अपनों की आवाज
अपनों की आवाज
मेरे अंदर की आवाज रोज यही कहती हैं कि
जब तक हाथ चाहिए थे
कंधे पर बिठाकर घूमाया
जब तक पैर चाहिए थे
उंगली पकड़कर चलाया
जब तक जरुरत थी
सब ने कहा हमारी जान है
उस आवाज ने हौसला दिया
जब जरूरत पूरी हुई
तो वहीं बाप कहने लगा
बोझ बन गई है बेटी
कब जाएंगी इस घर से
सबसे खतरनाक आवाज बाहर की नहीं होती
वोआवाज होती है जो अपने अंदर से आती है
मैं खुद से सवाल करने पर मजबूर हो गई
क्या मैं वाकई में बोझ हूं?
वाह रे रिश्ते
जरूरत तक अपने
जरूरत के बाद पराए।
