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बहाना

बहाना

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जीवन को बरसों, दिनों या घंटों में नहीं जिया जाता। जीवन कुछ पलों कि धरोहर होता है। उन पलों की, जो हमें अपने आप से परिचित करवा जाते हैं और दे जाते हैं जीने के लिए एक प्यारा सा बहाना। हाँ, सच, जीने के लिए बहाने कि जरुरत होती है। शायद सुधा भी एसा ही कोई बहाना तलाश रही थी कि अचानक `वह` आया।

“आप आयेंगी न ?” अपनी शादी का कार्ड देते हुए उसने पूछा।

“आप नहीं, तुम। ”सुधा ने सहज ही प्रतिवाद किया लेकिन अपने अंदर कहीं वह अनायास ही असहज हो उठी।

संभवत: बरसों से मन की चिता में पड़ी, उसके नाम की धीमे-धीमे सुलगती,धुंधवाती लकड़ी की तपिश को महसूस कर रही थी, सुधा। बरसों बाद उसके आने से वातावरण औत्सविक -सा हो आया था।सुधा के मन का उल्लास उसके चेहरे पर आने की जिद कर रहा था और वह बार बार उसे अपने अंदर धकेल रही थी। बालपन की स्मृतियों ने उसके मन को जैसे मथ दिया था लेकिन फिर भी वह बीते समय को छोड़कर वर्तमान में रहना चाह रही थीं।

वह सुधा के चेहरे को बड़े ध्यान से पढ़ रहा था,बोला, ”तुम ही सही पर आना जरुर। ” उसके कोमलता से कहे गए शब्द,होंठों के स्नेहिल स्मित में डूब से गए। सुधा चौंककर अपने आप से बाहर आई। वह इन पलों को पूरी तरह से जीना चाहती थी, बिना किसी व्यवधान के। लेकिन उसका मन ही प्रथम व्यवधान है, यह भी वह जान रही थी।

बरसों पहले ऐसे ही कुछ पलों ने उसका स्वत्व उससे छीन लिया था। भले ही अहम् को चादर की तरह ओढ़कर वह सदैव उन पलों से दूर भागती आई है। सत्य ही, दूरी समय या स्थान की नहीं वरन मन की होती है। बरसों का फासला मन को भी दूर कर दे यह असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है।

सुधा की स्मृति में बरसों पहले के वे पल जैसे बार – बार सजीव हो रहे थे।उसके बरामदे में पड़े झूले में, जब सुधा बैठती तो कभी वह स्वयं ही उसे झुलाने के लिए आ जाता और तब उन क्षणों में वह जैसे सारा आकाश अपनी बाहों में भर लेना चाहती।

“सुधा अंदर बैठ जा बेटी मुझे पूजन करना है।”पिता की आवाज पर सुधा ने पुनः चौंककर अपनी बाहों के ओर देखा। वह बाहें बांधकर बैठी थी। और वह भी तो जैसे अपने आप में खोया हुआ था, अचानक चौंक उठा।

“आओ, अंदर बैठते हैं। ”सुधा ने उठते हुए कहा।

“नहीं, चलता हूँ। काफी काम है। ” उसका स्वर कुछ असहज सा हो आया था।

“मिठाई खाकर ही जाना। ” सुधा ने तनिक मुस्कुराकर प्रकृतिस्थ होते हुए कहा। अपने भाई को मिठाई लाने के लिए कहकर, पुनः आकर बैठी तो उसने सवालिया नज़रों से देखते हुए पूछा, ”तुमने भी तो अपने बारे में कुछ सोचा होगा ?”

“मैं जो भी करूँगी, अपने पिता कि इच्छा से करुँगी। उनकी बात नहीं टाल सकती मैं। ”अनायास, अप्रयास ही सुधा का ओढा हुआ अहम् मुखर हो उठा।

अपने ही उत्तर पर स्वयं चौंककर सुधा ने जैसे ही उसके चेहरे पर नज़र डाली, देखा,उदासी का एक बादल उसके काफी करीब से गुज़र गया। इसी एक पल में उसकी स्नेह्दीप्त आँखों में अपना स्वप्न सुधा पढ़ गयी।सिर झुका कर अपने अंदर झाँका तो उत्तर मिला, ”मैं सब कुछ तुम्हारी इच्छा से करना चाहती हूँ। ”तो फिर वह दूसरा उत्तर क्यों ? सुधा विस्मय से भर उठी।

शायद सुधा भी उसकी ही तरह अपना आप छुपाने की चेष्टा कर रही थी। अन्तर यह था कि वह चुप रहकर अपने को बचा लेता था और सुधा मुखर होकर। यह और बात थी कि अक्सर सुधा का ओढा हुआ अहम् ही ऐसे क्षणों में अधिक मुखर होता था। अब तक सुधा का भाई मिठाई लेकर आ गया था और सुधा ने प्लेट में मिठाई रखी।

