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Sanjeevan Kumar Singh

Children Stories Classics Others

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Sanjeevan Kumar Singh

Children Stories Classics Others

“मर्द का दर्द: एक अनकहा सच”

“मर्द का दर्द: एक अनकहा सच”

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दामिनी फिल्म का अदालत का सीन या जॉली एल एल बी का आखरी संवाद के अंदाज से कहानी पढ़िए....विनती है

 (अदालत जैसा माहौल… गूंजती हुई आवाज़)

 माननीय न्यायालय…

आज मैं किसी एक व्यक्ति का नहीं, किसी एक घर का नहीं…
बल्कि पूरे समाज का मुकदमा आपके सामने रख रहा हूँ। यह मामला जमीन-जायदाद का नहीं है…
 यह मामला रिश्तों का है… यह मामला खून के रिश्तों के बिखरने का है… यह मामला उस दर्द का है… जिसे कोई सुनना ही नहीं चाहता…
 (तेज आवाज़ में)
जब एक दंपति के बीच विवाद होता है… तो सबसे पहले कटघरे में कौन खड़ा होता है…? पति… या उसकी माँ…? क्यों हर बार ऐसा होता है कि… जब माँ की बात आती है… तो पत्नी की माँ को प्राथमिकता मिलती है… और पति की माँ…? वो धीरे-धीरे एक “जिम्मेदारी” बन जाती है… एक “बोझ” बन जाती है… आखिर क्यों…? 😡
क्यों वह माँ… जिसने नौ महीने पेट में रखा… जिसने अपनी नींदें त्यागकर बच्चे को पाला… जिसने अपने हिस्से की रोटी तक अपने बेटे को खिला दी… उसी माँ को बुढ़ापे में वृद्धाश्रम का दरवाज़ा देखना पड़ता है…? क्या उसका कसूर सिर्फ इतना है कि… वह “पति की माँ” है…?
 (थोड़ा रुककर, गंभीर स्वर में)

माननीय न्यायालय… मैं एक और सवाल रखना चाहता हूँ… हम में से कितनों ने यह देखा है… कि शादी से पहले बहनों ने अपने पिता से संपत्ति का हिस्सा माँगा हो…? बहुत कम… शायद ना के बराबर… लेकिन वही बहन… जब किसी और घर की बहू बनती है… तो वही संपत्ति, वही अधिकार… उसी घर में विवाद का कारण क्यों बन जाता है…? आखिर क्यों…? 😡
क्यों ऐसा होता है कि… जब तक भाई कुंवारे रहते हैं… उनके बीच कभी संपत्ति का झगड़ा नहीं होता… लेकिन जैसे ही शादी होती है… वैसे ही “मेरा हिस्सा”, “तेरा हिस्सा” शुरू हो जाता है… क्यों…? 😠
 क्या शादी कोई रिश्ता जोड़ने के लिए होती है… या रिश्ते तोड़ने के लिए…?

(धीरे-धीरे, दर्द भरी आवाज़)
अरे संपत्ति की बात तो बहुत दूर है… पहले तो चूल्हे बंटने लगते हैं… वो चूल्हा… जिस पर एक ही रोटी बनती थी… और छह लोग मिलकर खाते थे… वो चूल्हा… जिसका स्वाद सबकी ज़ुबान पर एक जैसा था… सिर्फ दो नए लोग आने पर… उस घर में ऐसी कौन सी मनहूसियत आ जाती है… कि चूल्हे अलग हो जाते हैं…? क्यों…? 🤔
 जिस घर में पहले… एक सदस्य कुछ खाने को लाता था… तो सब मिल-बांटकर खाते थे… उसी घर में अब… लोग खाने की चीजें छुपाकर ले जाने लगते हैं… आखिर क्यों…? 😣
 क्या बदल गया…? रोटी वही है… घर वही है… लोग वही हैं… तो फिर… दिल क्यों बदल गए…?
(आवाज़ और भावुक हो जाती है)
जिस घर से दो बेटियाँ पढ़-लिखकर… इज़्ज़त से विदा हो जाती हैं… उसी घर की नई नवेली बहू को… वही घर छोटा क्यों लगने लगता है…? क्यों उसे लगता है कि… यहाँ उसका दम घुट रहा है…? क्या उस घर की दीवारें बदल गईं…? या सोच बदल गई…?

(गंभीरता से)
माननीय न्यायालय… आज हर पुरुष के दिल में एक डर बैठा हुआ है… वो डर यह नहीं कि उसे पैसा कमाना है… वो डर यह नहीं कि उसे जिम्मेदारियाँ निभानी हैं… वो डर यह है कि… “कहीं मेरा परिवार बिखर ना जाए…” कहीं ऐसा ना हो कि… जिस भाई के साथ उसने बचपन बिताया… जिसके लिए वो किसी से भी लड़ने को तैयार रहता था… वही भाई… एक दिन उसका दुश्मन बन जाए… आखिर क्यों…? 😣

 वो भाई… जो बचपन में अपने भाई पर किसी और का हाथ उठना बर्दाश्त नहीं करता था… आज वही भाई… अपने ही भाई के खिलाफ खड़ा हो जाता है… क्यों…? क्या शादी ने उसे बदल दिया…? या हालात ने…?

