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ढपोरशंख धर्मात्मा पांडेय

ढपोरशंख धर्मात्मा पांडेय

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शान-ए-अवध होटल से सपरिवार डिनर करके निकले प्रोफेसर धर्मात्मा...जैसे किसी उच्चवर्गीय व्यवसायी हों...! आजकल मध्यवर्ग सिमट गया है, सभी उच्चवर्गीय ही दिखते हैं ! प्रोफेसर धर्मात्मा जेएनयू में मेरे सीनियर थे, तब कभी बातचीत नहीं हुई थी लेकिन सोशल मीडिया पर अपनापन तलाशती मैं जुड़ गई धर्मात्मा साहब से।

चैट के दौरान ज्ञात हुआ कि भाई साहब सरयू के समागम में ही पैदा हुए हैं ! अब प्रोफेसर धर्मात्मा सीनियर से बड़े भाई बन चुके थे। भाभी, भतीजे-भतीजी का हाल-चाल पूछना वार्ता का मुख्य विषय बन गया ! एक बार फोन पर बात हुई तो व्हाट्सएप पर गुडमॉर्निग भी होने लगा नियमित !

डेढ़ वर्ष पूर्व प्रोफेसर धर्मात्मा, मतलब भाईसाहब का मैसेज मिला कि,

“इस महीने सेलेरी आई नहीं, पत्नी का पीएचडी का वायवा है, हो सके तो पन्द्रह हजार दे दें !”

पहले तो लगा मजाक है या गलती से मैसेज आ गया है, लेकिन कॉल किए तो कांपती हुई आवाज में बोल रहे थे भइया, कि बहन जी बहुत सीरियस है... एक सप्ताह में लौटा दूंगा...!

पढ़ी-लिखी महिला प्रायः बेवकूफ़ी कर ही जाती है, तकनीकी ज्ञान हो तो बेवकूफ़ी बड़ी भी हो सकती है ! बच्चों को गोद में सम्भालते हुए शाम तक मैं ट्रांसफर कर पाई थी पैसे...! लेकिन उधर से भाई साहब का कोई मैसेज नहीं मिला कि पैसे पहुंच गए, फोन उठ नहीं रहा था !

थोड़ी देर बाद फोन उठा तो लापरवाही में बोले कि मिल गया पैसा...शॉपिंग कर रहा हूँ... हमेशा...हर बात की खबर आपको नहीं दे सकता बहनजी...!

देखते-देखते तीन महीने गुजर गए... एक दिन मैसेज करके याद दिलाने पर जवाब में गुडमॉर्निंग आना बंद हो गया..! उसके बाद फोन नहीं उठने लगा...! एक बार फोन उठाए तो कह गए कि मौका दीजिए दो-चार दिन में भेजते हैं...! एक महीना फिर बीत गया...मैसेज पुनः किए तो जवाब आया कि,

“बहन जी आपसे पैसे लेकर गलती कर दी...मुझ सिद्धपुरुष को याद दिलाती हैं...उधार, आपको शर्म नहीं आती ! मैं चाहूँ तो ये पैसे लटका दूँ एक-दो वर्ष, लेकिन मैं ऐसा करूँगा नहीं...! आप अपनी परिस्थितियों का रोना रोकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश न करिएगा...आपके पन्द्रह हजार से मेरी जिंदगी नहीं गुजरने वाली है...! मेरी पत्नी इटैलियन भाषा सीख रही है, बेटियां नृत्य सीख रही हैं, महीने में हम दो बार बाहर खाते हैं, ब्रांडेड कपड़े पहनते हैं, हम अपनी खुशियों में सेंध लगाकर आपके पैसे लौटाएंगे, यह आपने सोच कैसे लिया...? फिर भी कह रहा हूँ... लौटा दूंगा जल्दी ही...!”

दो महीने बाद फिर फोन लगाना शुरू किए...पन्द्रह दिन बाद फोन उठा, जवाब आया कि,

“अपने बच्चों की कसम खाकर कह रहा हूँ...अगले महीने दे दूंगा। हम फ्लाइट से चलते हैं, मुम्बई से लखनऊ, लखनऊ से बड़ी गाड़ी से फैज़ाबाद जाते हैं...। मेरा जीवन स्तर समझिए ! शान से तीनों बच्चों का, अपना और पत्नी का बर्थडे मनाते हैं। मैरिज एनिवर्सरी भी मनाते हैं। इस सब में अब आपके पैसे लौटाएं, ऐसी परिस्थिति नहीं बन पाई अभी तक ! धैर्य रखें... भाई हूँ आपका...! बहुत बार आपकी पोस्ट लाइक किया है... व्हाट्सएप पर जब गुडमॉर्निंग भेजता था...वो दिन भूल गए...!”

अब बच्चों की कसम खाकर अगले महीने कह दिया...तो फिर मैंने भी चुप्पी साध ली...! चूँकि दो बेटियों के बाद बेटा हुआ था...कोई अपशकुन न हो। इसलिए मैंने याद दिलाना छोड़ दिया....! पांच महीने बीत गए...इधर फेसबुक पर शब्द भटेना प्रकरण खूब चर्चित हुआ...मैंने शब्द भटेना सम्बन्धी नज़्म सुभाष की पोस्ट का लिंक भेजकर, पुनः याद दिला दिया ! इस बार भाई साहब फिर कसम खाए कि जून में दे देंगे ! कल रात मैंने याद दिलाया कि जून लग चुका है, जो जवाब आया कि,

“अभी जून बीता तो नहीं है...! ये क्या बचपना है कि मैसेज करके टेंशन दे देती हो, चोर उचक्का नहीं हूँ। वापस कर दूंगा ! स्वीकारता हूँ कि डेढ़ वर्ष से ऊपर हो गए। पन्द्रह हजार लिए हुए...लेकिन इन पन्द्रह हजार से मेरी जिंदगी में कुछ होने वाला नहीं है। तुम जैसी औरत से पैसे लेकर ही गलती कर दी मैंने, मैं तो सम्भ्रांत महिला समझता था। लेकिन निराशा मिली मुझे... चलो जुलाई के दूसरे हफ्ते में दे देता हूँ...!”

