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Ritu asooja

Drama

3  

Ritu asooja

Drama

*दलदल*

*दलदल*

3 mins
290

घर में मन नहीं लग रहा था । सोचा चलो कहीं बाहर घूमकर आती हूं

मन की नीरसता दूर करने के लिए चल पड़ी घर से घर से थोड़ी दूर नदिया किनारे जाना ही बेहतर लगा ।

नदियां का शीतल निर्मल जल मन को शीतलता प्रदान कर रहा था

कितना शांत ,निर्मल निरंतर गतिमान स्वच्छ जल मन को प्रेरणा दे रहा था जीवन आगे बढते रहने का नाम है ,रुकने का नहीं ....

मैं खड़े होकर नदिया किनारे घूमने लगी ।

कई लोग वहां टहल रहे थे , मैं भी टहलने लगी ।

टहलते - ट हलते कई मित्र बन गए बस यूं ही बतियते हुए हम आगे की और बढते जा रहे थे बहुत अच्छा लग रहा था ।

मन एकदम शांत हो गया था मन की सारी चिंताएं मानों नदिया के ब हते जल ने धो डाली थीं अब मन में कोई सवाल नहीं था।

तभी एक स ह साथी बोला में तो यहां कई सालों से आ रहा हूँ ,यहां आकर मुझे बहुत अच्छा लगता है ।

दिन भर की थकान चिंता सब दूर हो जाती है एक नई ऊर्जा और उत्साह के साथ में अपना हर काम कर पाता हूं , परंतु आज तो मैं चलता हूं मुझे कुछ जरूरी काम है कल फिर मिलेंगे तुम चाहो तो अभी और घूम लो मैंने भी उससे हाथ मिलाकर कहा ठीक है मिलते हैं कल फिर ......

मैं अकेले चलते जा रही थी आगे की और थोड़ी कच्ची जगह थी फिर भी रुकने का मन नहीं हुआ चलना जारी रखा .....

अचानक मेरे पैर दलदल में घुसने लगे मैंने बहुत चाहा मै आगे बड़ने की पर पैर थे की आगे की और बड ही नहीं रहे थे ....

उल्टा पैर नीचे की और धस रहे थे में घबराई फिर चिल्लाई कोई बचाओ शायद में बहुत आगे निकल आयी थी आसपास कोई भी नजर नहीं आ रहा था, सोचा आज तो हो गया मेरा राम नाम सत्य अब तो पाताल लोक जाकर ही रहूंगी अब क्या होगा बहुत प्रयास कर रही थी बाहर निकलने का पर सब असफल था बस अब तो धरती पर अंत था मेरा सोच ही लिया था ,घर,परिवार मित्र सब ढूढते रह जाएंगे मुझे अब मैं नहीं मिलने वाली उन्हें ......

जीवन की अंतिम घड़ियों में परमात्मा से ही अपनी आखिरी इच्छाओं के पूरे कर देने की दुआ मांग रही थी .....

आखिर धीरे-धीरे मैं पाताल लोक की और खींच ही गई कुछ भी नहीं था ,पानी मिट्टी,और घोर अंधेरा परमात्मा से कहने लगी मुझे बहुत दर लग रहा है आप मेरे प्राण ही ले लो इससे अच्छा मैं यह सब नहीं देख सकती शायद नरक ऐसा ही होता होगा ।

मैं परमात्मा से मन ही मन प्रार्थना कर ही रही थी तो लगा उसने मेरी पुकार सुन ली , मैंने स्वयं को अपने पलंग पर लेटे हुए पाया ...

फिर समझ आया यह एक डरावना ख्वाब था ,रात में नदिया के घूमने जाने के बारे में सोच कर सोई थी ,मन में कई दुविधाएं थीं ...

जो इस बुरे ख्वाब के रूप में आकर ख़तम हो गईं ।

परंतु वास्तव में यह मेरी जिंदगी का सत्य और बहुत ही डरावना ख्वाब था ।



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