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Sanjeevan Kumar Singh

Children Stories Action Children

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Sanjeevan Kumar Singh

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बुढ़ापा: प्यार या बोझ?

बुढ़ापा: प्यार या बोझ?

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गांव के एक छोटे से घर में रामप्रसाद और उनकी पत्नी सावित्री देवी अपने बेटे मोहन के साथ रहते थे। उनका घर भले ही छोटा था, लेकिन उसमें प्यार और अपनापन बहुत बड़ा था। रामप्रसाद एक किसान थे। दिन भर खेतों में मेहनत करते, धूप में पसीना बहाते, लेकिन जब शाम को घर लौटते और मोहन को हँसते हुए देखते, तो उनकी सारी थकान दूर हो जाती। सावित्री देवी भी अपने बेटे के लिए हर छोटी-बड़ी चीज़ का ध्यान रखतीं। एक बार मोहन को तेज बुखार हो गया। रात के करीब 2 बजे थे। गांव में डॉक्टर नहीं था। जैसे ही सावित्री देवी ने मोहन के शरीर को छुआ, उनका दिल घबरा गया। “जी, मोहन को बहुत तेज बुखार है… कुछ कीजिए…” उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा। रामप्रसाद ने बिना एक पल गंवाए मोहन को गोद में उठाया और 5 किलोमीटर दूर शहर के अस्पताल की ओर पैदल निकल पड़े। रास्ता अंधेरा था, ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन एक पिता के कदम रुकने वाले नहीं थे। अस्पताल पहुंचकर डॉक्टर ने इलाज शुरू किया। कुछ दिन में मोहन ठीक हो गया। उस दिन रामप्रसाद ने डॉक्टर की फीस देने के लिए अपनी एक छोटी सी जमीन बेच दी। लेकिन उनके चेहरे पर कोई दुख नहीं था, क्योंकि उनका बेटा ठीक हो गया था। समय बीतता गया… मोहन बड़ा हुआ, पढ़ाई की, शहर गया और एक अच्छी नौकरी पा ली। अब वह अपने माता-पिता को गांव से शहर ले आया। शुरू में सब कुछ बहुत अच्छा था। मोहन अपने माता-पिता का बहुत ख्याल रखता था। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, मोहन की जिंदगी में जिम्मेदारियां बढ़ने लगीं। उसकी शादी हो गई, बच्चे हो गए, खर्चे बढ़ गए। अब वही मोहन, जो कभी अपने माता-पिता की छोटी-सी परेशानी पर भी घबरा जाता था, धीरे-धीरे बदलने लगा। एक दिन सावित्री देवी को तेज दर्द होने लगा। उन्होंने मोहन से कहा— “बेटा, छाती में बहुत दर्द हो रहा है… डॉक्टर को दिखा दो…” मोहन ने मोबाइल से नजर हटाए बिना कहा— “माँ, थोड़ी देर आराम कर लो… ठीक हो जाएगा…” लेकिन दर्द बढ़ता गया। अगले दिन डॉक्टर को दिखाया गया। डॉक्टर ने कुछ टेस्ट लिखे और कहा— “इनकी हालत गंभीर है, तुरंत इलाज शुरू करना होगा… थोड़ा खर्चा ज्यादा आएगा…” मोहन चुप हो गया। उसके दिमाग में खर्चे का हिसाब चलने लगा— बच्चों की फीस, घर का लोन, रोज़मर्रा के खर्चे… घर लौटकर उसने अपनी पत्नी से बात की। पत्नी ने कहा— “इतना पैसा खर्च करने का क्या फायदा… अब उम्र भी तो हो गई है… कितने दिन और जी लेंगी…?” यह बात सुनकर मोहन के दिल में थोड़ी हलचल हुई, लेकिन उसने खुद को