बांझ
बांझ
बांझ थी वो मोहल्ले वालों की नजरों में। उसके कान तरस गए थे किलकारी सुनने के लिए। लोगों की कातिल नजरें उसके अस्तित्व को तार-तार कर उसकी जिंदगी को एक अनसुलझा सवाल बना रहे थे।
छोटे छोटे बच्चे उसके साये से दूर भागते थे जैसे कोई काली चुड़ैल उनका बचपन छीनने आ रही हो। उसका पति उसे अपनी जिंदगी से बाहर निकाल चुका था। उसकी जिंदगी की वीरानगी रात के सन्नाटे के साथ कदमताल करती थी।
उस सुबह वो राख का ढेर बन गई थी। नमी छोड़ गई उसे कोसने वाले लोगों की आंखों में। उसके जीवन के लिए दुआ मांगी जा रही थी। अचानक से वो बाँझ से माँ बन गई।
मोहल्ले में की आग ने एक मासूम बचपन को घेर लिया था। माँ का हृदय सहयता के लिए चीत्कार कर रहा था। साहस नहीं था किसी मे आग में झुलस रहे बचपन को बचाने की।
उस बाँझ के कानों में मासूम बचपन अपने जीवन की भीख मांग रहा था। उसके सामने किलकारी गूंज रही थी। वो एक माँ बन गई थी। उसने खुद राख होकर वो मासूम बचपन बचा लिया था। अब वो बांझ नही रही क्योंकि अब वो एक माँ थी।
