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Sanjeevan Kumar Singh

Fantasy Inspirational Others

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Sanjeevan Kumar Singh

Fantasy Inspirational Others

अपने काम से भटकाव ही सबसे बड़ा नुकसान

अपने काम से भटकाव ही सबसे बड़ा नुकसान

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आप लकड़हारा हो और जंगल में चरवाहे के साथ बैठकर समय बिता रहे हो… तो समझ लो, नुकसान आपका ही हो रहा है। एक घना जंगल था—ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से भरा, जहाँ सुबह की धूप पत्तों के बीच से छनकर धरती को छूती थी। उसी जंगल के किनारे एक लकड़हारा रोज़ अपने काम पर आता था। उसके कंधे पर कुल्हाड़ी होती, मन में लक्ष्य होता और कदमों में दृढ़ता। वह जानता था कि अगर उसे अपना घर चलाना है, परिवार की ज़रूरतें पूरी करनी हैं, तो उसे हर दिन मेहनत करनी होगी। हर पेड़ जो वह काटता, उसके लिए सिर्फ लकड़ी नहीं, बल्कि उम्मीद का एक टुकड़ा होता था। उसी जंगल में एक चरवाहा भी रोज़ आता था। उसके साथ उसकी भेड़ों का झुंड होता। वह उन्हें खुले मैदान में छोड़ देता और खुद किसी पेड़ के नीचे बैठकर बांसुरी बजाता, कभी गुनगुनाता, कभी आसमान की ओर देखता रहता। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी निश्चिंतता रहती—जैसे उसे किसी बात की जल्दी नहीं हो। एक दिन लकड़हारा काम करते-करते थक गया। उसने सोचा थोड़ा आराम कर लिया जाए। तभी उसकी नज़र चरवाहे पर पड़ी, जो बड़े आराम से बैठा था। लकड़हारे ने सोचा—“यह कितना सुकून भरा जीवन जी रहा है, न कोई जल्दी, न कोई चिंता।” वह अपनी कुल्हाड़ी एक तरफ रखकर चरवाहे के पास जाकर बैठ गया। दोनों में बातें शुरू हो गईं। पहले तो सामान्य बातें हुईं—मौसम की, जंगल की, जीवन की। फिर धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं। लकड़हारा उस शांति में खो गया। उसे लगा कि शायद वह अब तक बेवजह ही इतनी मेहनत करता रहा। थोड़ी देर बैठने से क्या फर्क पड़ेगा? इधर चरवाहा अपनी भेड़ों को देखता रहता। वे इधर-उधर घूमते हुए घास चरती रहतीं। चरवाहे को कुछ खास करने की ज़रूरत नहीं थी—उसका काम अपने आप चलता रहता था। लेकिन लकड़हारे का काम ऐसा नहीं था। उसकी कुल्हाड़ी वहीं पड़ी थी—चुप, निष्क्रिय। पेड़ वहीं खड़े थे—जैसे उसका इंतज़ार कर रहे हों। समय धीरे-धीरे बीत रहा था, लेकिन लकड़हारे का काम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ रहा था। थोड़ी देर बाद वह उठा और घर लौट गया। उस दिन उसने जितना काम करना था, उसका आधा भी नहीं कर पाया। ऐसा ही अगले दिन भी हुआ। अब वह काम से ज्यादा समय चरवाहे के साथ बिताने लगा। उसे वह सुकून अच्छा लगने लगा था। धीरे-धीरे यह उसकी आदत बन गई। कुछ दिनों बाद उसे महसूस हुआ कि उसकी आमदनी कम हो रही है। घर में पैसों की कमी होने लगी। जरूरतें बढ़ती जा रही थीं, लेकिन उसके पास उतना नहीं था जितना पहले होता था। एक दिन उसकी पत्नी ने उससे पूछा, “आजकल काम कम क्यों हो रहा है?” लकड़हारे ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन उसके मन में सवाल जरूर उठने लगे। अगले दिन वह फिर जंगल गया। उसने देखा—चरवाहा हमेशा की तरह बैठा है, भेड़ें घास चर रही हैं। सब कुछ वैसा ही था। तभी अचानक उसे एक बात समझ आई। चरवाहा काम कर रहा था—अपने तरीके से। भेड़ों को चराना ही उसका काम था, और वह काम चल रहा था। उसे हर पल सक्रिय रहने की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि उसका काम ऐसा था। लेकिन लकड़हारे का काम अलग था। अगर वह कुल्हाड़ी नहीं चलाएगा, तो कुछ नहीं होगा। उसके काम में आराम का मतलब सीधा नुकसान था। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वह तुरंत उठा, अपनी कुल्हाड़ी उठाई और पूरे मन से काम में लग गया। उस दिन उसने पहले से ज्यादा मेहनत की। हर वार के साथ उसे अपनी गलती याद आ रही थी, और हर वार के साथ वह खुद को सुधार रहा था। शाम को जब वह घर लौटा, तो उसके चेहरे पर एक अलग ही संतोष था। उसे समझ आ गया था कि हर व्यक्ति का काम अलग होता है, और उसी के अनुसार उसका जीवन चलता है। दूसरों को देखकर अपने रास्ते से भटकना सबसे बड़ी भूल होती है। जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है। हम अक्सर दूसरों को देखकर अपना समय बर्बाद करने लगते हैं। कोई आराम करता हुआ दिखता है, तो हमें लगता है कि हमें भी वैसा ही करना चाहिए। लेकिन हम यह नहीं समझते कि उसका काम और हमारी जिम्मेदारियाँ अलग हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका काम दिखता नहीं, लेकिन चलता रहता है। और कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें हर पल मेहनत करनी पड़ती है, तभी उनका जीवन आगे बढ़ता है। अगर मेहनत करने वाला व्यक्ति आराम के चक्कर में पड़ जाए, तो उसका नुकसान तय है। दूसरों के साथ बेवजह बैठकर समय बिताने वालों का शायद कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि उनका काम चलता रहता है। लेकिन जो अपने काम से भटक जाता है, उसका रास्ता रुक जाता है। समय बहुत कीमती होता है। एक बार चला जाए तो वापस नहीं आता। इसलिए समझदारी इसी में है कि हम अपने काम को पहचानें, अपनी जिम्मेदारियों को समझें और उसी पर ध्यान दें। दूसरों की जिंदगी देखकर आकर्षित होना आसान है, लेकिन अपने लक्ष्य पर टिके रहना ही असली सफलता है। आखिर में बात बहुत सीधी है— जिसका जो काम है, उसे वही करना चाहिए। क्योंकि अगर लकड़हारा कुल्हाड़ी छोड़कर बैठ जाएगा… तो पेड़ कभी नहीं कटेंगे, और उसका भविष्य भी वहीं खड़ा रह जाएगा। 🌳🪓
संजीवन कुमार सिंह


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