Neeraj pal

Inspirational


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असत्यता।

असत्यता।

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एक बार एक महत्मा के हृदय में एक राजा से मिलने की इच्छा हुई। अपने कई चेलों के साथ लिए हुए राजा के यहां पहुंचे। दरवाज़े पर पहरेदार खड़े थे।मिलने वालों की भीड़ लगी हुई थी। पहरे वाले सिपाही सब का नाम पूछ -पूछ कर अंदर जाने की आज्ञा दे रहे थे। वह आगे बढ़े। नाम पूछा गया। इन्होंने साधारण मनुष्यों के भाँति अपना नाम बताया और आगे चलते बने। थोड़ी देर पीछे चेलों का नंबर आया। सिपाहियों ने पूछा -'तुम कौन हो और तुम्हारा क्या नाम है?'

चेलों ने उत्तर दिया-" हम भगवद् अनुरागी साधु हैं, हम संसार त्यागी बैरागी हैं।"

सिपाही बोला- तुम्हारा क्या काम है जो राज दरबार में जाना चाहते हो ?


चेले ने कहा- हमारा कोई विशेष कार्य नहीं है, हम केवल राजा से मिलने की इच्छा रखते हैं।

सिपाही बोला- अमीरों के यहां फ़कीरों का क्या काम जाओ,परे हटो, इस समय राजा साहब दरबार कर रहे हैं, तुम को यदि कुछ लेना हो तो फिर किसी समय आना।

चेलों ने कहा -अजी !"हमारे गुरु अंदर गए हैं हमको भी अवश्य पहुंचना है। यदि तुम नहीं जाने दोगे तो हम जबरदस्ती जाएंगे तुम को साधुओं के रोकने का अधिकार नहीं है "ऐसा कहते हुए आगे बढ़ने लगे।

ज्यों ही पहरेदारों ने उनको बढ़ते देखा ,पीटना शुरू कर दिया और मार- मार कर बाहर निकाल दिया।

जब गुरु अंदर से लौटे, चेलों से कहने लगे, भाई लोग कहां रहे? मैं तुम्हारी राह देखता रहा।

बोले, महाराज ! हमको सिपाहियों ने भीतर नहीं घुसने दिया और बहुत मारा भी।

गुरु ने कहा- क्यों? तुमने क्या कहा था? बोले प्रभु हम ने यह कहा था कि "हम साधु हैं वैरागी हैं।"

गुरु बोले -बस यही कारण था कि तुम पीटे गए। तुम को साधारण रीति से अपना नाम बता देना काफी था। तुम बने, इसलिए पिटे। जो बनता है वह अवश्य हानि उठाता है। बनना ईश्वर को पसंद नहीं है।

जितने तुम हो उतने ही दूसरों पर प्रकट करो। आजकल का व्यवहार है कि अंदर कुछ है और बाहर कुछ जाहिर कर रहे हैं। घर में दाना भी नहीं परंतु बाहर ऐसे रूप रच रहे हैं कि जिससे लोग इनको बड़ा आदमी समझे। साधुओं की भी ऐसी ही दशा है,अंतर की कमाई तो कुछ करते नहीं, बाहरी स्वाँग बनाए फिरते हैं, सिद्धियां दिखाते फिरते हैं, ताकि लोग उनकी इज़्ज़त करें यह सब बहुत बुरा है।

साधु वही है जिसमें सादगी हो जो मान- बड़ाई के लिए ढोंग न रचे। जितना अंदर हो उतना ही प्रकट करें, जिसके व्यवहार में कुटिलता ना हो, सच्चाई से कभी बाहर ना हो। बनावट और धोखे से जो कभी काम ना ले उसको ही साधु समझना चाहिए वह गृहस्थ हो चाहे विरक्त।


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