लाया है। उसे देखते ही हवलदार ने नमस्कार किया। कोठी का मालिक मुझे देखकर बोला, “इसे आज ही ले आए? अच्छा किया। बाँध दो उधर ।" अँगुली से संकेत कर स्थान बताया और अन्दर चला गया। हवलदार भी मुझे बाँधकर वापिस जाने लगा। उसने एक बार मेरी ओर देखा, शायद कह रहा था- "सौभाग्यशाली हो, अच्छे मालिक के पास आ गए। वफादारी करते रहे तो सुख पाओगे; नहीं तो आज से ही सड़कों पर मारे-मारे घूमते। रोटी के लाले पड़े रहते।"


मैंने हवलदार को जाते हुए देखा। मेरे आँसू छलछला आए। उसके साथ मैंने आठ वर्ष काटे हैं। अब बिछुड़ रहा हूँ। पुलिस विभाग से रिश्ता समाप्त हो रहा है।


मेरे नये मालिक का नाम गुलशनराय है। उम्र लगभग 40 वर्ष रंग गोरा एवं हृष्ट-पुष्ट शरीर। कोई बड़ा बिजनेस है इनका। कोठी में कई नौकर हैं। नौकर भी कुछ खास हैं, कुछ आम । खासों का काम कुछ ज्यादा ही खास होता है। किसी को बताया नहीं जाता। फिर मैं तुम्हें कैसे बता सकता हूँ?


यहाँ पर दो कुत्ते पहले से ही हैं, किन्तु मेरे कुल और नस्ल के नहीं हैं। एक ‘पामेलियन' है और दूसरा- 'डाबर मैन'। वे बहुत दिनों से साथ-साथ हैं, इसलिए उन दोनों में दोस्ती है। वैसे कुत्तों में दोस्ती होती नहीं है। राजनैतिक नेताओं की तरह दल बदलने में पलभर भी नहीं लगाते। पर मैं नया सदस्य था और दूसरी नस्ल का 'अल्सेसियन'। इसलिए उन्हें फूटी आँख भी नहीं भाया। मैंने सामंजस्य की बहुत चेष्टा की कि प्रेम से आपके साथ रहूँगा, लेकिन उन्होंने अपनी औकात न त्यागी। एक दिन मेरी मरम्मत कर दी। तब मैंने राजनैतिक खेल खेला। एक को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। अब बहुमत मेरा था। लोकतंत्र में बहुमत का खेल है। कई बार संसद और विधानसभाओं में ये खेल खेला जाता है।


कोठी में लोगों का आना-जाना बहुत रहता है। कई अपराधी किस्म के लोग भी आते हैं। मैंने पहचाना भी कईयों को। मुझे लगा कि मेरा मालिक भी किसी काले धन्धे से जुड़ा है।


एक दिन आठ-दस सुन्दर लड़कियाँ कोठी पर आईं। सब बेरोजगार हैं। नौकरी की तलाश में हैं। यहाँ पर किसी नौकरी के लिए इन्टरव्यू होना है। इन्टरव्यू लेने वालों में स्वयं गुलशनराय और उनके खासम-खास दो व्यक्ति हैं। सभी को अन्दर बुलाकर बताया- नौकरी विदेश में है। सभी को आकर्षक वेतन और रहने के लिए मुफ्त आवास की पेशकश की गई। आशा से अधिक वेतन सुनकर लड़कियाँ गद्गद् हो गईं। सबने नौकारी का एडवांस लेकर एग्रीमेन्ट पर हस्ताक्षर कर दिए और अपने-अपने घर लौट गई।


निश्चित तिथि पर आज सभी लड़कियाँ फिर आ गई। उन्हें एक बस में बिठा कर ले जाया गया। पर कहाँ? हवाई अड्डे?

..........नहीं, किसी दूसरे शहर में। एक और आलीशान कोठी में। वहीं रखा गया। विदेश जाने की तिथि तक यहीं रुकने के लिए कहा गया। वे इंतजार करती रहीं, पर वह सौभाग्यशाली तिथि नहीं आई। उनके साथ धोखा हुआ है। वे इस गिरोह के चंगुल में बुरी तरह फँस गईं हैं। इस गिरोह का सरगना और कोई नहीं, मेरा ही मालिक है। गिरोह का कार्य अश्लील फिल्में तैयार करना और उन्हें विदेशों में भेजकर पैसा बटोरना है।


