अंतरंग पल
अंतरंग पल
एक प्रेम प्रसंग का किवाड़ खुला जब नायिका अपना पहला नाटक करने के लिए मंच पर चढ़ी। बहुत कुछ चल रहा था उसके मन में। उन सारे विचारों में से एक विचार ने उसे मुक्तक बना दिया। पूछेंगे नहीं वो विचार क्या था ? मैं बताती हूँ किसी के छुअन का एहसास था। हाँ, ये प्रेम हठीला था मगर उसमें समाया था उसका जगत सारा। एक ऐसा जगत जो परिभाषित नहीं हुआ मगर उस नायिका के सपनों का केंद्र था। उस जगत की पहचान उसे मर्णिकर्णिका घाट में प्राप्त हुई थी जब वो गंगा की शीतलता का अनुभव लिए नौका में बैठकर विचारों में लीन थी। सुखद शांति का अनुभव हो रहा था उसे जैसे महाकाल से कई जन्मों से प्रेम प्रसंग चल रहा हो उसका। मंद-मंद मुस्कान को अपने अंदर समेटते हुए वो शिव में विलीन थी और उसे ये आभास था कि यह यात्रा विशेष होगी। आसपास के वातावरण ने कभी उसे कवि बना दिया तो फिर कभी शोधार्थी मगर कला के प्रति उसका रुझान बढ़ता गया। जानते हैं क्यों ? वो इसलिए कि कला के ज़रिये वो शिव तक पहुँचना चाहती थी। जाने कितने ही कारण होते हैं हमारे किसी भी कला से जुड़ने के, मगर हमारी नायिका का कारण अपने आप में अनूठा था। उसका मानना था कि कला ही प्रेम का स्त्रोत है और शिव कला के गुरु।
खूब समझती हूँ मैं आपकी सोच को। कह रहे होंगे – “अगर ऐसा है भी तो हमें क्या लेना -देना है ? “
अरे ये प्रेम-प्रसंग है, जनाब! भूलिएगा नहीं वरना नायिका गुम हो जाएगी। वो भी कहेगी- जहाँ शिव नहीं, वहाँ मेरे होने का क्या लाभ? एक अनोखी बात है हमारी नायिका की भी कि वो काफी सारी कलाओं का अध्ययन करती रहती है, न जाने कौन सी कला उसे शिव से मिला दे? अंदरूनी बात है जी! बाहरी प्रतीत होती है मगर है बात मृगतृष्णा सी। खुद को जानने की उसकी इच्छा तीव्र होती जा रही थी इसलिए वो नाट्य की और बढ़ चली। मगर जब वो पहली बार मंच पर चढ़ी तो ऐसा लगा जैसे उसके समक्ष केवल एक द्रष्टा बैठा है- वो है उसका शिव। अजीब बात है कि अक्सर सपने में भी वो नाट्य के ज़रिये शिव को रिझाते आई थी। कई बार तो वो शमशान में शिव के आगे नाचते हुए देख चुकी थी खुद को। कभी वटवृक्ष के नीचे बैठ शिव का ध्यान करते हुए देखती थी तो फिर कभी आँख बंद करके अंतर्मन में झांकती तो शिव नाम स्मरण हो आता।
शमशान में जाकर शिव की गोद में जाकर लेट जाना उसके लिए सबसे अंतरंग पल होता था। जहाँ शिव उससे पूछते हैं कि उसे क्या चाहिए तो वो जवाब में अक्सर ऐसा ही किया करती थी और कहती- “बस इतना ही चाहिए।“
शिव कहते- “बस इतना ही ? और कुछ भी नहीं ?”
वो कहती- “मुझे आपसे प्रेम चाहिए, ये आप जानते हैं तो व्यर्थ में इतना कौतुहल क्यों ? हाँ, मुझे केवल इतना चाहिए कि जब भी मैं आपके पास आऊं तो आप मुझे बंधन मुक्त कर दें और अपने शुन्य का हिस्सा बनने दें।“
शिव भी प्रसन्नता से उसे अपना लेते हैं और कहते हैं – “तुम्हारी इसी सरलता से प्रेम है। तुम दिखावा नहीं करती। जो दिल में होता है, वो कह देती हो। कोई आक्षेप नहीं, कोई शिकायत भी नहीं करती। बस यूँ ही चुपचाप आती हो और प्रेम से गले लगाती हो, कभी कंधे पर सर रखकर तो फिर कभी गोद में लेटकर मुक्त हो जाती हो।“
तभी तो मैं सोचूं इतनी गहराई वो लाती कहाँ से थी? हाँ ! उसे काफी बार कहा गया कि वो चुप-चुप सी रहती है मगर कौन जनता था कि वो इतनी गहरायी में उतरी हुई है ? भाव वो व्यक्त भी क्या ही करती जब हर जगह उसे शिव के प्रेम की अनुभूति हो रही थी। वो जानती थी कि ये प्रेम प्रसंग मोही दुनिया को समझ नहीं आएगा इसलिए उसने कहना छोड़ दिया क्योंकि जिसे जानना था, वो जानता है और बाकि सबके लिए लिखा तो है उसने अप

