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Sanjeevan Kumar Singh

Action Classics Children

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Sanjeevan Kumar Singh

Action Classics Children

मजबूरी की राह पर चलता बेटा

मजबूरी की राह पर चलता बेटा

5 mins
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 “छोटूसिंह – एक बेटे की खामोश कहानी” हर उस बेटे को समर्पित, जो घर से दूर है… चाहे वो किसी छोटे से होस्टल के कमरे में हो या किसी बड़े शहर की भागती-दौड़ती जिंदगी में खो गया हो… छोटूसिंह… एक साधारण सा नाम, लेकिन उसके पीछे छिपी कहानी असाधारण थी। वो उन लाखों बेटों में से एक था, जो अपने घर की छत, माँ के हाथ का खाना, पिता की डांट, और बहन की नोकझोंक छोड़कर, एक दिन अचानक बड़े हो जाते हैं। उसकी कहानी कोई किताबों में लिखी हुई कहानी नहीं थी… ये वो सच्चाई थी, जो हर घर में, हर गली में, हर शहर में कहीं न कहीं जी जा रही है। बचपन की मीठी यादें छोटूसिंह का बचपन बहुत ही प्यारा था। घर छोटा था, लेकिन खुशियों से भरा हुआ। सुबह होते ही माँ की आवाज पूरे घर में गूंजती— “छोटू… उठ जा बेटा, सूरज सिर पर आ गया…” वो चादर में मुँह छुपाकर कहता— “माँ, अभी नहीं… थोड़ी देर और…” माँ मुस्कुराती और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहती— “ठीक है, पाँच मिनट और… लेकिन फिर उठ जाना…” वो पाँच मिनट कभी खत्म ही नहीं होते थे, जब तक माँ उसे प्यार से उठाकर बैठा न दे। आँगन में तुलसी का पौधा था… जहाँ हर सुबह माँ दीप जलाती और प्रार्थना करती— “मेरे बच्चों को खुश रखना…” छोटूसिंह वही बच्चा था, जो बिना तकिए के सो नहीं पाता था। अगर तकिया थोड़ा भी तिरछा हो जाए, तो वो तुरंत उठकर बोलता— “माँ, ठीक से लगा दो ना…” माँ हँसते हुए कहती— “इतना बड़ा हो गया है, और अभी भी छोटा बच्चा ही है…” खाने में भी उसका बहुत नखरा था। “आज दाल नहीं खाऊंगा… आज आलू के पराठे बनाओ…” और माँ हर बार उसकी जिद पूरी कर देती। शाम होते ही वो दोस्तों के साथ गली में निकल जाता— कभी क्रिकेट, कभी कबड्डी, कभी छुपन-छुपाई… उसकी दुनिया बस इतनी ही थी— उसका घर, उसका मोहल्ला, उसके अपने लोग। जिम्मेदारियों की शुरुआत समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया… छोटूसिंह अब बड़ा हो रहा था। पढ़ाई खत्म होने को आई, और घर की आर्थिक स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं थी। पिता दिन-रात मेहनत करते थे… लेकिन फिर भी घर चलाना आसान नहीं था। एक शाम, पिता ने उसे अपने पास बुलाया— “बेटा, अब तुझे कुछ करना होगा… घर की जिम्मेदारी समझनी होगी…” ये सुनकर छोटूसिंह चुप हो गया। उसे समझ आ गया था कि अब वो बच्चा नहीं रहा। वो रात जो कभी नहीं भूलती उस रात छोटूसिंह को नींद नहीं आई। वो छत को देखता रहा… और सोचता रहा— “क्या सच में मुझे घर छोड़ना पड़ेगा?” “क्या मैं माँ से दूर रह पाऊंगा?” “क्या मैं अकेले सब संभाल पाऊंगा?” उसकी आँखों से आँसू निकल आए… लेकिन उसने किसी को नहीं बताया। घर छोड़ने का दिन वो दिन आ ही गया, जिसका डर उसे हमेशा से था। माँ ने सुबह जल्दी उठकर उसके लिए खाना बनाया… उसकी पसंद की सब