पता नहीं कैसे? एक लड़की, नाम- 'नम्रता', उनके चंगुल से भाग निकली। शहर लौट आई। सारी दास्तान पुलिस को सुना दी। बात अखबारों के माध्यम से बाहर आई। पुलिस ने उस अड्डे पर छापा मारा। सुना है लड़कियाँ बरामद हुईं, पर पुलिस रिकार्ड में नहीं। सरकारी कागजों की चमक ने रिपोर्ट की इबारत ही बदल दी। मेरा मालिक बच निकला।


उधर शहर की समाज सेविका श्रीमती इलादेवी और महिला संरक्षण मंच ने पुलिस और गुलशनराय के खिलाफ झण्डा उठा लिया। बाजार बंद कराये, नारे लगाये, फिर धरने पर बैठीं। वह प्रशासन के लिए सिरदर्द बन गईं। न्यायिक जांच बिठा दी गई। तब इलादेवी ने धरना समाप्त तो कर दिया, किन्तु जांच कार्यवाही पर निगरानी रखी।


सरकारी काम, सरकारी गति से बढ़ा। महिनों बीत गए, किन्तु जांच रिपोर्ट नहीं आई। घटना पर धूल पड़ने लगी। लोग भूल गए। समाज की मानसिकता ऐसी ही हो गई है। घटना भूलकर सभी अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं। यदि न भुलाएँ तो लोगों का हाजमा खराब हो जाता है।


रोज की भाँति सवेरा हुआ, नया दैनिक समाचार पत्र आया, मुख्य शीर्षक था- "शहर की समाज सेविका इलादेवी की निर्मम हत्या। निर्वसन-शव जंगल से बरामद।"


समाचार पढ़कर शहर में शोक छा गया। सभी बाजार बन्द हो गए।


हत्यारों को पकड़ने की मॉग ने जोर पकड़ा। पुलिस ने अपना पिंड छुड़ाने के लिए कहीं से एक को पकड़ा और चालान कर दिया। किसी निर्दोष के मथ्थे मढ़ दिया हत्या का दोष। जनता शान्त हो गई। दूसरे दिन से सब अपने-अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त हो गये।


चार दिन बाद शमशेरा और भूरा आए । गुलशनराय ने उन्हें अन्दर बुलाया। शमशेरा बोला, "मालिक, हो गया न रास्ता साफ, साँप भी मर गया और लाठी भी न टूटी।"


मालिक बोला, 'हाँ शमशेरा, साली तीस मार खाँ समझती थी अपने आपको। पता नहीं क्यों समझती थी? मांस के टुकड़े भिजवाये, खाये ही नहीं साली ने- कुतिया कहीं की।.... और हँसते-हँसते जाम टकराने लगे।


श्रीमान जी, मेरा मन अपार दुःख से व्यथित हो गया। अपने मालिक से घृणा हो गई। मेरे मन ने मुझे धिक्कारते हुए कहा- "तेरा काम अपराधी पकड़ने का है और तू अपराधियों की रक्षा कर रहा है?"


मन ने सच ही कहा। अब मैं एक दिन भी यहाँ नहीं रुकूँगा। चला जाऊँगा वहाँ, जहाँ शराफत हो, इंसानियत हो और नैतिकता हो, पर कहाँ मिलेंगी ये सभी? मन ने फिर कहा -"शायद गाँव में, जहाँ भोले-भाले किसान परिश्रम करके खाते हैं। उनमें अपनत्व होता है। बन्धुत्व होता है। दूसरों के लिए सम्मान होता है और होती है- मानवता।"


‌तन जंजीर से बंधा है और स्वच्छंद मन में भरी है घृणा। इसलिए मैं अब अपने मालिक का नमक नहीं खाना चाहता हूँ। वैसे आज का मनुष्य नमक खाकर भी नमक हराम बन जाता है। पर मैं न नमक-हराम बनना चाहता हूँ और न वफादार।

‌एक दिन अवसर मिल ही गया। मैं भाग निकला। शहर के विरादर भाई मेरे पीछे पड़ गए। लगे पीछा करने। मैंने पूरी ताकत लगा दी, बहुत तेज दौड़ने लगा। भय से गति और बढ़ गई। भागते-भागते शहर के बाहर आ गया। मैंने एक बार पीछे मुड़कर देखा, वे अब भी मेरा पीछा कर रहे हैं। संख्या भी बढ़ गई है। जो भी रास्ते में मिला, साथ हो लिया। मेरी स्थिति उस फिल्मी नायिका की तरह हो गई, जिसका पीछा खलनायक के गुण्डे करते हैं। नायिका अपनी आबरू बचाने के लिए दौड़ती है और मैं अपनी जान बचाने के लिए दौड़ रहा था। नायिका की सहायता के लिए फिल्म का नायक अवतरित हो जाता है, लेकिन मेरे लिए कोई नहीं आया, पर गाँव की सीमा आ गई। शहर की सीमा समाप्त हो गई। शहर के कुत्ते अपनी सीमा पर रुक गए। मैंने मुड़कर देखा, वे लौट रहे हैं। दिल को राहत मिल गई। मैं हाँफ रहा था। सर्दी के दिनों में भी पसीना-पसीना हो रहा था। सुस्ताने के लिए एक पेड़ के नीचे लेट गया।


