दो रोटी
दो रोटी
"आलू,, भिंड्डी, प्याज़ टमाटर
लाल मीठा मेलन वाटर
एकदम ताज़ा सस्ती सब्जी "-सब्जी वाला जैसे ही आवाज़ लगाता वह दौड़ी दौड़ी दरवाजे पर आती और आवाज़ लगाती-"रुक जा अब्दुल ...सब्जी नहीं देगा क्या ? "
अब्दुल मुस्कराते हुए बोलता-"सलाम अम्मा...! अरे दिन की शुरुआत तो आपसे ही करनी है न ? "
देवकी हल्के से झिड़कती -"चल झूठे...! फिजूल मस्का मत लगा ! अच्छा बता आलू क्या भाव है, भिंडी कैसे दी...प्याज नया है न? और बता धंधा कैसा चल रहा है ? "
अब्दुल जानता था अम्मा को आज क्या और कितना लेना है ! सोमवार को सो ग्राम भिंडी, मंगलवार को दो आलू, बुधवार को थोड़ा सा पालक, गुरुवार को एक टिंडा, शुक्रवार को लौकी, शनिवार को ककड़ी और रविवार को एक प्याज मीर्च धनिया। फिर भी वह देवकी का मन रखने के लिये सारे भाव बताता और रटा रटाया जवाब -"आपकी दुआ से रोटी मिल रही है अम्मा...! अकेली जान को कितना चाहिए ?"
देवकी पैसे देने का उपक्रम करती तो वह बोलता -"भला अपनी अम्मा से भी कोई पैसे लेता है ? "
पहले पहल तो झिझकते हुए अम्मा ने झोले से दो रोटी निकाली और स्नेह से बोली -"अब्दुल कल ये मेरी दो रोटी बच गई, मैं अकेली जान... किसको दूंगी... तू खा लेगा क्या..प्याज से खा ले ?"
दो रोटी का क्रम शुरु में कभी कभी चला फिर नियमित हो गया !
विचारों में डूबा अब्दुल भौचक्का सा ठेले को एक तरफ खड़ा कर सामने अर्थी पर लेटी अम्मा को देख रहा था। डबडबाई आंखों से अर्थी सजाते पड़ोसी से पूछा -" कब कैसे हो गया ?"
"पता नहीं शाम तक तो अच्छी भली थी...! रात को ही किसी वक्त...? "
अब्दुल ने ठेले से चार पांच भिंडी उठाई और अम्मा के चरणों की तरफ रखते हुए बोला --"आज सोमवार है भिंडी नहीं लोगी क्या...? मेरी दो रोटी कहाँ है अम्मा...बहुत भूख लगी है ?"-और फूट फूट कर रोने लगा।
