अवसर में आपदा
अवसर में आपदा
‘कहाँ जाने की तैयारी है ?’
‘हरिद्वार कुम्भ मेले में।’
‘ऐसे समय जब कोरोना की दूसरी लहर चल रही है?’
‘मुख्यमंत्री ने सारी तैयारियां कर ली है। लाखों लोग आएँगे गंगा में डुबकी लगाएंगे। सारे पाप धुल जाएँगे पुण्य मिलेगा अलग से। तुम भी चलो हमारे साथ।’
‘मैं यह खतरा मोल नहीं ले सकता लाखों की भीड़ में कोरोना फ़ैलने का पूरा अंदेशा है।’
‘ऐसा होता तो सरकार ही मेले पर रोक नहीं लगा देती। बारह साल बाद ऐसा अवसर आता है।’
‘मुझे लगता है यह अवसर कहीं आपदा में नहीं बदल जाय
‘भाग्य और भगवान के आगे कुछ नहीं है, जितनी साँसे लिखी है उससे पहले तो मरने से रहे फिर गाँव के बहुत से लोग जा रहे हैं ऐसा साथ फिर कब मिलेगा ?’
कुम्भ से आने पर गाँव में जोरदार स्वागत हुआ। सैकड़ों की भीड़ इकठ्ठी हो गई, स्वागत और शोभा यात्रा के बाद भंडारा था। इतने में सरकारी लवाजमा आ गया। लॉक डाउन लगा हुआ था,
धरपकड की गई, सैंपल लिए गए, घरों में ही क्वारंटाइन कर दिया। बीस लोग पोजिटिव पाए गए। साँस लेने में तकलीफ वालों को जिला अस्पताल भेजा गया। चार दिन बाद खबर आई कि
छीतरमल, जीतमल, बदामी बाई और समरथ भाई की कोरोना से मृत्यु हो गई। अब अस्पताल वाले ही क्रिया कर्म करेंगे।
इसे कहते हैं अवसर का आपदा में बदल जाना। धर्म के प्रचार का यही नुकसान है कि यह हमारी वैज्ञानिक चेतना को भोथरा कर देता है।
