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Sonam Sharma

Inspirational Children

4.5  

Sonam Sharma

Inspirational Children

दीपक की रोशनी

दीपक की रोशनी

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शामलीपुर गाँव के आख़िरी छोर पर एक छोटी-सी झोपड़ी थी, जहाँ दीपक अपनी माँ के साथ रहता था। पिता का साया बचपन में ही उठ चुका था। माँ दूसरों के घरों में काम करके जैसे-तैसे घर चलाती थी। दीपक पढ़ने में तेज़ था, लेकिन हालात ऐसे थे कि कई बार स्कूल जाने से पहले उसे सोचना पड़ता—आज पेट भरेगा या किताब खुलेगी।

हर सुबह दीपक गाँव के सरकारी स्कूल की ओर निकलता, पुराने जूते और फटे बस्ते के साथ। कुछ बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते, पर वह चुप रहता। उसे पता था—शब्दों की लड़ाई से ज़्यादा ज़रूरी है अपने सपनों की रक्षा करना। स्कूल में उसकी सबसे बड़ी ताक़त थी—सीखने की जिद। जब शिक्षक सवाल पूछते, दीपक का हाथ सबसे पहले उठता।

एक दिन स्कूल में विज्ञान प्रदर्शनी की घोषणा हुई। विषय था—“कम साधनों में बड़ी खोज”।

दीपक का मन उछल पड़ा, लेकिन घर में न पैसे थे, न सामान। शाम को माँ के पास बैठा दीपक बोला, “अम्मा, मैं भी प्रदर्शनी में हिस्सा लेना चाहता हूँ।” माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “बेटा, पैसे नहीं हैं, पर हिम्मत है—वही सबसे बड़ा सहारा है।”

दीपक ने गाँव के कबाड़खाने से टूटी चीज़ें इकट्ठा कीं—पुराना पंखा, तार, एक जली हुई टॉर्च। कई रातें वह मिट्टी के दीये की रोशनी में जोड़-तोड़ करता रहा। उँगलियाँ कटतीं, आँखें जलतीं, पर उम्मीद बुझती नहीं। उसने एक ऐसा छोटा पंखा बनाया जो हाथ से घुमाने पर बिजली पैदा करता और एक बल्ब जल उठता।

प्रदर्शनी के दिन जब दीपक ने अपना मॉडल चलाया, तो कमरे में रोशनी फैल गई। शिक्षक चौंक गए। एक अधिकारी ने पूछा, “यह कैसे बनाया?” दीपक ने शांत स्वर में कहा, “जब साधन कम हों, तो सोच को बड़ा करना पड़ता है।”

दीपक को पहला पुरस्कार मिला। अख़बार में उसकी तस्वीर छपी। उसी दिन एक स्थानीय संस्था ने उसकी पढ़ाई का खर्च उठाने का वादा किया। माँ की आँखों में आँसू थे—दुख के नहीं, गर्व के।

समय बीतता गया। दीपक आगे पढ़ा, इंजीनियर बना। पर वह कभी अपने गाँव को नहीं भूला। उसने वहाँ सोलर लाइटें लगवाईं, ताकि बच्चों को अंधेरे में पढ़ना न पड़े। उद्घाटन के दिन उसने कहा, “रोशनी बाहर से नहीं, भीतर से आती है।”


सीख:
हालात कितने ही कठिन क्यों न हों, अगर इरादा मजबूत हो तो साधन अपने आप रास्ता बना लेते हैं। सपनों की रोशनी जलाए रखिए—वही आपको आगे ले जाएगी।


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