एक किसान हल खोलकर लाया। एक तरफ बैल बाँध दिए और पानी से हाथ धोए। फिर पेड़ पर लटका खाना उतार कर खाने बैठ गया। खाना खाते हुए उसकी दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी। मुझे ध्यान से देखा। मैं उसके लिए अजनबी था। वह गाँव के अधिकांश कुत्तों को पहचानता है। सब देशी नस्ल के हैं। मैं उनसे भिन्न हूँ- ऊँचा, लम्बा, छरहरा और भूरे रंग का। पता नहीं क्या सूझी, उसने मेरी ओर रोटी का एक टुकड़ा फेंकाखाने के लिए। मुझे बुरा लगा। मैंने कभी इस तरह खाना नहीं खाया है। पेट में चूहे कूद रहे थे फिर भी लेटा रहा। वह खाना खा चुका, तब मेरे निकट आया। मुझे पुचकारा। रोटी के टुकड़े को पास किया। मुझे अच्छा लगा। प्रेम और अपनत्व दिखाई दिया। मैंने वह टुकड़ा खा लिया। प्यार के उस एक टुकड़े से भले ही मेरे उदर की भूख नहीं मिटी, पर मुझे वह किसान भला लगा। मैंने अपनी दुम हिलाई, उसने मेरे शरीर पर हाथ फिराया। मैं भावुक हो गया। ....... और फिर किसान का स्वामिभक्त बन गया।


मैं अपने स्वामी के घर रहने लगा। गाँव के कुत्ते इकट्ठे होकर आते शायद रैगिंग करने। पर मेरी सुरक्षा कड़ी थी। इसलिए वे दूर खड़े होकर मुझे घूरते रहते। मन में क्रोध भरा होता। गुस्से में पैरों से मिट्टी खोद-खोद कर ऐसा दर्शाते जैसे कोई बड़ा पहलवान कह रहा हो- 'मर्द का बच्चा है तो इधर आ।


कभी भी, मैं न उधर गया और न वे इधर आए। न वे जान-पहचान कर सके और न मैंने करनी चाही; मैं प्रसन्न था। अब स्वामी के घर की सुरक्षा का भार मुझ पर आ गया था।


रात के 10 बजे होंगे। अधिकांश गाँववाले सो गए थे, किन्तु मैं जाग रहा था। तभी मैंने देखा, गाँव के एक आदमी ने मेरी पड़ौसिन का दरवाजा खटखटाया। साथ में पुलिस की वर्दी में एक दरोगा, शराब के नशे में धुत; पैर लड़खड़ा रहे थे। पड़ौसिन विधवा थी। परिवार में उसकी एक बेटी और थी- सुन्दर और जवान।


    औरत ने दरवाजा खोला, सामने गाँव का हरिया खड़ा है। उसे देखते ही भांप गई, जरूर दाल में काला है। हरिया चरित्रहीन व्यक्ति है। गाँव की बहू-बेटियों पर बुरी नजर रखता है। कई बार पिटा है और जेल की हवा भी खाई है। अब तो बेहया हो गया है। पुलिस को भी खिला-पिला कर अपने पक्ष में कर लेता है। गाँव के लोग अब उससे डरने लगे हैं। कोई उसके मुँह नहीं लगता है।


वे दोनों घर के अन्दर चले गए। आँगन में चारपाई बिछी थी। दरोगा उस पर बैठ गया। फिर बोला, "क्यों री धनियाँ, तू अपनी बेटी से धन्धा करवाती है? गाँव में ही चकला चलाती है?"


