भगवान एक बेटा भी दे देते तो

भगवान एक बेटा भी दे देते तो

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रात के बारह बज रहे थे और उसी समय नीति को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। कवीश ने फटाफट नीति की मां को जगाया और सब नीति को लेकर अस्पताल गए। नीति दूसरी बार मां बनने जा रही थी। उसकी पहली डिलीवरी भी ऑपरेशन से हुई थी। इस बार भी ऑपरेशन की तारीख तय हो गई थी लेकिन उससे पहले ही नीति को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई थी।

सबका ध्यान ऑपरेशन थियेटर पर ही था। कुछ देर बाद नर्स आई और कहा "मुबारक हो बेटी हुई है, मां और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं| अभी थोड़ी देर में उन्हें वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाएगा, तो आप उनके पास जा सकते हैं।"

कवीश सुनकर खुश हुआ। नीति की मम्मी थोड़ी दुखी लगी पर उन्होंने जताया नहीं। कवीश की मां जो अपनी बड़ी पोती के लिए घर पर ही रुकी थीं, कवीश ने उन्हें फ़ोन किया और कहा" मां घर में लक्ष्मी जी आई हैं"| सुनकर सबसे बड़ा पहाड़ तो नीति की सास पर गिरा| वो फ़ोन पर बात करते हुए वहीं भगवान को कोसने लगी ये क्या किया भगवान आपने? इस बार भी बेटी! इस बार बेटा दे देते तो कितना अच्छा रहता। मेरे बेटे का वंश कैसे आगे बढ़ेगा? कौन उसके नाम को आगे बढ़ाएगा? ना जाने कितनी बार उन्होंने नीति को भी कोसा।

उनकी दकियानूसी बातें सुनें बिना ही कवीश ने फ़ोन रख दिया। नीति को वार्ड में शिफ्ट करा कर कवीश घर पर आया तो मां की वही बातें शुरू हो गईं। कवीश ने जब समझाया तो उल्टा उस पर ही गुस्सा करने लगीं और बिना बहू पोती को देखे वापस गांव चली गईं। नीति जब अस्पताल से घर लौटी तो सास को ना पाकर समझ गई कि वो चली गईं। पर उनका इस तरह जाना नीति को कचोट रहा था जैसे सब उसकी ही गलती थी।

आस पड़ोस वाले जब बच्चे को देखने आते तो यही कहते ओह! फिर लड़की हुई है? लड़का हो जाता तो कितना अच्छा रहता। सबकी बातें सुन नीति और भी उदास हो जाती। नीति की मां भी दो महीने बाद अपने घर लौट गई। अब दोनों बच्चों की जिम्मेदारी अकेले निधि ही संभाल रही थी। शायद मन के एक कोने में नीति की भी यही चाहत थी कि लड़का होता पर....

एक कवीश ही था जो अपनी बेटी के आने पर खुश था। वह नीति के मन की बात भी समझ रहा था और उसे समझाता भी था 'नीति उदास मत हो अब हमारा परिवार पूरा हो गया है' "हम दो हमारे दो" परी को साथ में खेलने वाली प्यारी बहन मिल गई और क्या चाहिए तुम्हें। नीति अब जमाना बदल गया है और बेटे बेटी में कोई फर्क नहीं होता। नीति ने गहरी सांस लेते हुए कहा...कवीश मुझे मेरी बेटी का होने कोई ग़म नहीं है। पर दुनिया वालों की बातें सुनकर मेरा मनोबल गिरता जा रहा है। आस पड़ोस वाले तो फिर भी गैर हैं पर मम्मी जी तो अपनी थी । उनके व्यवहार से मेरे मन को बहुत ठेस पहुंची है ।वो बिना मेरी बच्ची को देखें बिना आशीर्वाद दिए वापस चली गई। इसमें मेरी क्या गलती है कि मुझे दुसरी बार भी लड़की हुई है। निति! सबकी बातें छोड़ो , तुम सबकी बातों में आकर अपने आप को कमजोर मत पड़ने दो। यदि तुम ऐसा सोचोगी तो आस पड़ोस यही सुनाकर जाएंगे । इसलिए लोगों की छोड़ो और अपनी बेटियों की मां बनकर मजबूती से अपने आप को संभालो। 

नीति की छोटी बेटी अब एक साल की होने वाली है ।कवीश बेटी का जन्मदिन अपने माता-पिता के साथ मनाना चाहता था । इसलिए अगले सप्ताह वे दोनोंअपने गांव जा रहे थे। जन्मदिन के दो दिन पहले ही दोनों घर पहुंच गए। छोटी बेटी के समय घर का माहौल ऐसा हो गया था कि उस समय छठी पूजा छोड़ और कुछ नहीं हो पाया था। पोती के जन्मदिन की तैयारियां देख नीति की सास मुंह फुलाए बैठी थी। जन्मदिन की सारी तैयारियां हो चुकी थी और आज कवीश के करीबी रिश्तेदारों के अलावा नीति के मायके वाले भी आए हुए थे। 

जन्मदिन की पार्टी शुरू हो गई। पार्टी में आई आस-पड़ोस की औरतें हर समय कानाफूसी करते ही दिखाई दे रही थीं। नीति की सास अनुराधा भी एक कोने में बैठी हुई सब देख रही थी। उनकी कुछ सहेलियां उनके बगल वाली कुर्सी पर बैठ उनसे सहानुभूति जताने लगीं।

"बेचारी अनुराधा जी एक ही तो बेटा है उनका और बेचारी की बहू को दूसरी बार भी बेटी पैदा हुई। भगवान बेटा दे देते तो कितना अच्छा होता। अब कौन इनका वंश आगे बढ़ाएगा? बेटियां तो दूसरे घर चली जाएंगी फिर बुढ़ापे में इनका सहारा कौन बनेगा ?

वहीं से गुजर रही नीति उनकी बातें सुनकर रूक गई। उसने हाथ जोड़ कर कहा "आंटी जी मुझे माफ़ करिएगा क्योंकि मेरी बात सुनकर शायद आपको अच्छा ना लगे। आंटी जी अगर वंश नहीं बढ़ेगा तो हमारा नहीं बढ़ेगा, हमें बुढ़ापे में बेटे का सहारा नहीं मिलेगा उसके लिए आपको तकलीफ क्यों हो रही है? आप सब के बेटे तो हैं ना? तो बढ़ाइए अपना वंश और बुढ़ापे में रहिए बेटे के सहारे। मैं और मेरे पति अपनी दोनों बेटियों के साथ बहुत खुश हैं। हमारी बेटियां ही हमारे लिए सबकुछ हैं और अब मुझे किसी दूसरे की खुशी से कोई सरोकार नहीं है।"

नीति की बात सुन सबकी बोलती बंद हो गई और कवीश अपनी पत्नी को बेटियों के लिए बोलता देख मन ही मन बहुत खुश हो रहा था। 


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