चीजें… बहन चुपचाप बैठी थी, कुछ बोल नहीं पा रही थी… लेकिन उसकी आँखें सब कह रही थीं। पिता बाहर खड़े थे… उनकी आँखों में भी नमी थी, लेकिन उन्होंने खुद को संभाल रखा था। जब छोटूसिंह जाने लगा, माँ ने उसे गले लगाया… और कहा— “खुद का ध्यान रखना बेटा…” छोटूसिंह कुछ बोल नहीं पाया… बस सिर हिलाकर निकल गया। गली के मोड़ तक पहुँचकर उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा— वो घर… वो दरवाजा… वो माँ… उसकी आँखें भर आईं… नई जिंदगी, नए संघर्ष शहर की जिंदगी उसके लिए बिल्कुल नई थी। यहाँ कोई उसे “छोटू” कहकर नहीं बुलाता था… यहाँ सब उसे सिर्फ एक आम इंसान की तरह देखते थे। वो एक छोटे से कमरे में रहने लगा, जहाँ चार और लोग रहते थे। जो लड़का अपने कमरे में किसी को आने नहीं देता था, अब दूसरों के साथ अपना बिस्तर शेयर कर रहा था। जो बिना तकिए के नहीं सोता था, अब कभी-कभी फर्श पर भी सो जाता था। भूख और मजबूरी कई बार ऐसा होता कि उसके पास पैसे नहीं होते थे। वो चुपचाप पानी पीकर सो जाता… किसी से कुछ नहीं कहता। धीरे-धीरे उसने खुद खाना बनाना सीख लिया। पहले जली हुई रोटियाँ… फिर अधपकी… और फिर ठीक-ठाक… माँ से झूठी मुस्कान हर रात माँ का फोन आता— “बेटा, खाना खाया?” “हाँ माँ, बहुत अच्छा खाना खाया…” “सब ठीक है ना?” “हाँ माँ, सब बढ़िया है…” लेकिन ये “सब बढ़िया है” सिर्फ एक झूठ था। तन्हाई की रातें रात को जब सब सो जाते, तो छोटूसिंह चुपके से रोता। वो अपने फोन में पुरानी तस्वीरें देखता— माँ के साथ… बहन के साथ… दोस्तों के साथ… और धीरे-धीरे उसकी आँखों से आँसू बहने लगते। पहली कमाई का सुकून काफी संघर्ष के बाद उसे नौकरी मिली। पहली सैलरी मिली तो वो बहुत खुश था… लेकिन उसने खुद के लिए कुछ नहीं खरीदा। उसने सारे पैसे घर भेज दिए। माँ ने फोन पर कहा— “बेटा, अपने लिए भी कुछ ले ले…” छोटूसिंह मुस्कुराया— “माँ, मुझे कुछ नहीं चाहिए…” ख्वाहिशों का बदलना अब उसकी ख्वाहिशें बदल चुकी थीं। पहले वो खुद के लिए सपने देखता था… अब वो अपने परिवार के लिए जीता था। बीमारी और मजबूरी एक दिन वो बहुत बीमार पड़ गया। तेज बुखार… शरीर में दर्द… लेकिन उसने किसी को नहीं बताया। वो नहीं चाहता था कि माँ परेशान हो। घर की याद हर दिन उसे घर की याद आती थी। माँ की रोटी… पिता की डांट… बहन की हँसी… सब कुछ… घर वापसी का दिन कई महीनों बाद जब वो घर लौटा, तो माँ उसे देखकर रो पड़ी। छोटूसिंह भी खुद को रोक नहीं पाया… वो भी फूट-फूट कर रो पड़ा। उसने महसूस किया कि वो अब पहले जैसा नहीं रहा। एक कड़वी सच्चाई लोग कहते हैं— “बेटे मजबूत होते हैं…” लेकिन सच ये है कि बेटे भी रोते हैं… बस किसी को दिखाते नहीं। अंतिम संदेश बेटियाँ ही नहीं साहब… बेटे भी घर छोड़ जाते हैं… वो भी दर्द सहते हैं… वो भी तन्हा होते हैं… बस फर्क इतना है कि वो अपने आँसू छुपा लेते हैं… समापन छोटूसिंह की कहानी खत्म नहीं हुई… क्योंकि ये सिर्फ उसकी कहानी नहीं है… ये हर उस बेटे की कहानी है— जो घर से दूर है… जो अपने सपनों के लिए… अपने परिवार के लिए… हर दिन थोड़ा-थोड़ा खुद को खो रहा है… 😢 संजीवन कुमार सिंह ✍️ 


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