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chandraprabha kumar

Inspirational

4  

chandraprabha kumar

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अपना देश विदेश-४

अपना देश विदेश-४

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  अमेरिका की न्यूयार्क जैसी जगह छोड़कर मेरी बेटी भारत आ तो गई और जब तक भारत में बड़े शहर में पोस्टिंग थी तो ज़्यादा परेशानी नहीं हुई, पर वहॉं से छोटी जगह ट्रॉंसफ़र होने पर कई दिक़्क़तें सामने आ गईं। यहॉं टूटी फूटी कम चौड़ी सड़कें थीं, उन पर भी रिक्शा,ठेला, स्कूटर चलते थे। यहॉं तक कि सड़कों पर गायें भी घूमती दिख जाती थीं। ऐसी सड़क पर कार चलाना आसान नहीं था। बाज़ार भी छोटा था। छोटी छोटी दुकानें थी, सामान भी पुराना मिलता था किसी की डेट भी एक्सपायर हो गई होती थी। कुछ सामान मिलता था, कुछ नहीं। 

  बड़े शहर में फिर भी डिपार्टमेंटल स्टोर थे, वहॉं जाकर ज़रूरतें पूरी हो जाती थीं।यहॉं छोटे शहर में धूल भरी सड़कें थी, सड़क के किनारे की छोटी दुकानों पर भी धूल पड़ी रहती थी, उनमें सामान भी बेतरतीबी से अटा पड़ा रहता था। 

  एक बार बच्चों को कुछ कपड़ों की ज़रूरत हुई। पसन्द के सिले सिलाए कपड़े मिले नहीं। सोचा जाकर दर्ज़ी से सिलवा लेंगें। पहले तो कपड़ा ख़रीदने में ही परेशानी हुई, उसके बाद दर्ज़ी की दुकान ढूँढने लगे। पता चला कि एक गली में दर्ज़ी की दुकान है , पर कपड़े अच्छे सिलता है।

    किसी तरह उस गली में पहुँचे तो पता चला कि दर्जी की दुकान पहली मंज़िल पर है ,ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां हैं।सीढ़ियां तो ज़रूर थीं ,पर बहुत ऊँची और कम चौड़ी थीं। उन खस्ताहाल सीढ़ियों पर बहुत संभलकर चढ़ना पड़ा, नहीं तो गिरने का डर था ।किसी तरह सीढ़ियॉं लाँघते हुए जीने को पारकर ऊपर जाकर दर्ज़ी से बात की और नाप देकर कपड़ा उसे सिलने को दे दिया गया। लेकिन फिर वहॉं दुबारा जाने से तौबा कर लिया। कपड़े तैयार होने पर किसी को भेजकर मंगा लिये। 

   अब बच्चों को भी अनुभव होने लगा कि अमेरिका की आराम और सहूलियत की ज़िन्दगी छोड़कर यहॉं अपने देश में आना बहुत मंहगा पड़ा। हर जगह परेशानी का सामना करना पड़ता है। सब जगह बहुत सुधार की आवश्यकता है,पर लोग उदासीन भाव से निस्पृह से अपनी ज़िन्दगी चलाये जा रहे हैं। जैसे स्फूर्ति की चेतना कुछ नया करने की चेतना का अभाव हो गया है, एक ढर्रे में ज़िंदगी ढल गई है और उसी में जिए जा रहे हैं।

  विदेश की बड़ी बड़ी माल, डिपार्टमेंटल स्टोरों की चकाचौंध याद आती थी,जहॉं दुनिया भर की चीज़ें मिल जाती थीं। पर अब वापिस लौटना बेकार था। जहॉं रह रहे थे अपने उसी देश को अच्छा बनाना था। 

   दर्ज़ी के हाथ के सिले कपड़े के भी अपने फ़ायदे थे। अपनी पसन्द का कपड़ा लेकर अपनी पसन्द का डिज़ाइन देकर अपना नाप देकर कपड़ा सिलवा लेना बहुत बड़ी बात थी। विदेश में तो ऐसा करना संभव नहीं था। दर्ज़ी को भी रोज़गार मिलता था और अपनी ज़रूरत भी पूरी होती थी ।अपने पसंद व नाप के लिए दुकानों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते थे।

   हर जगह के अपने फ़ायदे व नुक़सान हैं। ज़रूरत है सभी तरह की जगहों पर समन्वय बैठाने की और जितना सुधार कर सकते हैं उतना सुधार लाने की। यह तो अपना देश है। हमें ही सुधार लाना है और आगे बढ़ना है, हम नहीं करेंगे तो और कौन करेगा। 


 


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