समझा लिया। धीरे-धीरे इलाज टलता गया। एक दिन रामप्रसाद ने मोहन से कहा— “बेटा, अगर पैसे की चिंता है तो मेरा पुराना खेत बेच दो… लेकिन तुम्हारी माँ का इलाज करवा दो…” मोहन ने नजरें झुका लीं— “पिताजी, अब उस खेत की भी कीमत क्या है… और इतना खर्च करना सही नहीं है…” रामप्रसाद की आँखों में आंसू आ गए। उन्हें वो दिन याद आ गया जब उन्होंने मोहन के इलाज के लिए बिना सोचे-समझे अपनी जमीन बेच दी थी। कुछ दिनों बाद सावित्री देवी की हालत और बिगड़ गई। एक रात उन्होंने मोहन का हाथ पकड़ा और धीमी आवाज़ में कहा— “बेटा… हम तुम्हारे लिए बोझ बन गए हैं क्या…?” मोहन के पास कोई जवाब नहीं था। उस रात मोहन सो नहीं पाया। उसे अपने बचपन की हर बात याद आने लगी— माँ का रात-रात भर जागना, पिता का बिना चप्पल के खेतों में काम करना, उसके लिए अपने सपनों का त्याग करना… अगली सुबह मोहन ने फैसला किया— “मैं माँ का इलाज करवाऊंगा, चाहे कुछ भी हो जाए…” वह अस्पताल भागा, डॉक्टर से मिला, इलाज शुरू करवाया। उसने अपनी गाड़ी बेच दी, कुछ गहने गिरवी रखे, लेकिन माँ का इलाज शुरू हो गया। धीरे-धीरे सावित्री देवी की हालत सुधरने लगी। एक दिन डॉक्टर ने कहा— “अब ये खतरे से बाहर हैं…” यह सुनकर मोहन की आँखों से आंसू बह निकले। उसने माँ का हाथ पकड़कर कहा— “माँ, मुझे माफ कर दो… मैं बहुत बड़ा अपराध करने वाला था…” सावित्री देवी मुस्कुराईं— “बेटा, माँ-बाप कभी अपने बच्चों से नाराज़ नहीं होते…” रामप्रसाद ने मोहन के कंधे पर हाथ रखा— “बेटा, याद रखो… पैसा जरूरी है, लेकिन अपने उससे भी ज्यादा जरूरी हैं…” समय फिर आगे बढ़ा… अब मोहन अपने माता-पिता का पहले से भी ज्यादा ख्याल रखने लगा। उसने अपने बच्चों को भी यही सिखाया— “जिस तरह हम अपने माता-पिता के साथ व्यवहार करेंगे, वही हमारे बच्चे हमसे सीखेंगे…” एक दिन मोहन का बेटा उसके पास आया और बोला— “पापा, जब आप बूढ़े हो जाओगे, तो मैं भी आपका वैसे ही ख्याल रखूंगा जैसे आप दादा-दादी का रखते हो…” यह सुनकर मोहन की आँखों में खुशी के आंसू आ गए। उसे समझ आ गया था कि जिंदगी का सबसे बड़ा निवेश पैसा नहीं, बल्कि रिश्ते होते हैं। सीख: यह कहानी हमें एक गहरी सच्चाई बताती है— माँ-बाप अपने बच्चों के लिए हर हद पार कर जाते हैं, बिना यह सोचे कि उन्हें क्या खोना पड़ेगा। लेकिन जब वही माँ-बाप बूढ़े हो जाते हैं, तो हम अक्सर उनके इलाज और देखभाल को “खर्च” समझने लगते हैं। हकीकत यह है कि— 👉 जिस प्यार और त्याग से उन्होंने हमें पाला, उसका कर्ज हम कभी नहीं चुका सकते। 👉 लेकिन कम से कम हम उन्हें वो सम्मान और देखभाल तो दे सकते हैं, जिसके वे हकदार हैं। 👉 और सबसे बड़ी बात— हमारे बच्चे हमसे सीख रहे हैं। आज हम जैसा व्यवहार अपने माता-पिता के साथ करेंगे, कल हमारे बच्चे हमारे साथ वैसा ही करेंगे। इसलिए समय रहते सोचिए… कहीं ऐसा न हो कि जब एहसास हो, तब बहुत देर हो चुकी हो… 😢 

संजीवन कुमार सिंह ✍️ 


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