Abhay Pandey

Tragedy

3.8  

Abhay Pandey

Tragedy

भूख या महामारी

भूख या महामारी

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यह कहानी और इसके सभी पात्र काल्पनिक है इसका किसी व्यक्ति या किसी समूह से कोई संबंध नहीं है।


यह कहानी एक छोटे से गाँव में रह रहे मजदूर कि है। जिसका नाम भोलू पसाद था। वह अपनी पत्नी और दोनों बच्चों टीपू और गुड़िया के साथ गाँव में ही रह कर मजदूरी कर के अपने परिवार का पालन पोषण करता था। भोलू के हालात अन्य मजदूरों से भी नाज़ुक थी जब वह सुबह कमाता था तब जा के कहीं शाम को दो वक्त की रोटी नसीब होती थी, लेकिन भगवान की कृपा से उसको रोजमर्रा के जीवन यापन के लिए काम गाँव में ही मिल जाता था। हांलाकि सभी गाँव के लोगो को भोलू की हालत का पता था, कभी कभी गाँव वाले भी मदद कर दिया करते थे। लेकिन भोलू को यह मंजूर नहीं था क्योंकि वह गरीब होने के साथ साथ स्वाभिमानी भी था जिससे उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँचती थी लेकिन अपने परिवार और बच्चों के बारे में सोच कर वह किसी को मदद के लिए माना भी नहीं कर पाता था। और इसी वजह से वह एक दिन गाँव छोड़कर शहर चला गया। और शहर में जाकर भोलू काफी खुश था क्योंकि उसे कभी कभी ओवर टाइम की मजदूरी का पैसा डबल मिल जाया करता था। और वह खुशी खुशी से अपने परिवार के साथ अपना जीवन यापन कर रहा था। और शहर में आए हुए भोलू को कुछ ही दिन हुए थे तभी अचानक पूरे शहर में यह खबर आग की तरह फैल गई कि यहां महामारी फैल गई है जो एक दूसरों को छूने से फैलती हैं। और भोलू जहां काम के लिए जाता था वह अब उसे कुछ काम भी नहीं मिलता था क्योंकि शहर में चारों तरफ मानो सन्नाटा सा छा गया था कहीं पर कोई भी व्यक्ति दिखाई नहीं देता था। भोलू ओवर टाइम से कमाए हुए पैसों से कुछ दिनों तक ही अपने परिवार का पेट भर पाया और पैसे खत्म होने पर भोलू और उसकी पत्नी पानी पीकर अपना पेट भरते थे। मगर टीपू और गुड़िया की अभी इतनी उमर नहीं थीं कि वे भूख बर्दाश्त कर सकें। अपने परिवार कि यह हालत देखकर भोलू मानो अंदर से टूट सा गया और उससे जब अपने परिवार कि ये दुर्दशा देखी नहीं गई तो वह अपनी मदद के लिए शहर में लोगो से गुहार लगाई पर भोलू की मदद के लिए कोई सामने नहीं आया, तब मजबूरन भोलू को अपने परिवार के साथ शहर छोड़ कर गाँव के लिए निकल पड़ा बस इसी उम्मीद से कि गाँव पहुंच जाऊँगा तो गाँव में लोग मदद तो करते हैं। पर शहर से पैदल चलते चलते टीपू और गुड़िया के पाँव में छाले आ गए मगर भोलू अभी भी हार नहीं मानी क्योंकि "नयनों में था रास्ता और मन में थी उम्मीद' साथ मिलकर चलेंगे तो यह जंग भी जाएंगे जीत" लेकिन टीपू और गुड़िया से अब भूख नहीं सही जा रही थी और वो दोनों रोने लगे तभी भोलू उनको चुप करने के लिए कहानियां सुनने लगा आखिरकार टीपू और गुड़िया ने दम तोड़ दिया आँखें बंद हो गई भोलू को लगा कि वे दोनों सो गए। चलते चलते जब काफी समय हो गया गुड़िया और टीपू ने आँखें नहीं खोली तो उसकी पत्नी ने दोनों को जगाने कि कोशिश कि मगर वे दोनों अपनी आँखें नहीं खोले क्योंकि भूख से उनकी मृत्यु हो चुकी थीं और यह सब देखकर भोलू कि पत्नी भी अपने प्राणों को छोड़ चुकी थी। भोलू अपनी यह दुर्दशा देख कर एक पत्र लिखा "जिसमें लिखा था कि हम महामारी से नहीं भूख से मरे है" और भोलू अपनी पत्नी और बच्चों का दाह संस्कार कर खुद को भी आग के हवाले कर दिया।



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