“मिठाई, अपने हाथों से ही खिला देतीं।” अगले ही पल उसके होठों पर पुनः स्नेहिल स्मित थी।

“हाँ, क्यों नहीं।”कहते ही कहते सुधा ने मिठाई का टुकड़ा उसके मुँह में दे दिया और स्वयं प्लेट से दूसरा टुकड़ा उठाकर खाने लगी।इसी एक क्षण में सुधा का मन अमृत चखने के लिए ललक उठा। परन्तु न जाने क्यों उसके हाथ स्वत: ही थम गए। थमे हुए हाथ और बैठे हुए मन से उसने सोचा,`पता नहीं उसका नाम सुधा क्यों रखा गया ? सदैव ही अमृत उसके हिस्से में आते-आते रह जाता है। ’

“अच्छा,चलता हूँ, आओगी ना ?”वह उठकर खड़ा हो गया था। सुधा ने सिर हिलाया।

“एक बात पूछूं तुम्हें गर्मी नहीं लगती ?” उसका संकेत बंद पंखे की ओर था।

“तुम हर बात कहने में इतनी देर क्यों कर देते हो ?” सुधा के मायूस स्वर में उलाहने का पुट भी आ गया था। इसलिए अपने प्रश्न पर वह स्वत:संकुचित हो उठी। लेकिन वह जाने के लिए पलट चुका था। सुधा ने लम्बी सांस ली।

वापस आई तो कमरे कि हर चीज में उसकी गंध का अहसास हुआ। बचपन से मन बसी गंध जैसे अपने पूरेपन में महक रही हो।

तृषित दृष्टि से उसके जूठे कप और गिलास को देखती हुई सुधा सोच रही थी, `मृत्यु का भय बड़ी चीज होती है उनके लिए, जो जीना नहीं जानते। लेकिन स्त्री की मृत्यु की ही तरह, उसका जीवन और उसके निर्णय भी उसके अपने नहीं होते वरन उसके साथ जुड़े लोगों के होते हैं। उसे `सिर्फ अपने लिए’ निर्णय करने का अधिकार नहीं होता।फिर भी हरेक स्त्री अपने अंदर `अपना आप ‘ बचाकर रख लेती है, जिसे वह किसी से भी नहीं बाँटना चाहती, अपने ईश्वर से भी नहीं। और उसका यही आपा’ उसके `सिर्फ अपने ‘ फैसलों की ज़मीन होता है।

उसके जूठे गिलास में अपनी भावना का पानी डाल, घूंट भरते हुए सुधा जैसे उसके सारे अस्तित्व को अपने अन्दर व्याप लेना चाहती थी।`ईश्वर के अस्तित्व को भी कोई बाँध सका है भला ?’वह सोच रही थी। और सुधा भी तो उसके अस्तित्व के किसी भी भाग को, बांधना नहीं चाहती, सिर्फ प्रतिपल उसे महसूस करना चाहती है अपने अंतर्मन में। यह सुधा के मन का फर्ज था। इस झूठ से मुकरना ऐसा ही होता जैसे वह जीवनभर किसी झूठ का बोझ अपनी आत्मा पर लिए हो।

उसके स्त्रीमन की दुरुहता अपनी सारी उलझनों के साथ, उसके सामने थी। सिरजने वाले ने उसे तन ही नहीं मन भी स्त्री का ही दिया है, इसकी प्रथम अनुभूति सुधा के लिए विलक्षण ही थी अब उसे स्त्रीतन के साथ स्त्री मन के भी फर्ज पूरे करने थे।

अचानक एक विचार के रूप में उसका समूचा स्वत्व सिमट आया, `मुझसे जुड़े लोगों की दृष्टि में जो मेरा जीवन है, मेरा स्त्री तन है,तो मैं अपने इस स्त्री तन के निर्णय उन लोगों को सौंप दूंगी और इस तरह इस तन का फर्ज पूरा करुँगी।मेरी अपनी दृष्टि में, मेरा जो जीवन है, मेरा मन, मेरा ह्रदय, इन्हें मैं अपने ईश्वर कि स्मृति और उसकी प्रतीक्षा में खाली रखूंगी ताकि जब कभी भी वह या उसकी स्मृति एक पल के लिए भी आये तो मुझे उसके सामने अपने आप को खाली ना रख पाने के लिए शर्मिंदा ना होना पड़े। इस तरह अपने मन का फर्ज निबाहूंगी। ’

इस ख़याल ने सुधा के खालीपन को जैसे पूर दिया, अपने आप से मिला दिया और उसके अंदर के `आपे’ ने `सिर्फ उसके’ लिए फैसला किया।

वह जहाँ पाँव रखकर बैठा था, सुधा ने झुककर, उसके पाँव की धूल लेकर माथे पर रखीऔर इन पलों में जीते हुए, अपने अहम् और स्वत्व को, उसके अस्तित्व में विलीन होते देखती रही, देर तक। अब सुधा के पास जीने के लिए एक प्यारा सा बहाना था और हर पल एक उत्सव।


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