(तेज आवाज़ में सवाल)
 और एक और सवाल… कुछ लोगों ने… कुछ मर्दों ने… दहेज के लिए बेटियों को जलाया… उन पर अत्याचार किया… यह एक सच्चाई है… और बहुत ही दुखद सच्चाई है… लेकिन… क्या उन कुछ लोगों की वजह से… पूरे पुरुष समाज को कटघरे में खड़ा कर देना सही है…? “सभी मर्द एक जैसे होते हैं…” यह कह देना कितना आसान है… लेकिन क्या आपने कभी सोचा… उन पुरुषों के बारे में… जो अपने परिवार के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं… जो अपनी खुशियों का गला घोंट देते हैं… जो अपने माँ-बाप के लिए जीते हैं… उनका क्या…? 😥

(भावुक स्वर में)
 आज सच्चाई यह भी है कि… जितनी बेटियाँ दहेज के कारण नहीं जल रही हैं… उससे कहीं ज़्यादा बेटे… घरेलू कलह के कारण… अंदर ही अंदर टूट रहे हैं… मानसिक रूप से बीमार हो रहे हैं… और कई बार… आत्महत्या तक कर रहे हैं… लेकिन उनकी आवाज़… कोई नहीं सुनता… क्योंकि… मर्द रोते नहीं हैं… या यूँ कहिए… उन्हें रोने नहीं दिया जाता…

(धीरे और गहराई से)
एक बेटे की माँ… आज खुश नहीं होती जब उसके बेटे की शादी तय होती है… वो डरती है… घबराती है… क्योंकि उसे पता है… कि शादी के बाद… उसका बेटा उससे दूर हो सकता है… और शायद… उसे एक दिन वृद्धाश्रम भी जाना पड़ सकता है… यह डर… हर माँ के दिल में बैठ चुका है… और यह डर… समाज के लिए एक खतरे की घंटी है…

(बहुत शांत, विनम्र स्वर में)
अब मैं इस अदालत में… कोई आरोप नहीं लगाना चाहता… मैं सिर्फ एक विनती करना चाहता हूँ… 🙏

 क्योंकि बात… स्त्री के सम्मान की है… यह वही पुरुष समाज है… जिसने स्त्री को देवी कहा… जिसने उसके सम्मान के लिए लड़ाइयाँ लड़ीं… जिसने उसकी रक्षा के लिए अपनी जान तक दे दी… और आज भी… हर सच्चा पुरुष… स्त्री का सम्मान करता है… लेकिन… उसे भी समझा जाना ज़रूरी है…

(दिल छू लेने वाला स्वर)

 हर स्त्री को… बस एक बात समझनी होगी… कि… “मर्द को भी दर्द होता है…” बस फर्क इतना है… कि उसके आँसू दिखाई नहीं देते… वो रोता नहीं… वो टूटता है… और उसका दर्द… दिल के दौरे के रूप में सामने आता है…

(भावुक अपील)
एक पुरुष… बस इतना चाहता है… कि जिस प्यार से… वो अपनी माँ के आँचल में पला है… उसी प्यार की झलक… उसे अपनी पत्नी के पल्लू में मिले… वो अपनी माँ को छोड़ना नहीं चाहता… और अपनी पत्नी को दुख देना भी नहीं चाहता… वो बस… दोनों को साथ देखना चाहता है… क्या यह ख्वाहिश इतनी बड़ी है…?

(धीरे-धीरे निष्कर्ष की ओर)
 अगर एक स्त्री… थोड़ा सा समझ ले… थोड़ा सा धैर्य रख ले… थोड़ा सा अपनापन दिखा दे… तो न चूल्हे बंटेंगे… न घर टूटेंगे… न रिश्ते बिखरेंगे… और वह घर… घर नहीं… स्वर्ग बन जाएगा…

 (अंतिम विनती, बहुत भावुक)
 बस इतना कर दीजिए… एक बेटे को… उसके माँ-बाप से बुढ़ापे में अलग मत कीजिए… उसके बचपन का सहारा… उससे मत छीनिए… क्योंकि… जब रिश्ते टूटते हैं… तो सिर्फ घर नहीं टूटता… एक इंसान अंदर से मर जाता है…

(धीरे से, आखिरी लाइन)
सोचिए… और सच में सोचिए… क्योंकि यह सवाल… किसी एक का नहीं… हम सबका है… संजीवन कुमार सिंह ✍️ 


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