मैंने भी जवाब में प्रश्न पूछ लिया जुलाई 2018 ही न...पक्का...! थोड़ी देर में मैसेज मिला...

“देखिए बहनजी दो बेटियों के बाद मुझे बेटा हुआ है, जुलाई महीने में उसका जन्मदिन है। बहुत धूमधाम से आयोजन होगा कार्यक्रम का, इधर बेटियों का एडमीशन भी रहेगा। हो सके तो बीस हज़ार रुपए अपने भतीजी-भतीजा के लिए रखिएगा। वापसी में कोई कोताही नहीं होगी, प्लीज़ बहन जी... मुझे पता है जब आप लेखन में इतने भाव भर देती हैं...तो यथार्थ में आप देवी हैं...आपका वही भाई...!”

बिना सोचे समझे मैंने कॉल किया, फोन उठा और...भाई साहब मैसेज में लिखी बात ही दोहराने लगे...!

गुस्से में मैं कांप रही थी... यह कोई तरीका है भावनात्मक ब्लैकमेल का...मै अभी सभी मैसेज का स्क्रीन शॉट लगाती हूँ... फेसबुक पर ! भाई साहब कहे, मुझे टेंशन मत दो ! मेरा व्यक्तित्व फेसबुक तक परिसीमित नहीं है ! मुम्बई विश्वविद्यालय और फैज़ाबाद में मेरी प्रतिष्ठा है ! जाइए जो करना हो कर लीजिए... नहीं दूंगा...!

तभी फोन पर बेटी की आवाज आई,

इशी ने कहा, क्यों आप मेरे पापा को जीने नहीं दे रही हैं ? अभी उनका हार्टफेल हो जाए, वो मर जाएं तो हम तीनों भाई बहन अनाथ हो जाएंगे...! आपके पन्द्रह हजार रुपए किसी की जिंदगी से बढ़कर हैं क्या...!

भाई साहब की पत्नी ने फोन छीनते हुए कहा कि,

जो फेसबुक पर लिखती हो... तुम जैसी औरतों को खूब समझती हूँ...मेरे पति के मैसेज का स्क्रीन शॉट लगाओ देखो तुम्हारे साथ फिर क्या करते हैं हम...!

फोन स्पीकर पर था शायद...

बहुत सारी मिली-जुली आवाज आ रही थी।

प्रोफेसर साहब के पिता जी कह रहे थे,

झूठा ही फंसा रही है मेरे बेटे को...!

प्रोफेसर साहब की सगी बहन कह रही हैं,

अरे हमारा पैसा होता तो.. पन्द्रह हजार नहीं पन्द्रह लाख भी देकर हम भाई से नहीं मांगते...! पता नहीं कैसी बहन है, कहीं ऐसा तो नहीं...कि मुँह पर भइया...और मन में...”

एक विषैली हँसी गूंजी और मैंने फोन काट दिया !

लक्ष्मीनारायण तिवारी जी का यह दोहा, बहुत ही अच्छा लगने लगा -

माँगत - माँगत मान घटें, प्रीत घटें नित के घर जायबे ते।

ओच्छे के संग बुद्धि घटें, क्रोध घटें मन के समझायबे ते॥

पद-प्रतिष्ठा की खोल में सामाजिक गन्दगियाँ ही छिपी हैं, धोखेबाजी किसी भी रिश्ते में सम्भव है ! सरयू के समागम में जन्में हमेशा ही वचन नहीं निभाते ! यह तो बताए ही नहीं कि, भाई साहब... मतलब प्रोफेसर साहब विकलांग हैं और... मानविकी विषय के अधीन हिंदी पढ़ाते हैं ! विकलांगता संवेदनशील बनाए यह जरूरी नहीं है, हिंदी-साहित्य आत्मीयता जगाए यह भी जरूरी नहीं है ! धूर्तता का कोई जाति-धर्म नहीं होता !

“नागा से कागा भयो...” - वाली कहावत याद आती है !

एक नाग और हंस की मित्रता हुई, हंस को उड़ता देख नाग ललचाया तो मैत्री-तप के प्रभाव से नाग कौवा बन गया और दोनों उड़ने लगे...! काले-सफेद की जोड़ी असहज कर जाती कौवे को...पुनः कौवा बगुला बन गया ! लेकिन...नीर-क्षीर विवेक के समय बगुला कुंठित हो जाता...पुनः मैत्री-तप से बगुला हंस बन गया...! एक बार विहार करते हुए, यह परिवर्तित हंस पक्षियों के अंडे खाने के लिए दौड़ा। तभी कहा गया कि नाग से काग बना, काग से बगुला, बगुला से हंस भी बन गया लेकिन तासीर नहीं गई, नाग वाली...!

तो कोई भी कितना भी कथित उच्चकुल में पैदा हुआ हो, डिग्री बटोर ले, पद अर्जित कर ले, ठोकरें खा ले, सामाजिक उपहास झेल ले, लेकिन उसकी प्रवृत्ति नहीं जाती !


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