इंकलाब
इंकलाब
सुना है इश्क़ और इंकलाब दोनों एक से होते हैं. दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं. कुछ ऐसे ही ज़िन्दगी से राबता हुआ राशि का जब उसने फिल्म निर्देशन का कोर्स शुरू किया. कुछ साल पहले तक राशि बिल्कुल भी यह बात नहीं जानती थी कि उसे अपने जीवन में क्या करना है. मगर कुछ मसले ऐसे ही रहे उसके जीवन में जिसने उसे भीतर से झकझोर कर रख दिया.
उसके चाचा एक राजनीतिक कार्यकर्ता थे और अपने पार्टी के प्रचार प्रसार में पूरा संयोग करते थे. मगर एक बार उनकी झड़प किसी बड़े फिल्म निवेशक से हो गई और उन्होंने उनके खिलाफ़ एक मोर्चा चला दिया. माना जाता है कि वो निवेशक किसी बड़े स्कैम में सम्मिलित था और पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता भी उनका साथ दे रहे थे. इसलिए राशि के चाचा ने खिलाफ़त की. मगर ये कितना आसान होने वाला था! पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें खूब समझाने की चेष्टा की कि बॉलीवुड और राजनीति दोनों एक साथ चलते हैं. मगर राशि के चाचा ठहरे ईमानदार आदमी भले बेईमानी किसी की बर्दाश्त कैसे करते? कुछ ही दिनों में ख़बर आई कि उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया. ये भी जानी हुई बात थी! मगर वो सत्य का नेतृत्व कर रहे थे. अक्सर जो जीवन हम देखते हैं, वो जीवन होता ही नहीं है. जान पड़ता है कोई साया है जिसका ना रूप रंग है ना कोई मीमांसा ही. सब माया का खेल है. जीवन के परिदृश्य में कोई गलत नहीं हो सकता क्योंकि कोई है ही नहीं. लेकिन अहंकार सीमा लाँघ जाता है अपनी, वो भी हर बार, बार बार. ठीक उसी तरह अहंकार और आत्म-सम्मान की लड़ाई चलती रही और समय बीतता गया. उस निवेशक ने एक भले मानुष की ज़िन्दगी को एक दुष्प्रचार के ज़रिये ख़त्म कर दिया. राशि के चाचा पर इसका काफ़ी गहरा प्रभाव पड़ा और वो मनोरोगी हो गए.
राशि अपने चाचा को अपना आदर्श मानती थी इसलिए उसने फिल्म निर्देशन को ज़रिया बनाया समाज को आईना दिखाने का. उसका मानना था कि कला उसके लिए प्रेम और इंकलाब दोनों है. इसलिए उसने तीन साल अपने आपको और अपनी कला को समर्पित कर दिए. आखरी में उसने एक फ़िल्म बनाई जिसमें उसने बॉलीवुड और राजनीति के गठबंधन की सच्चाई को ईमानदारी से पेश किया. आप शायद नहीं जानते होंगे मगर उन कुछ दिनों मिर्ची का भाव बढ़ गया था. काफ़ी शोर था. कुछ लोगों ने राशि को सराहा, कुछ ने उसे धिक्कारा. ये तो हर फिल्म के बाद होता है! मगर यहाँ तो सुनवाई होने वाली थी वो भी कोर्ट में.
एक बहुत पुराना संवाद या कहें वाद-विवाद याद आ गया. क्या कला केवल मनोरंजन के लिए होती है या फिर समाज का आईना? मानो ये कहानी वापस उसी कशमकश से जूझ रही है. कुछ विवादों की दीवारें बहुत ऊँची होती हैं. राशि को सच दिखाने के लिए 10 साल तक हिरासत में रखने की सज़ा सुनाई गई और उसे 60,000 रुपये दान करने पड़े एक ऐसी न्याय व्यवस्था को जिसे आसानी से पैसों से खरीदा जा सकता है. ये ही तो है असली व्यवस्था का सच! काफ़ी दुरुस्त मुखालफत भी हुई. जो राशि के लिए लड़ रहे थे वो रोज़ाना उससे जेल में मिलने आते और फ़िल्मी पर्दों पर नज़ारा बदलने लगा.
10 वर्ष के पश्चात् जब राशि को रिहाई मिली तब तक उसकी पहचान उसकी डायरी में क़ैद थी. उसने अपनी डायरी का एक पन्ना पढ़ा जिसमें लिखा था:
"मैं क़ैदी नंबर 212 जिसने सच को बेड़ियों में देखा और दीवारों के पार देखना तब भी नहीं छोड़ा. मैं क़ैदी नंबर 212 जिसने इंकलाब को ही अपना इश्क़ जाना. मैं क़ैदी थी मगर मेरे विचार आज़ाद थे जैसे भगत के थे. मुझ जैसे प्रेमी के लिए कला कलाकार को जीवित रखती है. मैं चाहती तो जेल से बाहर पहले ही निकल जाती. मगर मेरा अध्यात्म मुझे कचोटता और पूछता: क्या ये पीड़ा प्रेम और इंकलाब से ऊँचा है? मेरा जवाब ना ही होता. जो शरीर से ऊपर और अपने निकट हो, उसे किसी पीड़ा और समाज का क्या डर? मैं क़ैदी नंबर 212 अपनी कला को वापस आपको समर्पित करती हूँ. जल्द ही मिलेंगे. इंकलाब ज़िंदाबाद !"