धनियाँ कांप गई। बोली, “दरोगा जी, ये आप क्या कह रहे हैं? मैं अपनी बेटी से धन्धा करवाऊँगी? राम, राम, राम ऽ ऽ ऽ ।"


"अच्छा, बेटी से नहीं करवाती, तब तू खुद करती होगी।" नशे में धुत दरोगा ने कहा।


"नहीं दरोगा जी, मैं ऐसा बुरा काम क्यों करूँगी? पाप की कमाई से पेट भरूँगी? अभी तो मेरे हाथ-पैरों में दम है। मेहनत करके खाती हूँ।" धनियाँ ने कांपते हुए कहा।


"हाँ, अभी तो तुझ पर भी जवानी है। तू भी चलती होगी; पर हमें तो शिकायत मिली है तेरी लड़की की ही। इसलिए उसे ले जाकर थाने में पूछताछ करनी है। कहाँ है वह? निकाल उसे।" दरोगा ने गुस्सा दिखाकर उसे डराना चाहा।


"नहीं दरोगा जी, मेरी लड़की गंगा समान पवित्र है। वह ऐसा-वैसा काम नहीं करती। उसे आप नहीं ले जा सकते।" धनियाँ एकमात्र कोठरी के दरवाजे पर खड़ी हो गई।


दरोगा बोला, "हरिया, हटा इसे और अन्दर से ला लौंडिया को खींचकर ; ले चल थाने।"


हरिया ने धनियाँ में धक्का दिया, वह दूर जा गिरी। कोठरी में घुसकर इधर-उधर देखा, रधिया न मिली। बाहर आ गया। घर का कोना-कोना छान मारा, वह न मिली। धनियाँ का कलेजा धक-धक कर रहा है। मन ही मन भगवान को पुकार रही है। हे भगवान! मेरी इज्जत बचाले। मेरी बेटी की रक्षा कर।


उस वक्त मुझे लगा आदमी भी कुत्ता बन जाता है। कुत्तों की तरह माँ-बहिन का रिस्ता भूल जाता है। उस वक्त रधिया कहीं छुप गई। पर कहाँ? किसी को पता नहीं। हरिया को घर में आता देख, वह खतरा भांप गई थी। इसलिए मौका पाकर वह घर से निकल आई। वह मेरे पास है मालिक की खाली पड़ी चारपाई के नीचे। हरिया इधर आता तो मैं उसकी बोटी-बोटी नोंच लेता। हरिया को देख, मैंने भी भोंकना आरम्भ कर दिया। इसलिए वह मेरी ओर न आया, किन्तु मेरी आवाज सुनकर गाँव के कुत्ते आ गए। उन्होंने हरिया को पहचाना और वापिस चले गए-आवारा समझकर।


हरिया ने बहुत ढूँढा पर रधिया न मिली। मोहल्ले के कुछ लोग भी जाग गए हैं। उन्होंने झाँक कर देखा- हरिया है। शायद रधिया के पीछे पड़ा है, पर रधिया की सहायता को कोई नहीं आया। छुप-छुप कर देखते रहे- नपुंसक बनकर।


हताश हो गए हैं वे दोनों, पर वासना की आग ज्यों की त्यों है। क्या करते? इसलिए धनियाँ को ही ले गए। जो दरोगा रक्षक था वही भक्षक बन गया।


सवेरा हुआ, बुधिया बापिस आ गई। आँखें रो-रोकर सूज गई हैं, भीतर से टूट गई है, पर तसल्ली है, अपनी कुर्बानी देकर बेटी की रक्षा हो गई, लेकिन कब तक के लिए? हरिया अभी मरा नहीं है, वह फिर आएगा। हो सकता है अगली बार रधिया उसके चंगुल में फँस जाय। इसलिए माँ-बेटी गाँव छोड़कर चली गईं। कहाँ गईं? किसी को पता नहीं।


मैं समझ गया, गाँव का वातावरण भी शहर जैसा ही है। शहर और गाँव के लोगों में अन्तर है तो सिर्फ इतना कि शहर के लोग आन्दोलन करते हैं, न्याय माँगते हैं। गाँव के लोग-भेड़ों का झुंड है। भेड़िया एक-एक कर भेड़ों को अपनी गिरफ्त में ले रहा है, भेड़ों का झुंड चुप है। झुंड की हर भेड़ सोचती है मेरा जीवन सुरक्षित है। और इसी मूर्खता में सब की सब प्राण गँवा देती हैं। मैं समझ गया, गाँव के लोगों में सामुदायिक भावना और अपनत्व का अभाव हो गया है। हरिया के वेश में भेड़िए निर्भय होकर, अपना शिकार दबोच रहे हैं। हर रोज किसी न किसी धनियाँ या रधिया के चरित्र की हत्या कर देते हैं।


मेरे मन ने एक बार फिर कहा, "तू अपनी सोच को बदल दे। गाँव और शहर कहीं भी चला जा, भेड़ियों की कमी नहीं है। अब तो ये सुरक्षित भी हैं। क्योंकि कुछ भेड़िए इनकी रक्षा करने सरकार में भी शामिल हो गए हैं।"

  


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