Pankaj Prabhat

Drama Inspirational Others


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बाल विवाह

बाल विवाह

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“ बड़ी रौनक है आज कस्बे में, जिसे देखो लाला गोबर गणेश के घर की ही तरफ जा रहा है। हर छोटे-बड़े, धोबी-नाई सबकी जुबान पर लाला जी का ही नाम है। हो भी क्यों न, लाला जी जितने रईस उतने ही धरती से जुड़े हुए, धर्म कर्म में युधिस्ठिर से हैं, आज तक उन्होंने रीति रिवाज वेद पुराण का ही अनुसरण और आचरण किया है। सबके होंठो से लाला जी के लिए दुआ ही निकलती है।

आज लाला जी के इकलौते बेटे की शादी है, बड़ा ही मन्नति बेटा है, पूजा पाठ हवन दान से पाया हुआ। अभी-अभी आठवी कक्षा में प्रथम श्रेणी के अंक लाकर उत्तीर्ण हुआ है, मेघावी छात्र है अभियांत्रिकी की पढ़ाई करना चाहता है, दुनियादारी से अछूता है इसलिए ईमानदार और सच्चा भी है। लाला जी के बैकुंठ धाम की चाभी है।

लड़की भी जनाब कुछ कम नही, मोम की गुड़िया है, आंखों में निश्छल भाव, बोली में गुड़ सी मिठास, छठी कक्षा उत्तीर्ण है, लाला जी के खानदान में सोने पर सुहागा है लड़की। विवाह का मतलब पता नही पर खुश है कि खूब सारे नए कपड़े, गहने खिलोने मिलेंगे।

बारात निकलने को तैयार है, माँ ने तो दूल्हे की 15-20 बार नज़र उतार ली, अब सब बढ़ने ही वाले हैं कि तभी अचानक लाला जी गिर पड़े, पूरी बारात अस्पताल पहुची हुई है, और लाला जी बारात छोड़ यमपुरी निकल लिए। सामने यमराज तिरछे चित्रगुप्त और पीछे दो यमदूत, लाला जी का ही हिसाब किताब चल रहा था,

तभी चित्रगुप्त बोले “ है भगवान इस मनुष्य का समय पूरा नही हुआ पर

मैंने इसे एडवांस में यहां बुलाया है, अपने वीटो पावर को आजमाया है,

है बालक ये धर्म कर्म वाला, फिर भी एक महापाप कर आया है।

बाँध रिवाजो की पट्टी, दो नन्हे बच्चो के भविष्य से ये खेला है,

जीवन भर जो धर्म किये, उनके पुण्यो का नाश कर आया है।

इस पर लाला जी बोले प्रभु मैने तो वही किया है जो सदियों से मेरे पुरखे करते आये है, ये तो हमारे समाज की रीत है, पुरखो की रिवायत जिसे हम आगे बढ़ा रहे हैं। मेरी शादी भी इसी उम्र में हुई थी।

फिर चित्रगुप्त बोले “ तुम्हारे पुरखे तो निर्धन किसान थे अनपढ़ थे, तो फिर तुमने क्यों व्यापार शुरू किया, क्यों विद्या उपार्जन किया, क्यों दान धर्म किया, क्यों अपने पुरखों की रिवायत सिर्फ खेती पर ही निर्भर नही रहे।

लाला ने कहा “ है प्रभु समय बदल गया है, अब सिर्फ खेती से मेरी और मेरे परिवार की जीविका नही चल सकती, सो मैने कुछ रिवायतों को बदलते हुए, बदलते समय में सुध्रीढ़ और समरीढ़ बने रहने के लिए रिवायतों को बदल व्यापार शुरू किया।

तब चित्रगुप्त बोले “ तो फिर आज की समाज में बाल विवाह जैसी गलत और विनाशक रिवाज को न बदल कर अपने पुत्र और अपने मित्र की पुत्री के जीवन को क्यों बर्बाद कर रहे हो। तुम्हें नही लगता कि यह विवाह इन दोनों बच्चों का उज्ज्वल भविष्य और सपने एक बेवकूफी भरे रिवाज के बोझ तले दब जाएंगे। क्या समय अब और आगे नही बदला, क्या तुमने अपने व्यापार के लिए नई नई योजनाओं को नही अपनाया। तो फिर इस कुरीति का विरोध करने की जगह क्यों इसे अपना रहे हो। क्यों न तुम्हारी आत्मा को यहीं रख कर दो बच्चों के भविष्य को बचाया जाए।”

राम न बिहाये बाल काल, न कृष्णा ने ऐसी लीला रची,

ब्रम्हा ने खुद पहले पच्चीस वर्ष ब्रम्हचर्य की बात कही,

है मनु के वंशज तुम सब क्यों धर्म-पथ भ्रमित हो रहे,

धर्म कर्म की बातों को कुरीति कुकर्म से धो रहे,

बाल-विवाह बंद करो, वरना पापों से भरेगी मेरी बही।

इतना सुनकर लाला जी की बुद्धि में विवेक आया, अचानक उन्हें किसी ने हिलाया। लाला जी पसीने से भीगे हुए थे, अस्पताल की खटिया पर सीधे हुए थे। उनके जान में जान आयी, अपने अज्ञान की थाह पायी। झटपट बाहर आये और सबको अपने साथ हुई घटना का विवरण देते हुए, अपने पुत्र और तथाकथित पुत्रवधु की ओर निहारा और कहा, “ यह विवाह जरूर होगा, परंतु 20-22 साल बाद। तब तक इस कस्बे और आस पास के जितने भी गाँव हैं, सबमे सभी छात्रों की प्राथमिक शिक्षा मुफ्त मेरी तरफ से।

अब लाला गोबर गणेश के मन-बुद्धि पर पड़ा गोबर हट चुका था, और एक नए विचार और संस्कार का श्री गणेश हुआ था।


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