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Uttra Sharma

Tragedy

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Uttra Sharma

Tragedy

बेदर्द

बेदर्द

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यह दो प्रदेशों की दो औरतों की कहानी है। जो काम की तलाश में गाँव से शहर आ गई थी। बहुत बड़ी कोठी है। उसमें काम करती रमाबाई आज बहुत खुश थी। आज उसे पहली पगार मिली थी। उसने अपने साथ काम करने वाली आनंदी बहन से कहा मुझे गाँव पैसे पहुंचाने हैं। मैं कुछ पैसे अपने पास रख लेती हूं बाकी अपनी बेटी के पास पैसे भेज देती हूँ । आनंदी ने अपनी बेटी से कहकर पैसे गाँव भेज दिये। उसे गाँव से आए कई बरस हो गये थे। अच्छा-खासा दो अढाई लाख रूपये जमा कर लिए थे। एक दिन अचानक उसका पैर फिसला और उसकी एक टांग टूट गई रमाबाई बहुत परेशान हो गई थी। आनंदी बहन उसे अस्पताल लेकर  गई। डाक्टर ने कहा-आपरेशन करना पड़ेगा। इसके रिश्तेदार को बुलाओ। साईन करने पड़ेंगे आनंदी ने कहा डाक्टर साहेब मैं उत्तरप्रदेश से हूँ। ये बिहार से है। यहां पर इसका कोई नहीं है। मैं इसकी मुंहबोली बहन हूँ रमाबाई तपाक से बोली डाक्टर साहेब ये ही मेरी रिश्तेदार है। इसके साइन करवा लो। आनंदी ने साईन कर दिये।इलाज लम्बा चलना था। टांग की हड्डी टूट गई थी। डाक्टर ने कहा इसके पास इसकी देखभाल के लिए किसी एक अटेंडेंट को रहना पड़ेगा। आनंदी कहती बहन मुझे काम करने भी जाना पड़ेगा। आप जिनको पैसे भेजती थी अपने किसी रिश्तेदार को बुलवा लो ।वह बोली मेरे सिरहाने एक थैला है उसमें एक छोटा सा फोन है उसमें मेरी बेटी का ,जंवाई का नंबर है। वो नंबर मिलाकर मुझसे बात करवा देना। आनंदी ने नंबर मिलाया उधर से जंवाई ने उठाया बोला क्या बात है ?आनंदी ने बताया बेटा तेरी सास अस्पताल में दाखिल है। उसकी टांग का आपरेशन हुआ है। आप कोई एक जना आ जाओ डाक्टर ने कहा है।इसके पास कोई होना चाहिए । लड़की ने अपने बेटे को भेज दिया। न आप आई न बात की। 

15 दिन अस्पताल में लड़का बैठा रहा। फोन देखता रहता। रमाबाई ने एक दिन बताया पता नहीं कैसे मेरे सारे पैसे निकाल लिए। इस लड़के ने मुझे दुखी कर लिया। जब अस्पताल से छुट्टी हुई तो आनंदी रमाबाई को अपने घर ले आई। हर रोज उसको नहलाती ,कपड़े बदलती अपने हाथों से खाना खिलाती। एक दिन आनंदी के भाई -भाभी बोले इसकी लड़की को फोन कर दे। शहरदारी है हम भी तंग रह रहे हैं अगर कल को मर मरा गई तो सारे रिश्तेदार इकट्ठे हो कर आ जायेंगे। कि तुमने लालच में इसको रखा हुआ था। रमाबाई ने सुन लिया वो हाथ जोड़कर कहने लगी मैं तुम्हारे पांव पड़ती हूं। मुझे मत भेजो मैं जमीन पर लेटी रहूंगी। मैं तुम्हें तंग नहीं करूंगी। मैं भूखी रह लूंगी , रो रो कर कह रही थी। उसका जंवाई, लड़की आये और उसे ले गये। बैंक की कापी सारा सामान जो उसने बनाया था सब लेकर चले गये। एक दिन उसका फोन आया बहन मैं रमाबाई बोल रही हूं। चोरी से छुप कर फोन कर रही हूं। मेरी लड़की मुझे खाना नहीं देती । मेरा डाईपर भी चेंज नहीं करती। मुझे मारती है। मेरे सारे पैसे ले लिए हैं। भगवान के लिए मुझे यहां ले जाओ। अचानक फोन काट दिया। मैंने अगले दिन फोन किया, बेटी ने फोन उठाया। कहती मौसी माँ तो खत्म हो गई । मैंने डाईपर बदलने के लिए नहलाने के लिए चारपाई उठाई देखा वो तो मरी पड़ी थी। आनंदी बोली उत्तरा मैम वो मरी नहीं मैंने कुछ पैसे उसके लिए थे। हरिद्वार जाकर उसकी आत्मा की शान्ती के लिए भिखारियों को खाना खिला दूंगी। उन्होंने तो कुछ करना नहीं । जयश्रीकृष्ण


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